बारंगा में उफान पर आ रहे कुएं-ट्यूबवेल

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हरदा जिले के समीपवर्ती ग्राम बारंगा में नदी-नाले नहीं बल्कि कुएं, ट्यूबवेल उफान पर आ रहे है। इसका मूल कारण गांवों के युवा किसानों द्वारा अपनाई जाने वाली वाटर हार्वेस्टिंग पद्धति के साथ ही खेतों की मेढ़ों और रिक्त स्थानों पर बड़े पैमाने पर किए गए वृक्षारोपण एवं पुरातन पारंपरिक जलस्त्रोतों का रखरखाव करते हुए उन्हें वर्षा जल संग्रहण योग्य बनाना है। मध्यप्रदेश शासन के कृषि मंत्री कमल पटेल के गृहगांव बारंगा के किसानों में कृषि के प्रति जागृति तो वर्षों से चली आ रही है। यहां के किसान १९७८ में तवा डेम निर्माण से पहले भी अपने पारंपरिक जलस्त्रोतों के आधार पर सिंचित खेती करते आए है। जिसे अब युवा वर्ग ने आधुनिक तकनीकों को अपनाते हुए और विकसित कर लिया है। एक आदर्श गांव के रुप में यहां कृषि से संबंधित वह तमाम कार्य जागरुकता के साथ किए जाते है, जिसमें कृषि का सीमांकन, राजस्व रिकार्ड, आवागमन के रास्ते और जैविक खेती अपनाने जैसे कार्यों पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।

अनोखा तीर, हरदा। हमारी सरकारें हमेशा जनजागृति के उद्देश्य से नारा देती रही है कि खेत का पानी खेत में और गांव का पानी गांव में संग्रहित करें। वर्षा जल की बूंद-बूंद का उपयोग करें। इसके लिए सरकार प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए भी विभिन्न योजनाओं के तहत खर्च करती आई है। बावजूद इसके जिस स्तर पर यह जनजागृति आना था उसका आज भी अभाव देखने को मिलता है। परंतु हरदा जिले की खिरकिया तहसील अंतर्गत आने वाला ग्राम बारंगा शासकीय योजनाओं से परे अपने सामूहिक प्रयासों से एक मिशाल पेश करते नजर आता है। कृषि के प्रति किसानों की जागृति का यह क्रम इस गांव में वर्षों से सतत चला आ रहा है। आज तो जिले का ८५ प्रतिशत से अधिक कृषि रकबा तवा नहरों एवं विभिन्न नदियों पर बने डेम व तालाबों के माध्यम से सिंचित हो चुका है। लेकिन बारंगा के किसानों ने सन् १९७८ में तवा डेम निर्माण से पहले ही अपने निजी कुओं, मराठा राज व मालगुजारी काल के पारंपरिक जलस्त्रोतों का रखरखाव करते हुए उन्हें जीवित बनाकर अपनी कृषि भूमि को सिंचित बना रखा था। परंतु समय चक्र के साथ ही गिरते भूजल स्तर तथा पारंपरागत प्राकृतिक वनों की अंधाधुंध कटाई के चलते आए मौसम में परिवर्तन का असर तो धरती पर सभी दूर पडऩा लाजमी था। लेकिन इस गांव के युवा किसानों ने इससे निजात पाने का भी नया रास्ता खोज निकाला। गांव के किसानों ने सामूहिक प्रयासों से जहां इन पारंपरिक जलस्त्रोतों की निरंतर सफाई करते हुए इन्हें जीवित बनाए रखने का कार्य किया, वहीं वर्षा जल संग्रहित करने के लिए खेतों में सोखता गड्ढों का इस सुनियोजित तरीके से निर्माण किया कि खेत का पानी खेतों में ही इन सोखता गड्ढों के माध्यम से धरती में समा जाए। वहीं गांव के पास से बहने वाले नाले पर स्टापडेम का निर्माण शासन की योजनाओं के तहत कराया। अपने घरों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाकर गांव के पानी को भी जमीन में उतारने की जुगत लगाई। जिससे गांव के कुएं रिचार्ज हो सके। इसी के साथ इन युवा किसानों ने अपने खेतों के मेढ़ों, नालों के किनारे एवं अनुपयुक्त पड़ी शासकीय व गैर जोत योग्य भूमि पर भी सागौन, बांस एवं फलदार वृक्षों का बड़े पैमाने पर रोपण किया है। प्रतिवर्ष वृक्षारोपण के माध्यम से आज यह क्षेत्र हरा-भरा होकर वसुंधरा का हरीतिमा से श्रृंगार किए हुए नजर आता है।

नौरंगी है बारंगा की जमीन

गांव के किसानों की मेहनत के साथ ही प्रकृति ने भी इस गांव को अपना अनुपम उपहार दिया है। गांव के युवा कृषक कपिल भादु का कहना है कि हमारे गांव में सभी युवा कृषक इस प्रयास में रहते है कि हम इस प्रकार उत्कृष्ट कृषि कर सके। हमने कृषि को ही अपना उद्योग बनाते हुए उसके लिए वह सारे प्रयास किए है जो एक उद्योगपति अपने उद्योगों को चलाने के लिए करता है। वहीं ईश्वर ने भी हमें ऐसा अनुपम उपहार दिया है जो हमारे प्रयासों की सार्थकता में सर्वाधिक सहायक है। उन्होंने कहा कि हमारे गांव में बोलचाल की भाषा में यहां की जमीन को नौरंगी जमीन कहा जाता है। यह जमीन कम बारिश, अधिक बारिश, सूखे के समय बारिश की लम्बी खेंच सबको झेलने में सक्षम है।


