बहस का विषय बनी सांसद-विधायक प्रतिनिधियों की नियुक्ति

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 दैनिक अनोखा तीर के मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित समाचार ‘असंवैधानिक है सांसद-विधायक प्रतिनिधि नियुक्त करना Ó आज पाठकों की बहस का विषय बनकर उभरा है। सुबह जैसे ही अखबार पाठकों के पास पहुंचा, तो ऐसे अनेक सुधि पाठकों ने इसे पढ़कर न केवल सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी लिखित प्रतिक्रियाएं व्यक्त की, अपितु अनेक पाठकों के फोन भी हमारे पास आए, जिन्होंने इस लेखन की सराहना के साथ इसे एक गंभीर विचारणीय मुददा बताया है। पाठकों के विचार थे कि इसे राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जाना चाहिए। अपनी संक्षिप्त टिप्पणियों के साथ तो अनेक पाठकों ने हमें अपनी प्रतिक्रियाएं दी है। लेकिन कुछ पाठकों की प्रतिक्रियाएं हम यहां उन्हीं के विचारों में सीधे तौर पर प्रकाशित कर रहे हैं। हम उन सभी जागृत पाठकों का भी साधुवाद ज्ञापित करते हंै, जिन्होंने अपने विचारों से हमारा उत्साहवर्धन किया।

प्रशासनिक व्यवस्था में प्रतिनिधियों का हस्तक्षेप अनुचित


राजेंद्र सिंह ठाकुर
लोकतंत्र में जनता को अपने नगर-गांव या अपने क्षेत्र के चहुंमुखी विकास के लिए अपना जनप्रतिनिधि चुनने का मौलिक अधिकार है। अपनी पसंद का जनप्रतिनिधि उसको चुनते हैं, जिन्हें वह भली-भांति जानते पहचानते हैं। फिर वह सांसद- विधायक, पार्षद, सरपंच आदि हो सकता है। अब एक माननीय अपने प्रतिनिधि नियुक्त करते हुए जनता की समस्या को हल करने के वजह समस्याओं को बढ़ाते हैं, यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।  सांसद-विधायक प्रतिनिधि जनता के बीच सहयोग की कड़ी हो सकते हैं, पर इनको ही जनप्रतिनिधि मानना गलत है। यह शासकीय अधिकारियों को निर्देश जारी नहीं कर सकते हैं और न ही जनप्रतिनिधि की जगह हस्ताक्षर कर सकते हैं। यह व्यवस्था केवल क्षेत्र में जनसंपर्क बढ़ाने और शासकीय योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने में जनप्रतिनिधि के सहयोग के लिए ठीक हो सकती है, पर अपने आप को जनप्रतिनिधि मान लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ नहीं माना जा सकता है। इसलिए सरकार को इसपर गंभीरता से विचार करना होगा, ताकि जनता का विश्वास भारत के लोकतंत्र पर बना रहे।
-राजेन्द्र सिंह ठाकुर, प्रांत पर्यावरण संयोजक मध्यभारत प्रांत भोपाल

