बगैर धर्म के किसी भी राष्ट्र का चौमुखी विकास संभव नहीं : मदनमोहन महाराज

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-जिस देश में भगवान विश्वनाथ और जगन्नाथ हो वहां कोई अनाथ नहीं हो सकता
-श्रीराम कथा में शिव-पार्वती विवाह प्रसंग सुनाया
अनोखा तीर, हरदा। श्रीराम कथा के तीसरे दिन आज वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक मदनमोहन व्यासजी महाराज ने जहां धर्म की विस्तृत व्याख्या करते हुए राष्ट्रीय विकास में धर्म की महत्वता को रेखांकित किया। वहीं शिव-पार्वती विवाह और सती मोह प्रसंग की कथा से श्रोताओं को भक्ति और हास्य रस से भी ओतप्रोत कर दिया।
स्थानीय कच्छकड़वा पाटीदार भवन में ब्रम्हलीन श्री मस्तरामदास जी त्यागी महाराज के तपोभूमि आश्रम के जीर्णोद्धार तथा चातुर्मास श्रीसीताराम जाप की पूर्णाहुति पर आयोजित श्रीराम कथा में आज भक्तिरस की अविरल धारा प्रवाहित हुई। घोल गणेश सील फाटा मुंबई से पधारे महामंडलेश्वर बाल योगी बालकदास जी महाराज, चिड़ावा राजस्थान के संत श्री सेवक दास जी महाराज सहित संतों के सानिध्य में कथा यजमान प्रहलाद शर्मा, श्रीमती कौशल्या शर्मा, पुष्करराव श्रीमती सीमाराव, हरिशंकर राठौर, श्रीमती शोभा राठौर द्वारा श्रीरामचरितमानस ग्रंथ की पूजा करते हुए तीसरे दिवस की कथा का प्रारंभ किया गया। वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक श्री मदनमोहन व्यासजी महाराज ने अपनी कथा वाणी के प्रारंभ में कहां कि मां नर्मदा के नाभि स्थल की पावन धरा पर हमें यहां शब्द ब्रह्म की साधना का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। उन्होंने संतों की स्थिति का वर्णन एक भजन के रूप में करते हुए कहा कि जो आनंद संत फकीर करे वह सुख कहां अमिरी में। महाराज श्री ने सत्कर्म और कुकर्म को लेकर कहा कि जैसे जल बिन मीन नहीं रह पाती वैसे ही मन बगैर पाप कर्मों के नहीं रह पाता। कथा श्रवण हमें इन्हीं कुमार्गो से सदमार्ग पर लाने का उपकर्म है। कथा शब्द यज्ञ है। जीवन में गलती तो हो जाती है, लेकिन जो गलती को गलती नहीं माने वह गलती है और जो उसे मानकर सुधर जाए, वह गलती नहीं। उन्होंने कहा कि महापुरुषों के संग से आध्यात्मिक उन्नति हो, ढोंग की जिंदगी के बजाय ढंग की जिंदगी अच्छी होती है। कथा श्रद्धा से होती है चतुराई से नहीं। विज्ञान हमें गति देता है लेकिन धर्म दिशा देता है। दिशा से दशा ठीक होती है। श्री व्यासजी ने कहा कि आज व्यक्ति भौतिक सुख की चाहत में अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में परमात्मा से विमुख होता जा रहा है। सुख भौतिक होता है, लेकिन आनंद अध्यात्मिक होता हैं और आनंद ही परमात्मा है। उन्होंने कहा कि मैं धन कमाने को गलत नहीं मानता लेकिन धर्म के मार्ग पर चलते हुए कमाया गया धन आत्मशांति प्रदान करता है। हमें भोगना या भागना नहीं जागना ही जीवन है। आज व्यक्ति धर्म से भटक गया है। कुछ लोग व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए व्यवस्था को नुकसान पहुंचाते हैं। समाज को दिशा प्रदान करने वाले उपरोक्तानुसार सदवचनों के साथ ही महाराज श्री ने  बताया कि माता सती द्वारा प्रभु श्रीराम पर संशय तथा भोलेनाथ की भक्ति और कथा को न मानते हुए उनके द्वारा श्रीराम की परीक्षा ली जाती है। लेकिन परमात्मा परीक्षा का नहीं प्रतिक्षा का विषय है। वही इस समूचे प्रसंग का गोस्वामी तुलसीदास द्वारा किए गए शब्द चित्रण पर प्रकाश डालते हुए हास्य परिहास में कहा कि पत्नी को समझना जब भगवान के बस में नहीं था तो हमारे कैसे हो सकता है। वहीं तुलसीदास को लेकर व्याप्त क्विदंती पर कहा कि पत्नी के डांटने से तुलसीदास बनते तो आज हर घर में तुलसीदास होता। उन्होंने सती के पिता राजा दक्ष द्वारा शिव के अपमान के कारण सती द्वारा योगाग्नि में स्वयं को भस्म करने का प्रसंग एवं इस वियोग से दुखी होकर शिव