स्टापडेम और तालाब बने मददगार
ग्राम बारंगा में अन्य गांवों की तुलना भूजल स्तर काफी ऊपर है। यहां के किसानों द्वारा गांव और खेत दोनों ही जगह वर्षा जल संग्रहण के अच्छे प्रयास किए जा रहे है। इसी के साथ मनरेगा के तहत यहां तालाब का निर्माण तथा स्टापडेम भी बनाया गया है। यह कहना है गांव के रोजगार सहायक रामफल उमरिया का। जिन्होंने बताया कि गांव के लोग तालाब का रखरखाव भी अपने निजी जलस्त्रोतों की तरह ही करते है। यहां खेतों में जो सोखते गड्ढे बनाए गए है वह भी अपने आपमें अनूठे है। आज इसी का परिणाम है कि कई कुएं और ट्यूबवेल अपने आप पानी उगल रहे है।
सीमांकन को लेकर नहीं होते विवाद
गांव के कृषक देवेन्द्र विश्नोई एवं चर्तुभुज खोखर ने बताया कि उनके गांव में राजस्व रिकार्ड का संधारण भी काफी व्यवस्थित किया गया है। गांव के हर किसानों की कृषि भूमि का व्यवस्थित सीमांकन होने के कारण कभी सीमा विवाद की स्थिति निर्मित नहीं होती है। वहीं खेतों में जाने वाले अधिकांश रास्ते पक्के है और चौड़े है। गांव के पूरे पटवारी हल्के में सीमा चिन्ह, चांदा, माटा, मिनारे सब अपने स्थानों पर व्यवस्थित रुप से अंकित है। जिसके चलते कभी भी किसी किसान को अपनी भूमि का सीमांकन कराने दौरान कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता।

वृक्षारोपण को बनाया अभियान

गांव के किसान आनंद नाईक एवं माधवदास मुकाती ने बताया कि हमारे गांव में जमीन कटाव को रोकने तथा भूजल स्तर को बनाए रखने के लिए वृक्षारोपण को अभियान के रुप में अपनाया गया है। हमारे अधिकांश किसान साथियों ने अपने खेतों की मेढ़ों पर सागौन तथा फलदार पौधों का रोपण कर रखा है। वहीं ढलान वाली जमीन की मेढ़ों पर तथा नाले के किनारे हमने बांसों का रोपण कर मिट्टी कटाव को रोकने के भी पूरे प्रयास किए है। जिसके चलते आज पूरा क्षेत्र गर्मी के दिनों में भी हरा-भरा नजर आता है। इतना ही नहीं बल्कि जब ग्रीष्मकाल में अधिकांश गांवों में जलस्तर गहराने के कारण पेयजल संकट उत्पन्न हो जाता है उस दौरान भी हमारे गांव में ऐसी कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती। हमने अपनी निजी भूमि के साथ ही उस अनुपयुक्त शासकीय भूमि पर भी छायादार और फलदार पौधों का रोपण किया है, जो वर्षों से वृक्षविहीन थी। आज आप हमारे गांव की किसी भी दिशा में चले जाए खेतों की मेढ़ों पर, सडक़ों के किनारे और नाले के दोनों ओर इन वृक्षों के कारण आपको हरियाली ही हरियाली नजर आएगी।

लोगों का जुनून बन गया वृक्षारोपण व जल संरक्षण

ग्राम बारंगा के कृषक तथा प्रदेश सरकार के कृषि मंत्री कमल पटेल के पुत्र सुदीप पटेल का कहना है कि हमारे गांव में आज जो हरियाली, जल स्तर ऊपर आने की स्थिति से किसानों में समृद्धि देखने को मिल रही है वह लोगों के जुनून का परिणाम है। यहां युवा किसानों में खेतों की मेढ़ों पर वृक्षारोपण करने तथा गांव और खेत में वर्षा जल संग्रहण का जो जुनून सवार है उसके सुखद परिणाम सबको देखने को मिल रहे है। सुदीप पटेल ने बताया कि आज गांव के कई कुएं और ट्यूबवेल अपने आप पानी उगल रहे है। यहां लोगों ने मराठाकाल और मालगुजारी प्रथा के दौरान जो कुएं खोदे गए थे उन्हें आज भी जीवित रखा है। इनके रिचार्ज की व्यवस्थाएं भी की गई है। वहीं प्रतिवर्ष इनकी साफ-सफाई पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। यही कारण है कि जब ग्रीष्म ऋतु में अन्य गांवों में जलसंकट गहराने लगता है तब भी बारंगा में जलसंकट जैसी कोई स्थिति निर्मित नहीं होती। कृषक जागृति की दृष्टि से देखा जाए तो आज बारंगा गांव आदर्श गांव की ओर तेजी से बढ़ता नजर आएगा। अगर हमारे जिले के अन्य किसान भी बारंगा के किसानों से प्रेरणा लेकर इस तरह के कार्य सामूहिक प्रयासों के साथ करने लगे तो निश्चित ही हरदा जिले की तस्वीर और तकदीर बदल जाएगी। इससे हम हमारी आने वाली पीढिय़ों के लिए एक सुनहरे भविष्य का निर्माण कर सकते है। हमारे गांव के किसान अपने इन जल संसाधनों के माध्यम से बड़े रकबे में जैविक खेती भी कर रहे है। मैं स्वयं जैविक खेती को अपना रहा हूं। आज हमें ऐसे प्रयासों के लिए शासन की ओर नहीं देखते हुए स्वयं प्रेरित होकर दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ आगे आने की आवश्यकता है।
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