संशय के समाधान का ग्रंथ है रामायण : श्रद्धेय मदनमोहन महाराज
हरदा के इतिहास में पहली बार एकत्र हुए इतने संत, कथा विश्राम पर हुआ विशाल भंडारा
अनोखा तीर, हरदा। कुंभ और अर्धकुंभ जैसे आयोजनों में तो साधु-संतों को सभी ने देखा है, लेकिन हरदा में बिना कुंभ के कुंभ जैसा दृश्य नजर आया। श्रीरामकथा के आयोजन में इतनी बड़ी तादाद में महामंडलेश्वर, श्रीमहंत, महंत और न जाने कौन-कौन सी पदवी धारण किए साधु-संतों का मेला पहली बार देखने को मिला। ब्रम्हलीन श्री मस्तराम दास जी त्यागी एवं ब्रम्हलीन श्री त्रिलोचनदास जी महाराज की स्मृति में पिछले 9 दिनों से चल रही श्रीरामकथा को आज विश्राम दिया गया। आज की कथा में वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक श्री मदमोहन व्यास जी महाराज ने भरत प्रसंग से कथा की शुरुआत करते हुए श्रीराम के अयोध्या वापस और राज्याभिषेक जैसे प्रसंगों पर सारगर्भित कथा सुनाते हुए कथा को विश्राम तक पहुंचाया। कथा की शुरुआत में मुंबई के महामंडलेश्वर बालयोगी बालकदास जी महाराज, चिड़ावा राजस्थान के संत रामसेवकदास जी महाराज, चिलोगाधाम भिण्ड के महामंडलेश्वर श्री अवधूत जी महाराज, मोहनपुर से पधारे महामंडलेश्वर श्री सीताराम दास जी महाराज आदि के साथ ही कथा यजमान प्रहलाद शर्मा एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कौशल्या शर्मा, पुष्कर राव-श्रीमती सीमा राव, हरिशंकर राठौर-श्रीमती शोभा राठौर एवं तुलसीराम शर्मा-श्रीमती नारंगीबाई सहित युवा भाजपा नेता संदीप पटेल ने श्रीरामचरित मानस ग्रंथ का पूजन कर कथा का शुभारंभ किया। कथावाचक श्री मदमोहन व्यास जी महाराज ने कहा कि भरत प्रसंग का विस्तार किए बिना श्रीराम कथा अधूरी है। समयाभाव के कारण बहुत गहराई में तो नहीं जा पाए है, लेकिन मंचासीन साधु-संतों के बीच इसे छोड़ा भी नहीं जा सकता। सच कहे तो श्री भरत जी का चरित्र भी किसी पहुंचे हुए सिद्ध संत महात्मा से कमतर नहीं है। श्रद्धा, त्याग और समर्पण का जो आदर्श भरत ने प्रस्तुत किया है वह संपूर्ण समाज के लिए प्रेरणादायी है। रामचरित मानस कहती है कि श्रद्धा बिना धर्म नहीं कोई, बिना भरोसे भजन नहीं हो सकता। ईश्वर की कथा हो या स्वरुप उसे समझने और महसूस करने के लिए भरोसा सबसे आवश्यक है। रामायण ऐसा ग्रंथ है जो प्रश्नवाचक से पूर्णविराम तक ले जाता है। संशय से समाधान तक ले जाता है। यह वह विज्ञान है जिसे हर कोई नहीं समझ सकता। उन्होंने कहा कि हरि हर व्यक्ति के अंदर है, लेकिन हरि हरि को नहीं मिलाता इसे कोई गुरु ही मिला पाता है। संत समस्या का समाधान चाहे न करें लेकिन समाधान का मार्ग बता देते है। यही कार्य हमारे गं्रथ भी करते है। वासनाओं से ढके हमारे मन को शुद्ध कर उसे सत्य को पहचाने की क्षमता देते है। शरीर से साधना की शुरुआत होती है, लेकिन भक्ति जब जीवन में प्रदर्श हो जाती है तब जीव को अपने स्वरुप का अनुभव हो जाता है। वहीं अप्राप्ति की प्राप्ति हो जाती है। साधना अंर्तमुखी होती है। जैसे-जैसे स्वरुप निखरता है हम सत्य के करीब पहुंचते है। हम मानसिक दोषों के कारण ईश्वर का अनुभव नहीं कर पाते है। जैसे-जैसे मानसिक दोषों की निवृत्ति होती है हमें ईश्वर का अनुभव होने लगता है। उन्होंने कहा कि सारे बड़े काम आत्मबल से होते है। रामादल के सारे पात्र आत्मबल से भरे थे। दुनिया के सारे बल से बड़ा आत्मबल होता है। श्री व्यास जी ने श्रीराम और हनुमानजी के मिलन का प्रसंग तथा सुग्रीव मिलन की कथा सुनाते हुए कहा कि जब तक हनुमानजी अपने वास्तविक स्वरुप में नहीं आए तो श्रीराम