श्रीरामलला मंदिर में चोरी भक्तों की भावना व श्रद्धा को आघात पहुंचाने वाला महापाप : संत समुदाय

– सनातन सर्वधर्म समभाव रखता है, लेकिन जब समर्पण घटता है, प्रेम बटता है तब धर्मानुरागी पथभ्रष्ट होकर धर्म परिवर्तन करता है

गोवर्धन से लौटकर प्रहलाद शर्मा। प्रभु कृपा से विगत दिनों ठाकुरजी के श्रीकृष्ण अवतार की बाल लीला स्थली मथुरा वृन्दावन, बरसाना नंदगांव और गोवर्धन जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस दौरान बृजभूमि गोवर्धन में श्री व्यास कुटि पर विश्व मंगलम् जयपुर के तत्वावधान में आयोजित एक संत समागम में संतों के दर्शन तथा सत्संग का भी सौभाग्य मिला। वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक श्री मदनमोहन व्यास जी महाराज के स्नेह सहयोग से जगद्गुरु श्री बलराम देवाचार्य जी महाराज, महामण्डलेश्वर श्री रघुवीर दासजी महात्यागी, पूज्य श्रीनारायण दासजी महाराज सुन्दरधाम, संत श्री दीनबन्धु दासजी महाराज गोवर्धन किलोल कुण्ड, श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या जी के प्रसिद्ध श्री रामायणी जैसे अनेक प्रसिद्ध, शुद्ध और सिद्ध संतों व महापुरुषों से आध्यात्मिक चर्चा तथा उनके आशिष वचनों से यह धार्मिक यात्रा सारगर्भित हुई। इस दौरान पीढ़ियों के संघर्ष और करोड़ों रामभक्तो के त्याग, समर्पण एवं बलिदान पश्चात निर्मित श्रृद्धा, आस्था और भक्ति के केंद्र श्रीराम मंदिर की दान राशि चोरी मामले के सवाल पर संतों ने कहा कि श्रीराम मंदिर में चोरी भक्तों की भावना और श्रद्धा को आघात पहुंचाने वाला महापाप है। ऐसे महापापियों को कानून चाहे कोई दंड प्रावधान करें या ना करें, लेकिन ईश्वरीय सत्ता में घोर दंड विधान है। सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथ गरुड़ पुराण में ईश्वरीय सत्ता और कर्म सिद्धांत के तहत पापियों के लिए विस्तृत दंड विधान का वर्णन है। मृत्यु के बाद यमराज के दरबार में कर्मों का हिसाब होता है और महापापियों को उनके कर्मों के आधार पर विभिन्न नरकों में भयानक यातनाएं दी जाती हैं। सनातन धर्म में मंदिर की संपत्ति या भगवान के चढ़ावे की चोरी को सामान्य चोरी नहीं, बल्कि सुमहापातक (घोर महापाप) माना गया है। मंदिर के धन का गबन करने वाला व्यक्ति कभी भी ईश्वरीय दंड से नहीं बच सकता। इस जन्म में सामाजिक अपमान और कष्टों के साथ-साथ पारलौकिक न्याय में उसे घोर नरक (रौरव या कृमिभोजन) की यातनाएं भुगतनी पड़ती हैं। इसी तरह धर्म परिवर्तन करने के सवाल पर संतों ने कहा कि जब समर्पण घटता है और प्रेम बटता है तब धर्मानुरागी पथभ्रष्ट होकर धर्म परिवर्तन की और अग्रसर होता है। इसे और सरल भाषा में इस तरह समझा जा सकता है कि जब तुम अपने ही घर के अंदर अपने ही कुछ भाई-बहनों को नीचे का घोषित कर दोगे, तो वो भाई-बहन तुम्हारा घर छोड़ कर जाएंगे कि नहीं जाएगे ? फिर तुमको अचरज क्यों होता