आखिर सरकार क्यों नहीं करवाती सहकारिता चुनाव

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– 12 वर्ष पहले हुए थे चुनाव, पिछले 7 वर्षों में तीन बार तिथि घोषित हुई फिर टाल दिए
अनोखा तीर, हरदा। मध्यप्रदेश में जिला सहकारी बैंक एवं सहकारी समितियों के चुनाव पिछले 7 वर्षों से बार बार टलते रहे हैं। हाईकोर्ट के आदेश उपरांत सरकार द्वारा चुनाव कार्यक्रम की तिथियां घोषित की जाती रहीं, लेकिन चुनाव कार्यक्रम जारी होने से पहले या जारी करने के बाद भी अचानक चुनाव निरस्त कर दिए गए। ऐसे एक नहीं बल्कि पिछले सात वर्षों में तीन बार हो चुका है। लगभग 66 लाख से अधिक किसानों से जुड़ी 4500 सहकारी समितियों और 38 जिला सहकारी बैंकों में 12 वर्ष पहले 2013 में आखिरी बार चुनाव हुए थे। उसके बाद पहले शिवराज सिंह चौहान सरकार और अब डॉ. मोहन यादव सरकार चुनाव कार्यक्रम घोषित कर निरस्त करने का कार्य कर रही है।
आखिर किसानों से जुड़ी इन बैंकों व समितियों के चुनाव से क्यों परहेज कर रही है सरकार। जबकि इसमें 55 हजार से अधिक लोगों को समायोजित किया जा सकता है और इसमें यह भी तय है कि सर्वाधिक सत्ताधारी दल के लोगों को ही लाभ मिलता है। जिस तरह निगम, मंडलों और बोर्ड में सरकार नियुक्ति कर पार्टी नेताओं को उपकृत करती हैं, वैसे ही इन चुनावों में भी निर्वाचन प्रक्रिया के माध्यम से ही सही लेकिन काफी हद तक एडजस्ट किया जा सकता है। कैसी विडंबना है कि एक ओर तो केन्द्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह सहकारिता को बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं। उन्होंने हाल ही में नई राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 जारी की है। जिसका उद्देश्य जमीनी स्तर पर सहकारिता आंदोलन को मज़बूत और गहन बनाने के लिए एक सक्षम कानूनी, आर्थिक और संस्थागत ढांचा तैयार करना है। इस नीति का उद्देश्य सहकारी उद्यमों को पेशेवर रूप से प्रबंधित, पारदर्शी, प्रौद्योगिकी-सक्षम, जीवंत और उत्तरदायी आर्थिक संस्थाओं में बदलना है जो आम जनता द्वारा उत्पादन को बढ़ावा दें। केन्द्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह का कहना है कि सहकारी संस्थाओं की परिचालन दक्षता और जवाबदेही में सुधार किया जाएं। सहकारी समितियों के बीच सहयोग को बढ़ावा देते हुए सहकारी गतिविधियों में युवाओं और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाएगी। मौजूदा योजनाओं की पहुंच और प्रभावशीलता का विस्तार किया जाएगा और देश भर में सहकारी शासन तंत्र को सुदृढ़ किया जाएगा। वहीं दूसरी ओर उन्हीं के दल भारतीय जनता पार्टी की मध्यप्रदेश सरकार सहकारिता चुनाव की तिथि न्यायालय की पेशियों की तरह बढ़ाती जा रही है।


अब तक दो बार हो जाना था चुनाव
मध्यप्रदेश में सहकारिता के चुनाव पिछले 12 वर्षों में दो बार हो जाना चाहिए था। चूंकि पिछले चुनाव 2013 में संपन्न हुए थे जिनका कार्यकाल 2018 में पूरा हो जाता और फिर 2018 में गठित समितियों और बैंकों के संचालक मंडल का कार्यकाल 2023 में पूरा हो जाता। नियमानुसार कार्यकाल पूरा होने से छह माह पहले चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जानी चाहिए थी। लेकिन पहले विधानसभा चुनाव, किसान कर्ज माफी और अन्य कारणों से चुनाव प्रक्रिया लगातार टलती रही। चुनाव नहीं होने के कारण हाई कोर्ट की जबलपुर व ग्वालियर खंडपीठ में कई याचिकाएं दायर हुईं। इस दौरान सरकार ने चुनावी कार्यक्रम घोषित कर दिया और 26 जून से 9 सितंबर 24 तक चुनावी प्रक्रिया पूरी करने की जानकारी न्यायालय को प्रस्तुत कर दी। अभी निर्धारित तिथि पर चुनाव कार्यक्रम शुरू भी नहीं हुआ था कि सरकार ने फिर चुनाव कार्यक्रम निरस्त कर दिया। फिर महाधिवक्ता कार्यालय के सुझाव पर राज्य सहकारी निर्वाचन प्राधिकारी ने मई से सितंबर 2025 के बीच चुनाव का कार्यक्रम घोषित किया। यह प्रक्रिया प्रारंभ हो पाती इसके पहले सरकार फिर हाई कोर्ट पहुंच गई और चुनाव आगे बढ़ाने की अनुमति मांगी। इसका आधार सहकारिता मंत्रालय के नई समितियों के गठन के दिशानिर्देश पर प्रचलित प्रक्रिया को बनाया। हाई कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया और एक बार फिर चुनाव टल गए। इस तरह तीन बार चुनाव टाले जाने से प्रदेश की 38 जिला सहकारी बैंकों और 4500 प्राथमिक कृषि ऋण सहकारी समितियों में वर्षों से निर्वाचित प्रतिनिधियों का अभाव है। जिससे इन संस्थाओं का संचालन लोकतांत्रिक तरीके से नहीं हो पा रहा।
उल्लेखनीय है कि मप्र में 4500 सहकारी समितियां हैं। 38 जिला सहकारी बैंक और प्रदेश स्तर पर एक अपेक्स बैंक है। इन 4500 सहकारी समितियों में करीब 53 हजार सदस्य बनेंगे। सबसे अहम 38 जिला सहकारी बैंकों में अध्यक्ष और संचालक मंडल के चुनाव होंगे। यानी 55 हजार से ज्यादा लोगों को इन समितियों में एडजस्ट करने का मौका मिलेगा। लेकिन सरकार निगम मंडलों और बोर्ड में नियुक्तियों की तरह ही अपने मैदानी कार्यकर्ताओं को इन चुनावों से भी वंचित रखें हुए केवल सपने दिखाती आ रही है। क्या ऐसे ही साकार होगा सहकारिता मंत्री अमित शाह का सहकारिता आंदोलन को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाने का सपना।
प्रदेश विकास में महत्वपूर्ण भूमिका
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सहकारिता चुनाव को लेकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को एक पत्र लिखा है। उन्होंने कहा कि सहकारी समितियों और बैंकों का प्रदेश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहता है। किसान हित में भी इन सहकारी समितियों की उल्लेखनीय भूमिका रही है। इससे प्रदेश के 66 लाख से अधिक किसान सीधे तौर पर जुड़े होते हैं। ग्रामीण स्तर पर किसानों को गांवों में ही किसानी संबंधित वस्तुएं खाद बीज आदि की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है। अगर इनका संचालन भी किसान प्रतिनिधियों के माध्यम से सुचारू किया जाएं तो यह किसानों के लिए बहुउद्देशीय और बहुउपयोगी साबित हो सकती है। इसलिए प्रदेश व किसान हित में सहकारिता के चुनाव शीघ्र कराएं जाना चाहिए।

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