अड़ीबाजी को मिलता है बढ़ावा

सुभाष जायसवाल
सांसद विधायक एवं अन्य जनप्रतिनिधियों द्वारा विभिन्न विभागों में प्रतिनिधि नियुक्ति के संबंध में दैनिक अनोखा तीर के संपादक प्रहलाद शर्मा का लेख पढ़कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि हमारे देश में लोकतंत्र में व्यवस्थाओं को बनाने के लिए किस तरह से असंवैधानिक तरीके से नियुक्तियां की जाती हैं। राजनीतिक दबाव के चलते प्रशासनिक स्तर के अधिकारी कुछ बोल नहीं पाते हैं, परंतु मैंने यह देखा है कि जहां-जहां भी सांसद और विधायक प्रतिनिधि नियुक्त हैं, वे सिर्फ नाम मात्र के हैं। बैठकों में उनके द्वारा दिए गए विचार एवं सुझाव भी अंकित नहीं किए जाते हैं। नगरी निकायों में तो सांसद एवं विधायक प्रतिनिधि को सिर्फ सलाह देने का अधिकार है, उनके सुझाव को प्रोसेसिंग रजिस्टर में भी नहीं लिखा जाता है। उसके बावजूद भी बड़े रसूख के साथ यह प्रतिनिधि बैठकों में जाते हैं। हमारे जनप्रतिनिधि भी बेफिक्र हो जाते हैं कि आप पार्टी के कार्यकर्ता आपस में लड़ो, किसी विभाग में कोई काम नहीं हो रहा है तो प्रतिनिधि से बात करो। मैंने यह देखा है कि इसमें अड़ीबाजी को भी बढ़ावा मिल रहा है। जब शासन के निर्देश ही नहीं है तो इस तरह की नियुक्तियों का क्या मतलब है। मैं तो यह कहता हूं कि जो लोग भी वर्तमान में प्रतिनिधि नियुक्त हुए हैं, वह अपने आप में आंकलन करें। विचार करें। रही बात जन समस्याओं की विभागों के मुद्दों की तो उसके लिए तो एक पार्टी का एक कार्यकर्ता और आम नागरिक भी अपनी बात सांसद विधायक तक पहुंचा सकता है। मैं दैनिक अनोखा तीर के संपादक महोदय को साधुवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने इतनी महत्वपूर्ण जानकारी हमारे समक्ष रखी, जिससे जनप्रतिनिधि भी अनभिज्ञ हैं, जो लगातार नियुक्तियां करते जा रहे हैं या तो वह जानकर भी अनभिज्ञ हैं, क्योंकि राजनीति में कार्यकर्ताओं को खुश करने के लिए इस तरह की रेवड़ियां कानून कायदों को दरकिनार कर बांट दी जाती है।
सुभाष जायसवाल, पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष  टिमरनी

कलम चलाकर नई बहस को छेड़ा
सांसद विधायक प्रतिनिधि नियुक्त करना  असंवैधानिक है, यह बात पत्रकारिता में अब तक अछूता विषय रहा है। आपने इस विषय पर कलम चला कर, एक नई बहस को छेड़ा है। वह बहस जिसे आपको एक मुहिम के रूप में आगे जारी रखना चाहिए। क्योंकि वरिष्ठ माननीयों के प्रतिनिधि नियुक्त करने का ही असर है कि पंचायतों में भी निर्वाचित प्रतिनिधियों की जगह उनके पति, पिता, भाई या बेटा बैठते हैं और कामकाज देखते हैं। प्रशासनिक अफसरों से भी सवाल करना चाहिए कि वह ऐसी असंवैधानिक नियक्तियों को क्यों मान्यता दे रहे हैं? सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के मुखियाओं सहित विधानसभा और लोकसभा अध्यक्ष, यहां तक की सीएम से भी इसे लेकर प्रश्न करना चाहिए और उसे लेख के रूप में प्रकाशित करना चाहिए। संविधान विशेषज्ञों से भी बात कीजिए और राज्यपाल का भी इस और ध्यान इस विसंगति की ओर आकर्षित कराइए। राज्य में राज्यपाल ही संविधान प्रमुख होते हैं, लिहाजा वह इस मामले में सीधे हस्तक्षेप भी कर सकते हैं।
कपिल श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार जबलपुर

यह राष्ट्रीय मुद्दा है


देवेन्द्र दुआ,
आज आपने जो विषय उठाया है बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह संपूर्ण देश के लिए एक विचारणीय तथा बहस का मुद्दा हो सकता है। जब ऐसा कोई संवैधानिक प्रावधान ही नहीं है तो यह तथाकथित व्यवस्था इतने वर्षों से कैसे चली आ रही है। अगर शासन प्रशासन और न्यायलय इस पर गौर करे तो यह एक नया कानून बनाने का विषय भी हो सकता है। क्योंकि यह विषय सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है, जो पिछले कई सालों से असंवैधनिक रूप से ही चला आ रहा है। कैसी विडंबना है कि सब जानते हुए भी न न्यायालय, न नेता और न जनता इस पर संज्ञान ले रही है।  बहुत बढ़िया किया आपने जो इस लेख के माध्यम से सबको जगाया।
देवेन्द्र दुआ, रंगकर्मी व सामाजिक कार्यकर्ता हरदा

