यह बात गलत है…

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आप जो यह तस्वीर देख रहे हैं, वह शहर के मुक्तिधाम परिसर के ठीक सामने का हाल है। जहां पानी का ढोह यहां पहुंचने वाले लोगों की परेशानी बना हुआ है। अर्थी लेकर उन्हें एक फीट पट्टी से निकलना पड़ रहा है। अब इसे व्यवस्थित ड्रेनेज का अभाव कहे या फिर यहां चले निर्माण कार्य को दोष दें, जो भी हो मगर यह मामला जनचर्चा में बना हुआ है। खासकर वे लोग जो दुख की घड़ी में दूरदराज शहरों से यहां आते हैं। उनके मन में अस्वच्छ शहर या कहें कि कसावट में कमी को लेकर गलत छाप छूटना लाजमी है। बता दें कि हू-ब-हू दृश्य मुक्तिधाम परिसर में भी दिखेगा। जहां जगह-जगह जलभराव के कारण कीचड़ जैसा माहौल दिखाई दिया। हालांकि, इसी दिन परिसर में मंदिर वाले प्लाट में नपाकर्मी साफ-सफाई में जुटे थे। यहां टूटे वृक्ष की छंटाई भी कर रहे थे। कर्मचारियों की नजर इस समस्या पर पड़ता तय है। इस बारे में जागरूक नागरिकों ने कहा कि पहले यह तस्वीर नही थी। जबकि यहां पहले की अपेक्षा जनसहयोग से कार्य जारी हैं। समाजसेवी के यहां के विकास को लेकर सक्रिय बने रहते हैं। बावजूद अव्यवस्थाओं का पेंच क्या है ? यह मामला विचारणीय है। क्योंकि इन परिस्थितियों में लोग कहना नही चूक रहे, कि यह बात गलत है।

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