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भगवान के दर्शन संत दर्शन में हैं : मदनमोहन महाराज
-संतों की अगुवाई में कलश यात्रा के साथ श्रीराम कथा प्रारम्भ
अनोखा तीर, हरदा। साधु नारियल के समान होते हैं जो ऊपर से तो कठोर नजर आते हैं, लेकिन अंदर से उतने ही कोमल हृदय होते हैं। इन महापुरुषों का जीवन परमार्थ के लिए होता है। सच कहूं तो साधु संत वास्तव में गंगा, यमुना, नर्मदा जैसी पवित्र नदियों, वृक्ष, पहाड़ों और पृथ्वी के समान होते हैं, जो खुद तो अपने जीवन में कष्ट सह लेते हैं, लेकिन प्राणीमात्र का कल्याण करने का सामर्थ्य रखते हैं। यह सब एक प्रकार से परोपकारी महात्मा ही है। साधु संतो के जीवन में कितने कठोर तप और साधनाएं होती है इसे सामान्य व्यक्ति देख और समझ नहीं सकता, वह स्वयं तो भजन करते हैं और दूसरों को भोजन कराते हैं। उनके तप और तपस्या से जो अमृत निकलकर आता है वह समाज को परोस देते हैं। उक्त विचार वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक मदनमोहन जी महाराज ने श्रीराम कथा के शुभारंभ अवसर पर व्यक्त किए। स्थानीय कच्छकड़वा पाटीदार भवन में आयोजित श्रीराम कथा का आज प्रथम दिवस था। श्रीराम कथा से पूर्व ब्रह्मलीन श्री मस्तरामदास जी त्यागी महाराज की तपोभूमि आश्रम से श्रीरामचरितमानस ग्रंथ के साथ कलश यात्रा निकाली गई। यह कलश यात्रा साधु-संतों की अगुवाई में पूरे भक्ति भाव के भजनों की स्वरलहरियों के साथ नाचते गाते कच्छकड़वा पाटीदार भवन पहुंची। इस यात्रा में विभिन्न स्थानों से आए साधु-संत बग्घी पर सवार होकर, तो वहीं कुछ यात्रा में श्रीराम नाम कीर्तन करते चल रहे थे। कथा के यजमान प्रहलाद शर्मा व श्रीमती कौशल्या शर्मा, पुष्करराव व श्रीमती सीमाराव तथा हरिशंकर राठौर व श्रीमती शोभा राठौर श्रीरामचरित मानस ग्रंथ तथा कलश लेकर कथास्थल पर पहुंचे। कथास्थल पर धनपाड़ा के संत अशोकदास जी त्यागी, सीलफाटा मुंबई से पधारे महामंडलेश्वर बाल योगी बालकदास जी महाराज, महामंडलेश्वर श्री सीताराम दास जी महाराज मोहनपुर, संत श्री रामसेवक दास जी महाराज चिड़ावा राजस्थान द्वारा व्यासपीठ का पूजन तथा श्रीरामचरितमानस ग्रंथ को व्यासपीठ पर विराजमान करते हुए कथा का शास्त्रोक्त विधि विधान से शुभारम्भ किया गया। श्रीराम कथा दौरान कथावाचक श्री मदनमोहन जी महाराज ने कहा कि जब मैं हरदा आया और तपोनिष्ट संत ब्राह्मण मस्तराम बाबा की तपोभूमि आश्रम पहुंचा, तो वहां दंडवत प्रणाम करते ही एक आत्मसुख की अनुभूति हुई। जिस स्थान पर चातुर्मास श्रीसीताराम जाप चलें हो, जहां रामभक्त श्री हनुमान जी महाराज का दिव्य विग्रह विराजमान हो और जिस स्थान पर मस्तराम बाबा जैसे त्यागी संत द्वारा तपस्या की गई हो वह स्थान वैसे ही पूजनीय हो जाता है। उन्होंने कहा कि इस स्थान को देखने उपरांत मुझे भक्तमाल का एक संस्मरण याद आ गया। एक बार भगवान भोलेनाथ मां पार्वती के साथ जगत भ्रमण पर निकले थे, तभी एक स्थान पर भोलेनाथ ने रुककर दंडवत प्रणाम किया। माता पार्वती ने देखा कि भोले बाबा किसे प्रणाम कर रहे हैं यहां तो कोई नजर नहीं आ रहा है, तब उन्होंने भोले बाबा से पूछा तो भोलेनाथ ने बताया कि देवी आज से 10 हजार