पंडित उपाध्याय जिन्होंने अपना जीवन समाज के अंतिम पंक्ति के व्यक्तियों के लिए जिया: शर्मा

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नसरुल्लागंज। 25 सितंबर 1916 को एक ऐसे दिव्य पुरुष ने भारत भूमि पर जन्म लिया जिन्होंने भारत के दर्शन को भारत की राजनीति में लाने के लिए और राजनीति का परिपेक्ष बदलने के लिए राजनीतिक शुचिता और राजनीतिक मायने बदलने के लिए कि कैसे समाज के अंतिम व्यक्ति तक के व्यक्ति का उत्थान किया जा सके इसके लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए अपने जीवन को आहूत किया। भारत भूमि रत्नों की भूमि रही है लेकिन इस देश में जन्म लेने वाले कई महापुरुष जिन्होंने अपने जीवन को समाज के अंतिम व्यक्ति तक के लिए जिया और यह इस देश के लिए किसी रत्न से कम नहीं है। ऐसे दिव्य पुरुष जो इस देश के लिए रत्न है ऐसे लोगों के लिए कुछ कहना सूरज को दीपक दिखाने के समान है। रविवार को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्म जयंती के मौके पर आयोजित कार्यक्रम एवं युवा मोर्चा के द्वारा आयोजित वृक्षारोपण कार्यक्रम को संबोधित करते हुए युवा नेता ललित शर्मा ने उक्त बातें कहीं। उन्होंने कहा कि आज के जो युवा है वह समाज सेवा के माध्यम से इस बात को पहचाने की सेवा के माध्यम से मनुष्य का मानव का एवं समाज का उत्थान किया जा सके। आज के दौर की राजनीति में प्राप्ति बड़ा लक्ष्य रही है। लेकिन यदि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन दर्शन को देखा जाए तो उन्होंने सेवा को अपना माध्यम बनाया और अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर समाज के अंतिम व्यक्ति का उत्थान करने के लिए कार्य किया। आज जो लोग राजनीति को समाज सेवा के रूप में देखते हैं वह निश्चित तौर पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन को देखते हैं। यदि हम देश के प्रधानमंत्री एवं प्रदेश के मुख्यमंत्री की बात करें तो वह अंत्योदय विचारधारा के तहत हर वर्ग के लिए अपना जीवन समर्पित कर रहे हैं। उन्होंने उदाहरण के माध्यम से बताया कि किस तरह कोई भी गरीब व्यक्ति जब मुख्यमंत्री से मिलने पहुंचता है तो सबसे पहले वह उसकी समस्या सुन उसके जीवन को संवारने के लिए काम करते हैं। निश्चित तौर पर यह पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन का प्रभाव है कि आज वह प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद पर आसीन होते हुए भी समाज के अंतिम व्यक्ति के लिए अपना जीवन समर्पित कर रहे हैं।

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