हकीकत का आइना है यह लेख


अरविंद हर्णे
विभिन्न जनप्रतिनिधियों द्वारा स्वयं के तथाकथित प्रतिनिधियों की नियुक्ति पर पैनी नजर डालता आपका ये लेख विस्फोटक साबित हो सकता है। यदि सांसद या विधायक प्रतिनिधि रखने का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है तो किसी भी जनहित की मीटिंग में ये अंगूठा छाप क्या कर रहे हैं और किस अधिकार से आईएएस और आईपीएस पर अपनी धौंस जमा रहे हैं? आपने लेख में रक्तबीज शब्द का भी प्रयोग किया है जो इस विषय पर बहुत ही सटीक प्रतीत हुआ। वास्तव में रक्तबीज के रक्त की बूंदों से जैसे अनेक रक्तबीज पैदा हो जाते थे, ठीक वैसे ही जनता तो एक ही सांसद विधायक चुनती है लेकिन उनके निर्वाचित होने पर कितने सांसद विधायक प्रतिनिधि पैदा हो जाते हैं। आपके द्वारा उठाया गया यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का विषय भी है और सरकार तथा प्रशासन के लिए विचारणीय पहलू भी है। मुझे लंबे अंतराल पश्चात कोई अच्छा और सच्चा लेख पढ़ने को मिला तो मैं अपने विचार व्यक्त करने से स्वयं को नहीं रोक पाया। अपनी इसी भावना के साथ आपको साधुवाद।
अरविंद हर्णे, आर्किटेक्ट इंजिनियर हरदा

जुगनू सी उजास


राजेश जोशी
अनोखा तीर के संपादक प्रहलाद शर्मा द्वारा आज के ज्वलंत मुद्दे पर चलाई गई कलम नेक नियत, मील का पत्थर और लाइट हाऊस जैसी है, जो आज के स्वार्थ भरे राजनीतिक दलों के दलदल को रेखांकित करता है। संविधान देश का धर्म ग्रंथ होता है जो समाज और राजकाज के मुद्दों पर मार्गदर्शन करता है। लेकिन सत्ता के नशे में चूर सांसद और विधायक झूठी शान के सहारे अपना तिलस्म शासन प्रशासन के साथ समाज में फैलाते हैं और अपने छाया पुरुष को जन्म देते हैं। राजनीति एक दूसरे को लाभ पहुंचाने का जरिया नहीं है, वरन सेवा के सहारे मानवता का एक सा विकास है। लेकिन पिछले कुछेक सालों से राजनीति व्यक्तिगत रूप धारण कर व्यक्तिगत विकास का साधन मात्र बन गई है। विधायक या सांसद द्वारा अपने चेले, अनुयायी, या चुनाव बाद उपकृत करने हेतु प्रतिनिधि बना रेवड़ियां बांटी जाती हैं। मेरा अपना मत है कि चुने हुए जन प्रतिनिधियों को अपना क्लोन  तैयार नहीं करना चाहिए।
राजेश जोशी, वरिष्ठ साहित्यकार हरदा

