राज-काज

दिनेश निगम ‘त्यागीÓ
नरोत्तम को लेकर चौंका तो नहीं देगा भाजपा नेतृत्व….!
दतिया विधानसभा सीट के लिए उप चुनाव की घोषणा के साथ प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा और भाजपा नेतृत्व पर सबकी नजर है। 2023 के चुनाव में हार के बाद से नरोत्तम की राजनीतिक किस्मत साथ नहीं दे रही। न वे प्रदेश अध्यक्ष बन सके, न राज्यसभा का टिकट मिला और न ही अन्य कोई? दायित्व। वे अपने राजनीतिक पुनर्वास के इंतजार में हैं। अचानक दतिया उप चुनाव से उनकी उम्मीद जागी है। खबर है कि भाजपा नेतृत्व द्वारा उन्हें पहले से संकेत मिल चुके हैं। लिहाजा, उप चुनाव की घोषणा के पहले से ही क्षेत्र में रह कर वे तैयारी कर रहे हैं। पर दूसरा सच यह भी है कि मौजूदा भाजपा नेतृत्व चौंकाने वाले निर्णय के लिए जाना जाता है। मसला मुख्यमंत्री चयन का हो, राज्यसभा के टिकट का या फिर अन्य कोई महत्वपूर्ण विषय, आमतौर पर पार्टी नेतृत्व ऐसे नामों पर मुहर लगाता है, जिनकी चर्चा ही नहीं होती। इस लिहाज से दतिया के टिकट की लड़ाई नरोत्तम के भाग्य और नेतृत्व के निर्णय के बीच की है। नरोत्तम के भाग्य ने साथ दिया तो दतिया से भाजपा के टिकट पर उनका मैदान में उतरना तय है। लेकिन यदि मोदी-शाह की जोड़ी ने फिर चौंकाने वाला निर्णय ले लिया तो कोई नया चेहरा भी मैदान में आ सकता है। ऐसे हालात में नरोत्तम को फिर अपने भाग्य को कोसना होगा। वे उप चुनाव से पहले ही हार जाएंगे, पर फिलहाल ये सिर्फ कयास हैं।
दतिया में अवधेश को कैसे इग्नोर कर पाएगी कांग्रेस….?
दतिया विधानसभा सीट के लिए होने वाले उप चुनाव से प्रदेश की भाजपा सरकार की राजनीतिक सेहत पर कोई खास असर नहीं पड़ना, पर यह भाजपा के कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा और विधायकी गवां चुके कांग्रेस के राजेंद्र भारती का राजनीतिक भविष्य जरूर तय करेगा। नरोत्तम के बारे में फैसला भाजपा को करना है लेकिन चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए भी प्रत्याशी तय करना आसान नहीं है। कांग्रेस राजेंद्र भारती के प्रति सहानुभूति का लाभ लेने के उद्देश्य से उनकी पत्नी शोभा भारती को मैदान में उतारने का मन बना रही है लेकिन अड़चन पाठ्य पुस्तक निगम के पूर्व अध्यक्ष अवधेश नायक हैं। 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले वे भाजपा छोड़ कांग्रेस में आए थे और कांग्रेस ने अवधेश को प्रत्याशी भी घोषित कर दिया था लेकिन बाद में उनका टिकट काट कर राजेंद्र भारती को दे दिया गया। अवधेश ने राजेंद्र के साथ कंधा से कंधा मिला कर काम किया। वे चुनाव जीत भी गए। अब अवधेश उस त्याग का प्रतिफल चाहते हैं। जीतू पटवारी और दिग्विजय सिंह के सामने दतिया में उनका दर्द छलका भी। वे क्षेत्र में  लगातार सक्रिय और मजबूत दावेदार हैं। बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस नेतृत्व अवधेश को इग्नोर कर शोभा भारती का नाम कैसे घोषित कर पाएगी? यह बड़ी चुनौती है। तीसरे दावेदार पूर्व विधायक घनश्याम सिंह हैं लेकिन वे दौड़ में काफी पीछे हैं।
मंदिर के लिए दिया चंदा वापस मांगना कितना जायज….?
