राज-काज, करवट बदलती मध्य प्रदेश कांग्रेस की राजनीति…

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 दिनेश निगम ‘त्यागी’


करवट बदलती मध्य प्रदेश कांग्रेस की राजनीति…

कांग्रेस में जो कभी देखने को नहीं मिला, वह हो रहा है। धारणा थी कि कांग्रेस सिर्फ चुनाव के दौरान सक्रिय होती है। चुनाव निपट जाने के बाद घर बैठ जाती है। कांग्रेस नेताओं पर संघर्ष न करने के आरोप लगते हैं, पर अब प्रदेश कांग्रेस की राजनीति करवट बदलती दिख रही है। कोशिश संघर्ष न करने के आरोप से उबरने की है। इसमें भूमिका निभा रहे हैं नए प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी। हालांकि आधा साल से ज्यादा गुजर जाने के बावजूद वे अपनी टीम गठित नहीं कर सके, लेकिन उनकी सक्रियता तारीफ के काबिल है। लोकसभा चुनाव के बाद बीते एक माह पर नजर दौड़ाएं तो पहले कांग्रेस ने इंदौर, भोपाल, सागर, छतरपुर, उज्जैन, लहार, दतिया सहित प्रदेश के कई जिलों में अच्छे प्रदर्शन किए और अब भोपाल में आंदोलनों की झड़ी लगा दी। कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग, महिला कांग्रेस और युकां ने राजधानी में बड़े आंदोलन किए। आंदोलनकारियों को रोकने के लिए वाटर कैनन से पानी की बौछार और अश्रु गैस के गोले छोड़ने पड़े। पटवारी सहित कांग्रेस के कई नेता और कार्यकर्ता घायल हुए। कटनी में दादी और पोते की थाने में पिटाई हुई तो जीतू वहां भी जा धमके और कार्रवाई की मांग को लेकर धरने पर बैठ गए। लगता है कांग्रेस को अकल आ गई है कि बिना पांच साल संघर्ष किए सत्ता हासिल नहीं की जा सकती।


‘एक साधे-सब सधै’ की तर्ज पर मेहरबान ‘मोहन’….
केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया केंद्रीय राजनीति में कितने ताकतवर हैं, इसका आंकलन तो संभव नहीं लेकिन मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव जरूर ‘एक साधे-सब सधे’ की तर्ज पर उन पर मेहरबान हैं। प्रदेश भाजपा का शायद ही कोई नेता हो, जिसे सिंधिया जैसा महत्व मिलता हो। डॉ.यादव मुख्यमंत्री बने तो मंत्रिमंडल के गठन में उनकी ज्यादा भूमिका नहीं थी, लेकिन विभागों के वितरण में सिंधिया समर्थकों का खास ख्याल रखा गया। गोविंद सिंह राजपूत, तुलसी सिलावट और प्रद्युम्न सिंह तोमर जैसे सभी समर्थकों के पास अच्छे विभाग हैं। 8 माह बाद जब मंत्रियों को जिलों के प्रभार बांटे गए तब भी सिंधिया की मर्जी का ध्यान रखा गया। ग्वालियर, शिवपुरी और गुना जैसे उनके प्रभाव वाले जिलों का प्रभार उनके कट्टर समर्थकों को मिला। और अब ग्वालियर की ‘रीजनल इंडस्ट्री कांक्लेव’। यहां अडानी जैसे उद्योगपति पहुंचे और निवेश की घोषणा की। मुख्यमंत्री डॉ.यादव ने पूरे अंचल के लिए घोषणाओं की झड़ी लगाई। आठ हजार करोड़ के निवेश की घोषणा से सिंधिया गदगद हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ.यादव की जमकर तारीफ की और कहा कि प्रदेश को पहली बार ऐसा मुख्यमंत्री मिला है जो प्रदेश के औद्योगिक विकास में रुचि ले रहा है। मुख्यमंत्री डॉ.यादव ने भी सिंधिया की तारीफ के पुल बांधे। तो क्या भाजपा में यादव-सिंधिया का नया गुट तैयार हो रहा है?