 यह पेटी कॉन्ट्रेक्टर है
प्रकाश टांक

आज अनोखा तीर ने एक ऐसे अनछुए विषय को  शासन-प्रशासन और जनता के समक्ष लाया, जिस पर जितनी चर्चा की जाए कम है। सीधे तौर पर कहा जाए तो जिस तरह सड़क, पुल-पुलिया और बड़े शासकीय निर्माण कार्यों के लिए ठेकेदार सरकार से ठेके लेते हैं और फिर छोटे पेटी कॉन्ट्रेक्टरों को यह कार्य सौंप देते हैं, ठीक इसी तरह सांसद-विधायक प्रतिनिधि बनाना हुआ। बड़ा विचारणीय पहलू है कि जब संविधान में ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं है, सरकार द्वारा न तो कोई अध्यादेश लाया गया और न ही ऐसा कानून अमल में लाया गया, जिसके तहत इस तरह के प्रतिनिधि नियुक्त किए जा सकें। फिर स्वयं संविधान की शपथ लेकर उसकी गरिमा को अक्षुण्य बनाए रखने वाले यह माननीय संविधान का ही मखौल कैसे उड़ा सकते हैं। वास्तव में यह कोई छोटा मोटा विषय या मुद्दा नहीं है और न ही महज एक सामान्य समाचार है। बल्कि इस विषय को गंभीरता से लिए जाने की आवश्यकता है। कल को तो देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री आदि के भी जिले और गांव-गांव में प्रतिनिधि नियुक्त हो जाएंगे। इस विषय को माननीय न्यायालय ने तथा संविधान की रक्षा का दायित्व निर्वहन करने वाले माननीय राष्ट्रपति व राज्यपाल को भी सीधे तौर पर संज्ञान में लेते हुए कार्यवाही करना चाहिए।
प्रकाश टांक, वरिष्ठ अधिवक्ता हरदा।

शोभा की सुपारी होते हैं कथित प्रतिनिधि
प्रवीण गुगनानी

बड़ा ही महत्वपूर्ण विषय इस आलेख के माध्यम से प्रहलाद जी शर्मा ने अनोखा तीर के माध्यम से उठाया है। वस्तुत: इस प्रकार के किसी भी प्रतिनिधि को नियुक्त करने का कोई संवैधानिक अधिकार जनप्रतिनिधि के पास नहीं होता है। उससे भी बड़ी बात यह है कि इन तथाकथित फलां प्रतिनिधि, अमुक प्रतिनिधि के पास बैठकों में जाने, अधिकारी- कर्मचारियों पर धौंस जमाने के अतिरिक्त कोई काम भी नहीं होता है। अधिकार विहीन ये कथित प्रतिनिधि केवल शोभा की सुपारी होते हैं। घर में जब पूजा होती है, उसमें छोटी-छोटी सुपारी रखी जाती है। जब इस सुपारी को पुजारी घर ले जाता है तब पंडिताइन उसे ताना मारती हैं-ये कैसी सुपारी ले आए हंै, आकार इसका है नहीं, स्वाद इसका आता नहीं और ये फेकी भी नहीं जा सकती। बताओ इसका क्या करूं?  तब पंडित अपनी पंडिताइन को यह उत्तर देता है अरे उसको आले में शोभा की सुपारी बनाकर रख दे और जब-तब, आते-जाते इन शोभा की सुपारी देने वालों को श्राप देती रहना। वस्तुत: ये जन प्रतिनिधियों के प्रतिनिधि शोभा की सुपारी ही होते हैं। न खाने के न देखने के और न ही फेंकने के न इनकी कोई सुनता है और न ही इनके कहने से किसी  के कोई काम होते हैं। आते जाते लोग इस शोभा की सुपारी को गाली देते हैं सो अलग!
दूसरा पक्ष
पद में नहीं व्यक्तित्व में शक्ति होती है। कमल जी पटेल के विषय में यह बात अलग है। वे स्वमेव इतने प्रभावी, शक्तिशाली व सिद्ध व्यक्ति हैं कि उनकी आंख के संकेत से काम हो जाते हैं। वे सांसद प्रतिनिधि बने हैं तो अवश्य ही इसमें सांसद दुर्गादास जी व कमल जी के मध्य कोई समझ विकसित हुई होगी। दोनों ही सिद्ध, सुलझे व परिपक्व राजनेता हैं।
प्रवीण गुगनानी, विदेश मंत्रालय, भारत सरकार में सलाहकार राजभाषा  

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