अनोखा तीर, हरदा। राज्य सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर सोयाबीन की खरीदी से बचने के लिए बनाई गई भावांतर योजना को लेकर किसानों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। भारतीय किसान संघ के जिला प्रवक्ता राजनारायण गौर ने बताया कि यह योजना 2018 में भी लागू की गई थी, लेकिन वह पूरी तरह असफल साबित हुई। उस समय कई किसानों को भावांतर राशि अभी तक नहीं मिली थी और योजना को बंद कर दिया गया था।
राजनारायण गौर ने कहा कि किसानों के मन में यह संशय है कि जब बाजार में दो एजेंसियां खरीदी करती हैं, तो प्रतिस्पर्धा के कारण रेट में ज्यादा कमी नहीं होती। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे ही समर्थन मूल्य पर मूंग की खरीदी शुरू हुई, व्यापारियों ने मूंग के दाम अचानक बढ़ा दिए। लेकिन इस योजना में पूरी कमान व्यापारियों के हाथ में दे दी गई है, जिससे यह सुनिश्चित है कि व्यापारी सोयाबीन को कम दर पर खरीदेगा और इसका खामियाजा सीधे किसान को भुगतना पड़ेगा। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसान की सोयाबीन बाजार में 3,000 रुपये प्रति क्विंटल बिकती है, तो क्या सरकार समर्थन मूल्य 5,328 रुपये और बाजार मूल्य के बीच का अंतर किसान को देगी, या पूर्व वर्षों की तरह केवल 200-300 रुपये देकर काम तमाम कर देगी। भारतीय किसान संघ ने राज्य सरकार से मांग की है कि भावांतर योजना की विस्तृत गाइडलाइन किसानों को स्पष्ट रूप से समझाई जाए और जो भी भाव सोयाबीन का बिके, किसानों को समर्थन मूल्य मिलना सुनिश्चित किया जाए। संघ ने चेतावनी दी है कि अगर यह नहीं किया गया तो वह इस योजना का विरोध करेगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन प्रशासन की होगी।
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