आदिवासी परंपरानुसार..

WhatsApp Image 2025-09-19 at 11.24.35 PM

-मालेगांव में धूमधाम से मनाई दीपावली, डंडार नृत्य ने बांधा समां

अनोखा तीर, रहटगांव। वनांचल क्षेत्र में आदिवासी परंपरा के अनुसार दीपावली पर्व एक दिन नहीं, बल्कि पूरे एक महीने तक अलग-अलग गांवों में मनाया जाता है। इसी कड़ी में ग्राम मालेगांव में दीपावली का उत्सव परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ बड़े हर्षोल्लास से मनाया गया। ग्राम में दीपावली कब मनाई जाए, इसका निर्णय ग्राम के भोमका (मुखिया) एवं ग्राम पटेल द्वारा किया जाता है। मंगलवार को मालेगांव में गोठान मेले का आयोजन भी किया गया, जिसमें सैकड़ों ग्रामीण परिवारों सहित शामिल हुए। मेले में खिलौने, खान-पान की वस्तुएं, सजावटी सामग्री और सब्जियां आदि की दुकानें सजीं। आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में महिलाएं व बच्चे शामिल हुए। इस अवसर पर भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा प्रदेश उपाध्यक्ष एवं पूर्व विधायक संजय शाह भी उपस्थित रहे और पारंपरिक डंडार नृत्य में शामिल होकर थिरके। पारंपरिक वाद्य यंत्र ढोलक, टिमकी और बांसुरी की धुन पर सामूहिक डंडार नृत्य प्रस्तुत किया गया। ग्राम पंचायत मालेगांव की सरपंच फूलवती बाई इवने ने सभी ग्रामवासियों को दीपावली की शुभकामनाएं दीं। भाजपा मंडल अध्यक्ष सतीश इवने ने बताया कि वनांचल क्षेत्र में दीपावली पर्व की तैयारी एक माह पूर्व से शुरू हो जाती है। महिलाएं घरों की सफाई, रंग-रोगन और दीवारों पर पारंपरिक चित्र उकेरती हैं। रात में जगोरा (रतजगा) किया जाता है और पूजा-अर्चना के बाद पूरे गांव में गोदोनी निकाली जाती है, जिसमें सात प्रकार के पेड़ के पत्तों से बनी चावरा की टोकरी में गायकी समाज द्वारा परंपरा अनुसार भजन-कीर्तन किया जाता है। महिलाएं आरती कर भिक्षा स्वरूप अनाज वितरित करती हैं। रात्रि में दीप जलाकर रोशनी की जाती है, युवा आतिशबाजी और पटाखे फोड़ते हैं। पायगा में मिट्टी की कुलिया में पानी रखकर गौमाता का मुख धोया जाता है। इसके बाद गौमाता और बैलों को विशेष रूप से सजाया जाता है। उनके सींगों पर गेरू, हिरंगची एवं रंग-बिरंगे पेंट लगाए जाते हैं, पैरों में झूल, गले में घुंघरू और मोरपंख बांधे जाते हैं। फिर पारंपरिक नृत्य के साथ उन्हें हनुमान मंदिर तक ले जाकर अभिषेक किया जाता है। कुछ स्थानों पर बैल जोड़ी की दौड़ भी कराई जाती है। भोमका शिवप्रसाद ने बताया कि यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है और दीपावली केवल समृद्धि का नहीं बल्कि जनजाति अस्तित्व का प्रतीक पर्व भी है। इस दिन पशुपालक (ठाठ्या) समाज के लोग विशेष सम्मान के पात्र होते हैं और उन्हें मिठाई, कपड़े एवं नगद देकर सम्मानित किया जाता है। मेले में स्थानीय युवाओं ने पारंपरिक डंडार नृत्य प्रस्तुत किया। गायकी समाज के कलाकारों ने बांसुरी, ढोलक, कौड़ी की माला और घुंघरू पहनकर मनमोहक प्रस्तुतियां दीं, जिसे देखने आसपास के गांवों से लोग पहुंचे और उत्सव का आनंद लिया।

Views Today: 6

Total Views: 296

Leave a Reply

लेटेस्ट न्यूज़

MP Info लेटेस्ट न्यूज़

error: Content is protected !!