-पशुपालन से किसानों का रुझान कम
अनोखा तीर, मसनगांव। ग्रामीण क्षेत्रों में दूध की खपत तेजी से बढ़ रही है, लेकिन दुधारू पशुओं की संख्या में लगातार गिरावट चिंता का विषय बनती जा रही है। पहले गांवों में गाय, भैंस और बैल घर की शान माने जाते थे। बैंक अधिकारी भी लोन स्वीकृत करते समय सबसे पहले घर में पशुओं की संख्या पूछते थे। परंतु आधुनिकता, मशीनों पर बढ़ती निर्भरता और पशुपालन की बढ़ती लागत ने ग्रामीणों को इससे दूर कर दिया है। पहले किसान मुर्रा भैंस, जर्सी, होलस्टीन, गीर और देसी गाय जैसी नस्लों के पशु पालते थे। खेतों में काम के लिए मजबूत बैल पहली पसंद होते थे। इन्हीं पशुओं से गोबर की खाद मिलती, जिससे फसलों का उत्पादन बेहतर होता था। लेकिन ट्रैक्टर आने के बाद बैलों का उपयोग घटा, रासायनिक खाद की बढ़ती प्रवृत्ति और हार्वेस्टर से कटाई के चलते गोबर की खाद मिलना भी लगभग बंद हो गया। जिले में वर्तमान में 79827 भैंस और 1,38,411 गौवंश शेष हैं, जबकि पहले लगभग हर किसान के घर में गाय-भैंस पाई जाती थी। अब स्थिति यह है कि ग्रामीण सुबह-शाम दूध खरीदने के लिए डेयरी या पीएमसी सेंटरों पर निर्भर हैं। यहां गाय का दूध 25 से 35 रुपये तथा भैंस का दूध 45 से 60 रुपये प्रति लीटर तक बेचा जा रहा है। पूर्व में मसनगांव क्षेत्र से प्रतिदिन लगभग 500 लीटर दूध हरदा डेयरी भेजा जाता था। आसपास के गांव कांकरिया, कामताड़ा, डोमनमऊ आदि से भी दूध एकत्र कर हरदा होते हुए भोपाल भेजा जाता था। अब हालात उलट हैं। ग्रामीण स्वयं दूध के लिए बाहर से आए दूध पर निर्भर हो रहे हैं, जबकि होटलों पर भोपाल से लाया गया दूध उपयोग किया जा रहा है। यदि यही स्थिति रही तो भविष्य में दूध की किल्लत गहरा सकती है। इसलिए पशुपालन विभाग द्वारा ग्रामीणों को प्रोत्साहन देकर दुधारू पशुओं की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता है।
महंगा पशु आहार और बढ़ती कीमतें बनी चुनौती
पशु आहार की लागत और दुधारू पशुओं की कीमतों में भारी वृद्धि ने पशुपालकों को हतोत्साहित किया है। पहले जो खली चुरी (चोकर) 400 रुपये प्रति बोरी मिलती थी, वह अब 2000 रुपये प्रति बोरी हो गई है। गेहूं, चावल और चने की चुरी की कीमतों में भी बड़ा इजाफा हुआ है। हार्वेस्टर से कटाई के कारण भूसे की कमी और मशीन से भूसा बनाने की प्रक्रिया के चलते उसका मूल्य भी बढ़ गया है। पशुपालक परसराम पाटिल ने बताया कि पशुपालन में दिनभर देखभाल, श्रम और समय की जरूरत होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों की कमी भी एक बड़ी समस्या है। पहले जो मजदूर एक महीने के काम पर तीन मन गेहूं लेता था, अब वह सात मन गेहूं की मांग कर रहा है। गाय और भैंस की कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी हुई है। पहले 10 से 12 हजार रुपये की मिलने वाली गाय अब 40 से 45 हजार रुपये तक और भैंस 65 हजार से 95 हजार रुपये तक में बिक रही हैं। जबकि दूध की कीमत 25 से 65 रुपये प्रति लीटर फेट के आधार पर तय होती है। लगातार बढ़ती लागत, मजदूरों की कमी और कम लाभ के कारण पशुपालक दुधारू पशु पालने से दूरी बना रहे हैं। यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो किसानों को गोबर खाद के स्थान पर महंगे रासायनिक खाद पर पूरी तरह निर्भर होना पड़ेगा।
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