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Saturday, 17 October 2026
हरदा

बेटे के बलिदान को पहचान मिले

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गैस पीड़ितो की सहायता करते जान गंवाने वाले तिलक के पिता की इच्छा

भोपाल गैस त्रासदी, जो 2-3 दिसंबर 1984 की रात हुई, मानव इतिहास की सबसे भयानक औद्योगिक दुर्घटनाओं में से एक है। यूनियन कार्बाइड की फैक्ट्री से मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव के कारण हुई इस त्रासदी में हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई, और अनगिनत लोग आज भी इसके दीर्घकालिक प्रभावों से पीड़ित हैं। इस तबाही के बीच, कई अद्भुत बहादुरी और बलिदान की कहानियां उभरकर सामने आईं। ऐसी ही एक कहानी है तिलक तिवारी की, जिन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा शौर्य चक्र और मध्य प्रदेश सरकार द्वारा मानव सेवा सम्मान से सम्मानित किया गया।

त्रासदी के बीच एक नायक

तिलक तिवारी, एक युवा और साहसी व्यक्ति, भोपाल रेलवे स्टेशन के पास रेलवे कॉलोनी में रहते थे। उनके पिता, सुखदेव तिवारी, उस समय भारतीय रेलवे में गार्ड के पद पर कार्यरत थे। त्रासदी की रात, जब जहरीली गैस ने शहर को घेर लिया, तिलक ने अपनी जान की परवाह किए बिना दूसरों की मदद करने का फैसला किया।

जहां अधिकांश लोग अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे, तिलक ने संकट के बीच जाकर अपने पड़ोसियों की मदद की, बुजुर्गों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया, और लोगों को सुरक्षित रास्ते दिखाए। अपनी इस निस्वार्थ सेवा के दौरान, तिलक खुद जहरीली गैस की चपेट में आ गए और अपनी जान गंवा दी। उनकी बहादुरी और करुणा उन सभी के दिलों में आज भी जीवित है, जिन्होंने उन्हें देखा और जाना।

एक पिता की गुहार

कई दशक बाद, तिलक के पिता, सुखदेव तिवारी, अब एक वृद्ध व्यक्ति हैं, जो अपने बेटे के बलिदान का भार शांति और गरिमा के साथ उठाए हुए हैं। हालांकि उन्हें अपने बेटे की वीरता पर गर्व है, लेकिन उनके दिल में गहरे दुख की अनुभूति भी है। सुखदेव का मानना है कि तिलक के बलिदान को समाज में मान्यता मिलनी चाहिए, ताकि उनके बेटे की मानवता और साहस की मिसाल याद रखी जा सके।

सुखदेव तिवारी ने सरकार से एक विनम्र निवेदन किया है। वह चाहते हैं कि उनके बेटे तिलक तिवारी की याद में भोपाल या उनके पैतृक गांव खुरई में किसी सड़क, स्थान या स्मारक का नाम रखा जाए। उनका मानना है कि यह न केवल उनके बेटे के बलिदान को श्रद्धांजलि होगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनेगी।

भोपाल के नायकों को याद रखना

भोपाल गैस त्रासदी को अक्सर इसके भयावह आंकड़ों और दीर्घकालिक परिणामों के लिए याद किया जाता है, लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि उन नायकों को भी याद रखा जाए, जिन्होंने संकट के दौरान असाधारण साहस दिखाया। तिलक तिवारी जैसे लोग हमें यह याद दिलाते हैं कि सबसे कठिन समय में भी इंसान निस्वार्थता और बहादुरी का परिचय दे सकता है।

तिलक के नाम पर किसी सड़क या स्थान का नाम रखना न केवल उनके बलिदान का सम्मान होगा, बल्कि औद्योगिक लापरवाही की मानवीय कीमत की भी याद दिलाएगा। यह सुनिश्चित करेगा कि तिलक का नाम और उनकी वीरता आने वाली पीढ़ियों तक याद रहे और लोगों को जरूरत के समय मानवता की सेवा के लिए प्रेरित करे।

कार्रवाई का आह्वान

सरकार और स्थानीय प्रशासन के पास एक ऐसे अनसुने नायक को श्रद्धांजलि देने का अवसर है, जिसने अपनी जान देकर दूसरों की जान बचाई। सुखदेव तिवारी की अपील को मानकर तिलक तिवारी के बलिदान को मान्यता देना सिर्फ एक शोक संतप्त परिवार के लिए नहीं, बल्कि साहस, बलिदान और मानवता के मूल्यों को कायम रखने का एक तरीका है।

भोपाल या खुरई में उनके नाम पर किसी सड़क या स्थान का नामकरण तिलक की स्मृति को चिरस्थायी बना देगा। तिलक की कहानी को बताया जाना चाहिए, याद रखा जाना चाहिए और सराहा जाना चाहिए। दूसरों की भलाई के लिए अपने प्राणों का त्याग करने वाले तिलक का बलिदान हमें यह याद दिलाने के लिए पर्याप्त है कि सबसे अंधेरे समय में भी, नायक हमारे बीच मौजूद होते हैं।

अनिल माथुर

-लेखक जनसंपर्क विभाग के सेवानिवृत्त डायरेक्टर हैं

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