वर्ष पहले यहां एक भक्त द्वारा सीताराम कीर्तन किया गया था, यह वह पवित्र स्थान है। फिर कुछ समय चलने पर भोलेनाथ ने अपना त्रिशूल और कमंडल माता को सौंपकर एक पीपल के स्थान को पुन: दंडवत प्रणाम किया। माता के पूछने पर भोले बाबा ने बताया कि अगले 10 हजार वर्ष पश्चात यहां एक महान संत पैदा होंगे और वह वहां बैठकर तपस्या करेंगे। जिस स्थान पर संत द्वारा तपस्या की गई हो और भक्तों द्वारा सीताराम कीर्तन किया गया हो वह स्थान अपने आप में किसी तीर्थ से कम नहीं है। महाराज श्री ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है कि  राम से बड़ा राम का नाम। श्रीराम का नाम निर्गुण और सगुण दोनों से बढ़कर है। जब महापुरुषों द्वारा ईश्वर की सेवा की जाती है तो ईश्वर नाम भगवान के रूप में प्रकट होता हैं। वहीं भगवान का दर्शन संत दर्शन में होता है। श्री मदन मोहन जी महाराज ने कहा कि हम पिछले 9 दिनों से तीर्थराज प्रयागराज में कथा कर रहे थे। प्रयागराज को लेकर भारद्वाज ऋषि ने कहा है कि जब संत प्रयागराज जाते हैं तो प्रयागराज धन्य हो जाता है।  उन्होंने कहा कि हमारे सारे तपों का फल प्रभु दर्शन के लिए और जब प्रभु के दर्शन हो जाते हैं तो उसके फल से हमें संतों का दर्शन होता है। भारद्वाज ऋषि कहते हैं कि जब संत प्रयागराज जाते हैं तो प्रयागराज उन संतों के दर्शन से स्वयं को धन्य महसूस करता है। महाराज श्री ने कहा कि भक्ति की शक्ति का एक और प्रसंग याद आता है। एक संत महात्मा एकांत में सीताराम जाप कर रहे थे, लंबे समय तक सीताराम जाप करने से प्रसन्न होकर देवता वहां प्रकट हुए और उन्होंने संत महात्मा से कहा कि आपकी भक्ति से प्रसन्न होकर हम आपको वर देना चाहते हैं। आपकी क्या इच्छा है, वह बताइए तब संत ने कहा कि मुझे कुछ नहीं चाहिए। लेकिन देवताओं ने कहा कि अगर आप हमसे कुछ नहीं मांगोगे तो यह हमारा अपमान होगा और एक संत के द्वारा देवताओं का अपमान करना उचित नहीं है। संत ने कहा कि मैं आपका अपमान नहीं करना चाहता और आप देना ही चाहते हैं तो जगत का कल्याण कर दीजिए, किसी को कोई कष्ट ना हो। देवताओं ने कहा कि यह संभव नहीं है। हर प्राणी अपने कर्म का फल भोगता है और उसके प्रारब्ध से ही उसका जन्म होता है। लेकिन हम इतना कर सकते हैं कि जो भी व्यक्ति आपके दर्शन करेगा अथवा आपके भक्ति स्थल पर आकर प्रार्थना करेगा या दंडवत करेगा तो उसके सभी कष्ट दूर हो जाएंगे। महात्मा ने कहा कि आप चाहे जिस विधि से कर सकते हैं, लेकिन इतना ध्यान रहे कि उन्हें यह पता नहीं होना चाहिए कि यह सब मेरे कारण हुआ है। महाराज श्री ने कहा कि इस तरह साधु संत अपनी तपस्या का फल हम सबको दे देते हैं, लेकिन उसका प्रगटिकरण कभी नहीं करते। यह हमारा सौभाग्य है कि आज हमें एक तपनिष्ट संत की कृपा से और यहां विराजमान विभिन्न स्थानों से आए साधु संतों के सानिध्य में श्री राम कथा श्रवण का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। कथा के प्रथम दिवस कुछ ही प्रसंगों और मंगलाचरण के साथ कथा को विश्राम दिया गया। द्वितीय दिवस की कथा पूर्ण नियोजित समय अनुसार दोपहर 1 बजे से 5 बजे तक होगी।

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