-ढेंढ़िया नृत्यांगना दीपशिखा नृत्यांगना समूह सम्मानित
अनोखा तीर, भोपाल। रवींद्र भवन एवं एमवीएम परिसर में आयोजित लोकरंग समारोह पारंपरिक भारतीय लोक-संस्कृति की जीवंत झांकी का केंद्र बना रहा। एक ओर देशज परिधानों के आकर्षक स्टॉल, लोकशिल्प और पारंपरिक वस्त्र परंपरा की मनमोहक झलक देखने को मिली, तो दूसरी ओर पारंपरिक व्यंजनों की सुगंध के बीच दर्शक विविध सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद लेते नजर आए। पूरा परिसर लोकजीवन की रंग-बिरंगी आभा से सराबोर दिखाई दिया। समारोह के अंतर्गत रवींद्र भवन में संगम नगरी प्रयागराज की प्रसिद्ध ढेंढ़िया नृत्यांगना दीपशिखा को विशेष रूप से सम्मानित किया गया। यह सम्मान पर्यावरण संस्कृति संरक्षण एवं मानव कल्याण ट्रस्ट के अध्यक्ष सुशील कुमार जैन द्वारा प्रदान किया गया। दीपशिखा ने लगभग ग्यारह वर्ष की आयु से इस लोकनृत्य विधा को जीवंत बनाए रखा है। बीते लगभग बीस वर्षों की साधना के दौरान उन्होंने देश के अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी प्रस्तुतियाँ दी हैं। उत्कृष्ट मंचीय प्रदर्शन के लिए उन्हें कई पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। वे एक कुशल कोरियोग्राफर भी हैं और कई आकर्षक नृत्य संरचनाएँ तैयार कर चुकी हैं। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाला ढेंढ़िया नृत्य आज अनेक महोत्सवों की शान बन चुका है। इसका उद्भव प्रयागराज से माना जाता है और यह अवधी लोकनृत्य परंपरा का प्रमुख हिस्सा है, जिसकी शैली बिहार के झिंझिया लोकनृत्य से भी साम्यता रखती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब प्रभु श्रीराम वनवास के पश्चात अयोध्या लौट रहे थे, तब प्रयागराज में महिलाओं ने सिर पर कलश में दीप जलाकर नृत्य के माध्यम से उनका स्वागत किया था। उसी आस्था के प्रतीक रूप में यह नृत्य आज भी संस्कृति और श्रद्धा के संगम का प्रतीक माना जाता है। इस नृत्य में बालिकाएँ रंग-बिरंगे परिधानों और घाघरों में सुसज्जित होकर सिर पर छिद्रयुक्त मिट्टी के कलश में जलता हुआ दीप रखकर चक्करदार लयात्मक नृत्य प्रस्तुत करती हैं। संगत कलाकार अवधी लोकगीतों के माध्यम से वातावरण को जीवंत बनाते हैं। प्रस्तुति में पारंपरिक एवं आधुनिक वाद्य यंत्रों का समन्वित प्रयोग किया जाता है, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।

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