ध्यान में लीन होने की कथा कही। तत्पश्चात सती ने हिमालय के घर पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया और उन्होंने शिव को पति मानने की इच्छा से कठोर तपस्या की। इस दौरान नारद मुनि द्वारा पार्वती का भविष्य बताना और पार्वती जी द्वारा कहना कि मैं बगैर पंख उड़ना चाहती हूं। बहते पानी पर दीवार बनाना चाहती हूं, मैं महादेव को पति बनाना चाहती हूं। इस दौरान सास बहू को लेकर हास्य प्रसंग सुनाया। वही प्रभु श्रीराम द्वारा महादेव को पार्वती जी से विवाह करने की कहना जैसे प्रसंग सुनाएं। वही भगवान शिव द्वारा अपने प्रभु श्रीराम के कहने पर विवाह हेतु तैयार होने को लेकर महाराज श्री ने कहा कि मात-पिता गुरु की वाणी बिना विचार मान लेना चाहिए। वैसे ही भोलेनाथ ने  विवाह के लिए सहमति दी आदि वृत्तांत सुनाया। इस बीच महाराज श्री ने कहा कि बुराई को त्यागने से असिमित अच्छाई होती है। हम सुधारना सभी को चाहते हैं लेकिन सुधरना नहीं चाहते। वही प्रेम को परमात्मा का पर्यायवाची बताया। पंडित मदनमोहन महाराज ने कहा कि जिस देश में परमात्मा ही विश्वनाथ और जगन्नाथ हो वहां जन्म लेने वाला कोई अनाथ नहीं हो सकता। धर्म को बगैर पढ़ें समझें उसकी गलत व्याख्या करने पर भी तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि बगैर धर्म के किसी भी राष्ट्र का चहुंमुखी विकास नहीं हो सकता। राम काल में लंका सोने की थी क्या वह विकास नहीं था। लेकिन वहां धर्म अधर्म में परिवर्तित हो गया था, इसलिए हनुमानजी को उसे जलाना पड़ा। विकास धर्म पथ पर चलते हुए होना चाहिए। यह बात योगी, मोदी, मोहन और शिवराज को समझ आ गई है।
श्रद्धा और सरकार राम मंदिर बना सकती है, लेकिन राम राज्य महात्मा ही ला सकते हैं। उन्होंने कहा कि धर्म से भटके व्यक्ति के  गले में चाहे कितने के सेट हो लेकिन वह अंदर से बड़ा अफसेट होता है। इसलिए बाहरी दिखावे से कोई सेठ नहीं होता। इसी तरह अंहकारी व्यक्ति तब दुखी होता है जब कोई उसका सम्मान नहीं करें। वैसे यह बुराई केवल राजनीतिक क्षेत्रों में ही ज्यादा देखी जाती है, साधु-संत इससे परे होते हैं। जबकि महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं उसका व्यक्तित्व महत्वपूर्ण होता है। यह बात उन्होंने शिव विवाह दौरान नारद मुनि को लेकर एक प्रसंग पर कही थी। उन्होंने सत्ता को लेकर आगे कि कथा सुनाते हुए कहा कितनी ही बार लम्हों की गलती सदियों तक भुगतनी पड़ती है। करने से पहले सोचना चाहिए वरना बाद में सिर उठाने लायक भी नहीं रहते। कथा आर्ट ऑफ लिविंग अर्थात जीवन जीने की कला सिखाती है। धर्म धारण करने की चीज है। बेहोशी से जीवन जीने वाले को कहीं जाना नहीं पड़ता बल्कि जहां रहते हैं वहीं नर्क हो जाता है। उन्होंने कहा कि प्रेमी कामी नहीं होता और कामी कभी पे्रमी नहीं हो सकता। प्रेम के लिए मीरा और ब्रज की गोपियों को समझना पड़ेगा। गोस्वामी जी ने समरथ को नहीं दोष गौसांई ऐसे ही नहीं कहा है। उन्होंने समरथ उसे माना हैं जिसमें कोई दोष नहीं होता। वही पंडित मदनमोहन व्यासजी ने कहा कि हमारा धर्म शरीर से समाधि तक की यात्रा हैं। धर्म पर लड़ने या मरने से ज्यादा धर्म को जीने की आवश्यकता है। आज कथा दौरान गुजराती समाज के अध्यक्ष विनेशभाई सोमजीयाणी, भाजपा महिला मोर्चा जिलाध्यक्ष श्रीमती अनिता अग्रवाल तथा अन्य पदाधिकारी, रंगकर्मी देवेन्द्र दुआ, द फाउंडेशन ऑफ एजुकेशन स्कूल के संचालक जयशंकर कानवा, सनराइज हायर सेकंडरी स्कूल टिमरनी के संचालक अनिल राजपूत ने महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। शिविर में प्रतिदिन सुबह आठ बजे से दिल्ली के प्रसिद्ध एक्यूप्रेशर मैग्नेट थैरेपी डॉ.एस के गर्ग द्वारा नि:शुल्क उपचार किया जा रहा है। वहीं रात्रि को क्षेत्रीय भजन मंडलियों द्वारा भजन कीर्तन किया जा रहा है।

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