ने भी अपना मूल परिचय नहीं दिया। इसी तरह जब सुग्रीव ने अपने दुख का कारण अपने भाई बाली को बताया तब तक श्रीराम ने उसे मारने या सुग्रीव का साथ देने की बात नहीं की थी। लेकिन जब सुग्रीव ने बाली को भाई की जगह काल निरुपित करते हुए कहा तो श्रीराम ने उसके अंत की बात कह दी। इसी तरह जब हनुमान जी ने सुग्रीव को श्रीराम का दास बताया और उनसे मित्रता करने की बात कहीं तब श्रीराम ने कहा कि एक ओर दास बता रहे हो दूसरी ओर मित्र बना रहे हो। तब हनुमानजी ने कहा कि जब सुग्रीवजी दास बन जाएंगे तो उनकी पदवी मुझे प्राप्त हो जाएगी। कुछ इसी तरह के अन्य प्रसंगों पर सारगर्भित प्रकाश डालते हुए श्री व्यास जी ने समुद्र सेतु बनाने तथा श्री रामेश्वरम की स्थापना के लिए पुरोहित के रुप में रावण को बुलाने हेतु जामवंत को भेजने की कथा सुनाई। वहीं लंका की अशोक वाटिका में श्रीराम के विरह में सीताजी द्वारा विलाप करते हुए प्राण त्यागने एवं इस दौरान श्री हनुमानजी द्वारा श्रीराम कथा का श्रवण माता सीता को कराने की बात कही। उन्होंने कहा कि अगर सीताजी ने भी भजन को भुला दिया था तो उन्हें विलाप होने लगा था। और जैसे जी हनुमानजी ने श्रीराम की कथा सुनाई तो सीताजी का दुख दूर होने लगा। श्री व्यास जी ने कहा कि श्रीराम का नाम और उनकी कथा सुनने मात्र से ही हमारे कष्टों का निवारण होना शुरु हो जाता है। तत्पश्चात् विभीषण का श्रीराम से मिलन और राम-रावण युद्ध से लेकर पुष्पक विमान में बैठकर वापस अयोध्या लौटने जैसे विभिन्न प्रसंगों की कथासार सुनाते हुए श्रीराम कथा को विश्राम तक पहुंचाया गया। इस बीच श्री व्यास जी ने अलग-अलग प्रसंगों और दृष्टांतों के माध्यम से किस प्रकार श्रीरामकथा एक आदर्श जीवन शैली की प्रेरणा देती है और समाज के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती है उस पर प्रकाश डाला। कथा विश्राम के अवसर पर अखिल भारतीय संत समिति मध्यप्रदेश के महामंत्री महंत श्री हनुमानदास जी महाराज द्वारा अपने संबोधन में रामायण के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए गागर में सागर वाली कहावत को चरितार्थ करते श्रीराम जीवन चरित्र यात्रा का वृतांत सुनाया गया। वहीं गुजरात लखतर से पधारे महंतजी रामदास जी महाराज ने गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा चरित रामचरित मानस में मानव मन की विभिन्न परिस्थितियों और उसके समाधान की सुंदर कथा प्रसंग से श्रोताओं को आनंदित कर दिया। इस अवसर पर मप्र शासन के पूर्व कृषि मंत्री कमल पटेल ने संबोधित करते हुए समूचे आयोजन को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि यह सब कल्पना से परे नजर आता है। मुझे तो ऐसा लगता है जैसे मैं कुंभ में पहुंच गया हूं। इतनी बड़ी तादाद में साधु-संतों और सिद्ध महात्माओं का हरदा की भूमि पर आना और अपने दर्शन लाभ से हम सबको कृतार्थ करना यह हमारे परम सौभाग्य की बात है। 9 दिनों तक निरंतर श्रीराम कथा और संतों का सानिध्य हरदावासियों को प्राप्त हुआ यह भी ब्रम्हलीन संत मस्तराम बाबा और त्रिलोचनदास जी के आशीर्वाद एवं प्रभु श्रीराम की अनंत कृपा का ही फल है। पूर्व मंत्री कमल पटेल ने जहां आरती में भाग लिया, वहीं उन्होंने देश के भिन्न भिन्न प्रांतों से आए संत महात्माओं के चरण छूकर उनका आशीर्वाद भी प्राप्त किया। कथा विश्राम पश्चात विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। जिसमें हजारों की तादाद में श्रद्धालुओं ने भोजन प्रसादी प्राप्त की।

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