हमने देखा है मस्तराम बाबा का प्रताप

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-बाबा कहते थे जब जग सोता है तो संतों को जागना चाहिए
अनोखा तीर, हरदा। ब्रम्हलीन मस्तरामदास जी त्यागी महाराज की तपोभूमि आश्रम के जीर्णोद्धार तथा चातुर्मास श्रीसीताराम जाप के चलते बाबा का सानिध्य प्राप्त करने वाले भक्तों को सर्वाधिक प्रसन्नता हो रही है। जिस स्थान पर मस्तराम बाबा के पास आकर घंटों बैठे रहते थे, बगैर बाबा के दर्शन किए दिन अधूरा लगता था आज वह स्थान भव्य स्वरूप प्राप्त कर चुका है। हरदा शहर में ऐसे अनेक भक्त रहे हैं जिन्होंने वर्षों मस्तराम बाबा के साथ रहते हुए उनका प्रभाव और स्वभाव देखा है। हमने ऐसे भक्तों से चर्चा करते हुए बाबा के बारे में जानने की कोशिश की है। बाबा की विशेष कृपा पात्र दिनेशचन्द्र दुबे जिन्हें बाबा ठेकेदार के नाम से ही बुलाते थे और पंडित भागीरथ शर्मा एवं सिंचाई विभाग के सेवानिवृत्त एसडीओ सुभाषचंद्र सिघंई ने अनौपचारिक बातचीत में बताया कि मस्तराम बाबा के पास बड़ी संख्या में साधु-संतों का आना-जाना लगा रहता था, लेकिन वह केवल भक्तानंदो को ही महत्व देते थे। संत भी बाबा से डरते थे। लोभी और ढोंगी साधु का बाबा के पास कोई स्थान नहीं था उन्हें आश्रम पर बैठने भी नहीं देते थे। दिनेशचन्द्र दुबे ने बताया कि बाबा केवल दिन में एक बार भोजन प्रसादी ग्रहण करते थे, वह भी स्वयं बनाते थे। लेकिन उनके हाथ के टिक्कड़ में वह स्वाद होता था कि हम उन्हें खाने के लिए घर का खाना छोड़ देते थे। बाबा ने निद्रा पर तो जैसे विजय प्राप्त कर ली थी। वह कब सोते थे यह किसी ने नहीं देखा। एक बार दिनेश भैया सराफ, हरि पहलवान, टीआई अरुण खेमरिया जैसे हम कुछ लोग बैठे थे तब हमने पूछा बाबा आप सोते कब हो? खेमरिया जी ने कहा कि मैं जब भी रात को निकलता हूं तब बाबा जागते हुए मिलते हैं। तब बाबा ने कहा कि जब जग सोता है तब संतों को जागना चाहिए। श्री दुबे ने बताया कि जब बाबा का अंतिम समय करीब आया तब भी मैं उनकी सेवा में था। बाबा ने मुझे बताया कि ठेकेदार अब जाने का समय आ गया है, मेरी देह का नर्मदा तट पर अग्निसंस्कार करना। मैंने कहा बाबा आप ठीक हो जाओगे, मैंने तत्काल डॉ. मनीष शर्मा को बताया और वह भी फोन करते ही यहां आ गये। लेकिन बाबा ने कहा कि अब कोई दवा काम नहीं करेगी, बस भजन करो। जब बाबा ने शरीर छोड़ा तो इस बात की खबर भक्तों को जैसे ही लगी, तो यहां भक्तों का मेला लग गया था। बाबा की पुण्य देह को पालकी में सवार कर नर्मदा तट नेमावर ले गए। वहां देखकर हम सब हेरान हो गये कि पता नहीं कहां कहां से इतना जौ, तिल और घी के पीपे, नारियल के बोरे आ गये। पूरा अंतिम संस्कार नारियल जौं, तिल आदि से किया गया। स्व हरिनारायण त्यागी हरि पहलवान बाबा की अस्थियां लेकर गंगाजी गये थे।
पंडित भागीरथ शर्मा ने बताया कि बाबा के प्रताप को मैं कभी नहीं भूल सकता। जब उनकी शरण में आया था तो मेरी स्थिति ऐसे भी नहीं थी कि ठीक से कपड़े पहन सकूं। आर्थिक हालात बहुत दयनीय थे। बाबा केवल एक बात कहते थे भजन करो, भगवान का नाम जपों और अपना कर्म करते जाओ। बाबा के उपदेश वचनों का ही प्रताप है कि आज प्रभु कृपा से आनंदमय जीवन है। पंडित जी ने बताया कि बाबा को रामचरितमानस तो जैसे मौखिक याद थी। हर समय कोई ना कोई चौपाई बोलते सुनाते रहते थे। माघ महीने में प्रयागराज में एक महीने रहते और सबसे पहले चार बजे ही संगम पर जाकर स्नान करके भजन करने बैठ जाते थे। शहर के कुछ भक्त बाबा को लेकर रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग भी गये थे तो उन्होंने बताया कि बाबा ने पूरे रास्ते ना तो भोजन प्रसादी ग्रहण की और ना ही मल मूत्र त्याग किया। वहां पहुंचने के बाद ही सबकुछ करने उपरांत दर्शन करके ही भोजन प्रसादी ग्रहण की थी। ठेकेदार दिनेश चन्द्र दुबे, पंडित भागीरथ शर्मा एवं सुभाष बाबा सिघंई ने बताया कि बाबा के खास अनुयायियों में लाड़ली बाबू, प्रभात तिवारी, स्व.दिनेशचन्द्र सराफ, स्व.मधुसुदन अग्रवाल, स्व. हरिनारायण त्यागी हरि पहलवान, स्व.राजेन्द्र सराफ, राजेन्द्र पालीवाल, रेवाराम पटेल भोनखेड़ी, रामदास शर्मा, लक्ष्मीनारायण बादर, राजकुमार पालीवाल, वि_लदास अग्रवाल, अरुण खेमरिया, पांडे हवलदार जैसे व्यापारी वर्ग और नौकरी पेशा लोगों की भी एक बड़ी फौज हुआ करती थी। दिनेश चन्द्र दुबे ने कहा कि बाबा के शरीर छोड़ने पश्चात हम लोगों का यहां आना बंद हो गया था। लेकिन आज जब हमने देखा कि बाबा का तपोभूमि आश्रम एक भव्य स्वरूप प्राप्त कर चुका है और यहां बाबा की प्रतिमा भी स्थापित हो रही है, तो हम उसी श्रद्धा भाव से यहां आएं हैं। हमें यह सब देखकर अत्यंत प्रसन्नता भी हो रही है और ऐसा एहसास हो रहा जैसे बाबा आज भी हमारे बीच ही उपस्थित हैं, जो कुछ ही देर में कहेंगे कि ठेकेदार देखी सीताराम जी की महिमा, आज कैसे मेला लगा है और श्रीराम कथा भी होने वाली है। यह सब बाबा के भजन और तप का ही परिणाम है।

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