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Wednesday, 28 October 2026
देवास

हिरोशिमा दिवस पर प्रलेसं के आयोजन में भारतीयता राष्ट्रवाद और साहित्य पर चर्चा

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देवास- हिरोशिमा दिवस के उपलक्ष में प्रगतिशील लेखक संघ इकाई द्वारा भारतीयता राष्ट्रवाद और साहित्य विषय पर गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने साहित्य, समकालीन राजनीति एवं अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में मौजूदा समस्याओं को समझने उनका विश्लेषण करने का प्रयास किया।
आयोजन के प्रमुख वक्ता प्रलेसं के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी ने अपने संबोधन में कहा कि राष्ट्रवाद की प्रगतिशील सोच ने ही देश से अंग्रेजों को भगाया था। आजादी के लिए चले आंदोलन में 1857 के राष्ट्रवाद का उपयोग किया गया था। भारतीयता भौगोलिक नहीं हो सकती। देश की संकल्पना का एक आधार राजनैतिक भी होता है। भारत के संदर्भ में अलग-अलग संकल्पनाएं सामने आई है। 1947 का राष्ट्रवाद विस्तारवादी नहीं था। व्यक्ति और देश की सदैव एक ही पहचान नहीं रहती। पीडि़त राष्ट्रों के पक्षधर के रूप में भी भारत की पहचान रही है। मानवता ही राष्ट्रीयता होना चाहिए। सांप्रदायिकता से लडऩे वालों को अपनी लड़ाई साम्राज्यवाद की ओर मोडऩा होगी, क्योंकि वही सभी समस्याओं के मूल में है।

विनीत ने कहा कि हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम के विस्फोट के संदर्भ में वर्ष 1995 में नए तथ्य उद्घाटित हुए। बम विस्फोट से पहले ही जापान आत्म समर्पण कर चुका था उसके बाद भी यह नरसंहार क्यों किया गया ? परमाणु बम का प्रयोग नागरिक आबादी से दूर करने का सुझाव वैज्ञानिकों ने दिया था बावजूद इसके अमेरिका ने जापान की नागरिक आबादी पर यह प्रयोग किया।  विश्व के शांतिप्रिय नागरिकों को मानवता की रक्षा के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद से निर्णायक लड़ाई लडऩा होगी।
उज्जैन प्रलेसं इकाई के शशि भूषण ने अज्ञेय और पाश की रचनाओं के माध्यम से भारतीयता को परिभाषित करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि हम गलत अध्ययन के शिकार रहे हैं। वर्तमान की समस्याओं का हल अतीत के पास नहीं है। अतीत से हम सबक ही ले सकते हैं। डॉक्टर लोहिया को उद्धारित करते हुए शशि भूषण ने कहा कि धर्म दीर्घकालीन राजनीति रहा है। अंग्रेजों को पराजित करने में धर्म की कोई भूमिका नहीं थी। भारत के राष्ट्रवाद ने अब धार्मिक स्वरूप ले लिया है। धर्म को राष्ट्रवाद बताना बड़ा खतरा है। धार्मिक राज्य की परिकल्पना असमानता आधारित वर्ण आश्रम व्यवस्था है। आज गीता और बुद्ध एक दूसरे के सामने खड़े हैं। राष्ट्रवाद भारतीयता के लिए कैंसर के समान ही रोग है। गोष्ठी में कबीर भजनों के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गायक प्रहलाद टिपाणियां ने कहा कि वर्तमान में सच बोलना खतरनाक हो गया है। कबीर के माध्यम से देशवासियों की आन्तरिक पीड़ा को मैंने महसूस किया है। मानवता के लिए एकजुट होना जरूरी है।

   प्रलेसं इंदौर इकाई के हरनाम सिंह ने कहा कि वर्तमान में हिंदुत्व को ही भारतीयता बताया जा रहा है, जिसके कारण स्वतंत्रता संग्राम की विरासत खतरे में है। रवींद्रनाथ टैगोर ने राष्ट्रवाद की आलोचना करते हुए कहा था कि वह शक्ति और अतीत की कल्पनाओं से संचालित होता है। स्वागत उद्बोधन एवं गोष्ठी का संचालन इकाई अध्यक्ष कुसुम बागडे ने किया। आभार माना राजेंद्र राठौड़ ने। आयोजन में प्रलेसं इकाई के वरिष्ठ मेहरबान सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस अवसर पर डॉक्टर प्रकाश कांत, बहादुर पटेल, ज्योति देशमुख, वरिष्ठ चित्रकार मुकेश बिजौले, अजीज रोशन, गहलोत, एफ बीमानेकर, प्रोफेसर त्रिवेदी, रामप्रसाद सोलंकी, एस एल परमार, भागीरथ सिंह मालवीय, वाणी जाधव, नंदकिशोर कोरवाल,  वागड़े, राम सिंह राजपूत, मोहन जोशी आदि उपस्थित थे।

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