उम्र के अस्सी पड़ाव पूरे करने की ओर बढ़ रहे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह इस समय के फिर सबसे चर्चित चेहरा हैं। कांग्रेस के अंदर चल रहे घमासान के केंद्र में तो वे हैं ही, अयोध्या मसले पर घोषणा ने भी उन्हें फ्रंट फुट पर ला दिया है। दिग्विजय ने उज्जैन से अयोध्या तक लगभग एक हजार किमी की पद यात्रा का एलान किया है। उन्होंने कहा है कि उनकी यह यात्रा गैर राजनीतिक होगी और जो भी अयोध्या राम मंदिर के दान और चंदा चोरी से आहत हैं, वे इसमें शामिल हो सकते हैं। साफ है कि पद यात्रा के दौरान कांग्रेस के झंडे-बैनर का इस्तेमाल नहीं होगा। देश के इस समय के सबसे ज्वलंत मुद्दे पर दिग्विजय की पद यात्रा में कोई बुराई भी नहीं लेकिन उनकी एक मांग हैरान करने वाली है। चंदा या दान की चोरी हुई है। इसकी एफआईआर हो और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई, यहां तक तो ठीक है लेकिन दिया हुआ चंदा वापस मांगना कहां तक जायज है? दिग्विजय ने कहा है कि उन्होंने राम मंदिर निर्माण के लिए एक लाख 10 हजार रुपए चंदा दिया था, उसे वापस किया जाए। ऐसी मांग कर वे मजाक का पात्र बन रहे हैं। भला कोई दिया हुआ चंदा भी वापस मांगता है। फिर चंदा मंदिर बनाने दिया गया था, वह तो बन चुका। दिग्विजय का फोकस चोरों के खिलाफ कार्रवाई पर होना चाहिए था, चंदा वापस मांगने पर नहीं।
कांग्रेस में सिर-फुटौव्वल के पीछे पार्टी का यह दिग्गज….!
प्रदेश कांग्रेस के मौजूदा हालात देख कर लगता है कि वे मैदान में उतरने से पहले ही आत्मघाती सेल्फ गोल कर बाहर होने पर आमादा है। देखने में लगता है कि प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के बीच पटरी नहीं बैठ रही और प्रदेश की पूरी पार्टी इन दोनों के बीच बंट कर तलवारें भांज रही है। पर इस सिर फुटौव्वल के पीछे कोई दिग्गज है तो वे हैं दिग्विजय। पहले मीनाक्षी नटराजन मामले में उनके अपमान का मुद्दा बना कर समर्थकों ने प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। बाद में जीतू ने एक ट्रस्ट को 5 सौ करोड़ की जमीन एक रुपए में देने का आरोप लगाया तो दिग्विजय ने प्रेस कांफ्रेंस कर जीतू के आरोप को गलत बता दिया। सवाल है कि जीतू के आरोप पर जवाब भाजपा और सरकार को देना था, वहां से जवाब आया भी, लेकिन दिग्विजय को अपने अध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोलने की क्या जरूरत थी? बाद में संयुक्त पीसी में सफाई देने आ गए कि मेरे और जीतू के बीच गलतफहमी पैदा करने की कोशिश की जा रही है। अब जीतू के साथ वाले दिग्विजय को घेर रहे हैं और दिग्विजय के समर्थक जीतू से लेकर हरीश चौधरी और राहुल गांधी तक को कटघरे में खड़ा कर रहे। हालात ये है कि पार्टी प्रवक्ताओं को मीडिया से बात करने से भी रोक दिया गया। ऐसे हालात में कांग्रेस कैसे करेगी भाजपा का मुकाबला?
इस विधायक के तेवर ठंडे नहीं कर पाई भाजपा….!
कांग्रेस में अंदरूनी घमासान है तो भाजपा भी इससे अछूती नहीं। हालांकि भाजपा के कैलाश विजयवर्गीय जैसे दिग्गज मुख्यमंत्री को पत्र लिखने के बावजूद सार्वजनिक तौर पर टिप्पणी से बचते हैं। लेकिन पार्टी के एक विधायक पन्नालाल शाक्य भाजपा अनुशासन के लिए समस्या बने हुए हैं। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की मांद में रह कर उन्हें चुनौती दे रहे हैं लेकिन भाजपा नेतृत्व उनके तेवर ठंडे कर पाने में असफल है। शाक्य ने पहले सिंधिया समर्थक दो मंत्रियों गोविंद सिंह राजपूत और प्रद्युम्न सिंह तोमर को नकारा कहते हुए उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर करने की मांंग कर डाली। बवाल मचने पर भाजपा मुख्यालय तलब किए गए तो कह दिया कि मंत्रियों से उनके कोई मतभेद नहीं हैं। संगठन उनके लिए सबसे ऊपर है। भोपाल से वापस जाते ही फिर उनके तेवर बदले और कह दिया कि जिस तरह हवा और पानी को कोई नहीं रोक सकता, उसी तरह उन्हें भी कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने कहा कि राजनीति में उन्हें कई बार रोकने की कोशिश हुई लेकिन वे जनता की दम पर हमेशा आगे बढ़े। फिर उनका एक वीडियो वायरल है। इसमें वे कह रहे हैं कि सिंधिया चापलूसों से घिरे रहते हैं। यह बात मैंने मंच से उनकी मौजूदगी में कही। हमारा काम अपने नेता को सचेत करना और बचाना है लेकिन वे चापलूसों के चक्कर में रहेंगे तो हम कब तक बचा पाएंगे?

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