भाजपा की राजनीति में ‘एक और टाइगर की एंट्री’ …
प्रदेश की राजनीति में तीसरे टाइगर का उदय हो गया है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरदित्य सिंधिया के बाद अब भाजपा के एक और नेता ने कहा कि ‘टाइगर अभी जिंदा है’ । ये तीसरे नेता हैं पूर्व सांसद केपी सिंह यादव। शिवराज और ज्योतिरािदत्य दोनों साबित कर चुके कि वे ‘टाइगर’ हैं जबकि केपी के सामने खुद को ‘टाइगर’ साबित करने की चुनौती है। शिवराज को विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बनने का मौका नहीं मिला तो उन्होंने समर्थकों से कहा था कि ‘टाइगर अभी जिंदा है’। बाद में वे केंद्रीय मंत्री बने और कृषि एवं ग्रामीण विकास विभाग जैसे बड़े विभाग मिले। कांग्रेस नेताओं कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के साथ तनातनी के बीच ज्योतिरादित्य ने कहा था कि ‘टाइगर अभी जिंदा है’। अब वे केंद्र में ताकतवर मंत्री हैं। तीसरे केपी न शिवराज जैसे ताकतवर हैं न ही ज्योतिरादित्य जैसे रसूख वाले। सच यह है कि केपी के साथ ज्यादा अन्याय हुआ है। उन्होंने भाजपा के टिकट पर ज्योतिरादित्य को हराया था लेकिन नेतृत्व ने सिंधिया को ही भाजपा का टिकट थमा दिया। उम्मीद थी कि सिंधिया द्वारा खाली की गई राज्यसभा सीट उन्हें मिलेगी लेकिन यहां भी पत्ता कट गया। इसलिए समर्थकों के बीच केपी ने कहा कि ‘आप चिंता न करें, टाइगर अभी जिंदा है। केपी खुद को कैसे साबित करेंगे, इस पर सबकी नजर है।


कमलनाथ ने मुकेश को दिखाया बाहर का रास्ता…
कांग्रेस में जितने चर्चित वरिष्ठ नेता कमलनाथ थे, उससे कहीं ज्यादा उनके साथ 20 साल से साए की तरह रहने वाले अंगरक्षक मुकेश जाट। मुकेश इतने पॉवरफुल थे कि चाहे जब जिसका अपमान कर देते। क्या मजाल कि उनकी मर्जी के बगैर कोई कमलनाथ से मुलाकात कर ले। मिलने जाने वाला कितना भी पॉवरफुल क्यों न हो, मुकेश उसकी लू उतार देते थे। कांग्रेस के नेता और अफसर कमलनाथ से ज्यादा मुकेश से डरते थे। सरकार के कई आला अफसरों को वे नाम लेकर बुलाते थे। कमलनाथ मुख्यमंत्री थे तब मुकेश के सुपर सीएम जैसे जलवे थे। विधानसभा चुनाव के दौरान भी वे फुल फार्म में थे। उनके द्वारा टिकट के दावेदारों का अपमान रोजमर्रा की बात थी। कमलनाथ के पास शिकायतें आतीं, फिर भी वे मुकेश के खिलाफ कुछ सुनते तक नहीं थे। जब वे छिंदवाड़ा का लोकसभा चुनाव हारे तब उन्होंने अपनी कमजोरियों की ओर ध्यान दिया। पता चला कि बड़ी कमजोरियों में एक मुकेश जाट भी हैं। जिनके व्यवहार के कारण लोगों में नाराजगी है। लिहाजा, उन्होंने अपने इस पहरेदार को बाहर का रास्ता दिखा दिया। मुकेश परेशान है और फिर कमलनाथ कैंम्प में एंट्री लेने की कोशिश में। गलतियों के लिए वह माफी भी मांग रहा है। उन्हें माफी मिलती है या नहीं, इसका इंतजार है। इसके अलावा भी कमलनाथ टीम में कुछ और बदलाव की आहट है।


सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता मंत्री बंगलों का काम…
कांग्रेस की कमलनाथ सरकार के दौरान जब मंत्रियों के बंगलों को सजाया-संवारा जा रहा था, तब तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव की टिप्पणी थी, ‘मंत्रियों को अपने बंगलों में काम कराने से फुरसत नहीं है।’ उन्होंने यह भी कहा था कि जब तक मंत्रियों के बंगलों के काम पूरे होंगे तब तक इनमें रहने हम लोग आ जाएंगे। इत्तफाक से कांग्रेस सरकार गिर गई और शिवराज सिंह चौहान फिर मुख्यमंत्री बन गए। खास यह भी कि सरकार बदलने के बावजूद मंत्रियों के बंगलों पर काम-काज जारी रहा। विधानसभा चुनाव के बाद अब डॉ मोहन यादव मुख्यमंत्री हैं, तब भी बंगले वही हैं लेकिन उनमें मरम्मत और निर्माण का काम बंद नहीं हुआ। मजेदार बात यह कि अधिकारियों-कर्मचारियों के सरकारी आवासों की मरम्मत पर रोक लगा रखी गई है लेकिन मंत्रियों के बंगलों का काम सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता जा रहा है। सरकार ने आदेश ही निकाल दिया है कि मंत्री बंगलों में काम के लिए परमीशन की जरूरत नहीं है। मंत्री यह भूल जाते हैं कि जितना भव्य बंगला होगा, उस पर उतने ही लोगों की नजर रहेगी। पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह का बंगला इसका उदाहरण है। वे मंत्री नही रहे तो उनका बंगला कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और कैलाश विजयवर्गीय सहित हर प्रमुख मंत्री चाहता था। सवाल है, क्या मंत्री बंगलों पर होने वाले अनाप – शनाप खर्च पर रोक नहीं लग सकती?

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