श्रीमद्भागवत कल्पवृक्ष के समान : पंडित जोशी

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अनोखा तीर, हरदा। शहर की शर्मा कॉलोनी में चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिन कथावाचक पंडित सुशील जोशी ने कहा कि श्रीमद्भागवत कल्पवृक्ष के समान हैं, जो भी मनुष्य भागवत रूपी कल्पवृक्ष की छाया में बैठता है, उसके चारों पुरुषार्थ सिद्ध हो जाते हैं। भागवत की कथा जीवन के सार तत्व को समझने के लिए एक अचूक साधन है। भक्ति का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि ज्ञान वैराग्य मूर्छित थे। भक्ति दुखी थी उनका कष्ट दूर करने के लिए नारद जी ने सनकादियों से भागवत सुनी, जिससे भक्ति, ज्ञान, वैराग्य का दुख दूर हुआ। भगवान की कृपा से ही संत मिलते हैं। जीवन में एक संत एक ग्रंथ और एक मंत्र बहुत जरूरी है। यह तीनों ही जगत में रहकर जगदीश से मिलाते हैं। आत्मदेव, धुंधकारी का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि धुंधकारी वह है जो मनुष्य देह मिलने के बाद भी सत्कर्म से नहीं जुड़ा भगवान से नहीं जुड़ा वह धुंधकारी ही है। जिसने अपना जीवन, खान पान च बिगाड़ करके समाप्त कर लिया। मनुष्य जीवन मिलने से ही मनुष्य नहीं बनता जब तक मनुष्य के अंदर मनुष्यता नहीं हो तब तक मनुष्य को पशु की श्रेणी में ही रखा गया है। संस्कारविहीन जीवन पशु तुल्य ही माना गया है। आज समाज में हम धन कमाने की विद्या तो बच्चों को खूब पढ़ा रहे हैं, लेकिन सनातन संस्कृति सनातन धर्म के बारे में आज की पीढ़ी को जानकारी बहुत कम है और यह बहुत बड़ा नुकसान है। सनातन से ही हमारी पहचान है। हमारे यहां इतने शास्त्र हैं। 33 कोटी देवी देवता हैं फिर भी हम इधर-उधर जाएं तो यह हमारी अज्ञानता ही है। कथा का आयोजन राठोड़ परिवार की ओर से हो रहा है।

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