है? हमको थोड़ा आत्मचिंतन की जरूरत है। आपका सवाल भी यही है ना कि दुनिया में हिंदू ही अकेला व्यक्ति क्यों है जो जल्दी से अपना धर्म त्यागने को तैयार हो जाता है? यह सवाल आपको अपने आप से भी पूछना पड़ेगा। देखिए, मेरी बात का विरोध आप कई तरह के तर्क देकर कर सकते हैं। उदाहरण के लिए जब इस्लाम की लहर आयी तो अरब से ले करके सिंध तक सबने इस्लाम स्वीकार कर लिया, पर गंगा की कछार पर आकर इस्लाम की लहर रुक गई। भारत अकेला था जिसने इस्लाम को पूरा नहीं स्वीकारा। तो हम ऐसे नहीं हैं जो धर्म बदल ही देते हैं, हम अड़ते भी हैं। और अतीत तो छोड़िए आप आज भी देख लीजिए न, आज भी क्या हो रहा है? व्यक्ति तब धर्म नहीं छोड़ता है जब प्रेम हो। प्रेम, और प्रेम हजार से नहीं हो सकता। जो हजार से प्रेम करता हो उसका प्रेम कैसा होगा? कैसा होगा? सच कहूं तो आज-कल हमारा प्रेम, समर्पण सब अर्थ प्रधान हो गये है। हम भगवान को भी भाव से नहीं प्रभाव से पूजने और मानने लगे हैं। हमारी इसी मनोवृत्ति का फायदा उठाकर दूसरे धर्मावलंबी हमारा धर्म परिवर्तन करा रहे हैं। इसके लिए दुनियाभर में जितना भी प्रासलिटाइजेशन माने धर्मांतरण का बजट होता है, वो अस्सी-नब्बे प्रतिशत भारत की ओर आता है। बल्कि शायद और ज्यादा होगा। हम अलग-अलग देवी-देवताओं के नाम पर, अलग-अलग ग्रंथों और पंथों के नाम पर बटते और घटते जा रहें हैं। जबकि दूसरे धर्म के लोग अपने धर्म के प्रति निष्ठावान तथा समर्पित भाव रखते हैं। हमारी निष्ठा बट गई, श्रद्धा घट गई, हम लक्ष्मीनारायण के नहीं बल्कि केवल लक्ष्मी के उपासक बन गए, इसलिए यह सब स्थिति निर्मित हो रही है।
जब सवाल उठा कि पहले की तुलना में आज-कल तो कथा पुराण भी बहुत हो रही है। हर जगह कथाओं में हजारों लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है फिर हमारे धर्माचार्य लोगों को अपने धर्म के प्रति श्रद्धा, समर्पण और प्रेम का पाठ क्यों नहीं पढ़ा पा रहे हैं? इस विषय पर संत श्री ने कहा कि आप किसे कथा मानते हो? क्या आज लोग गीता जी को पढ़ते या सुनते हैं? अध्यात्म के नाम पर यह हल्का मनोरंजन, नाचना-गाना, पौराणिक किस्से कहानियां सुनाना, फिल्मी धुनों और तर्ज पर कुछ तो भी गा बजा कर लोगों को नचाईया बनाना, यह कथा है? इससे लोगों में धार्मिक भावनाओं का संचार होगा, वह ईश्वर से प्रेम करने लगेगा, सनातन धर्म के प्रति समर्पित भाव प्रकट होगा? यह टोने-टोटके लोगों को भगवत प्राप्ति या भगवान के सर्णागत होने का मार्ग बताएंगे? धर्म और अध्यात्म के नाम पर यह सस्ता मनोरंजन बंद करना होगा। अध्यात्म एक तपस्या है कोई पैसे कमाने का सस्ता मनोरंजन नहीं। जो वाकई गीता के साथ है उसका धर्मांतरण नहीं हो सकता। बाकी सब आप आज जो नाच-गाना कर रहे हो तो एक दिन आपका भी शिकार हो सकता है। ऐसा इतिहास में हुआ है और आज भी हो रहा है।

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