एक डूबते सूरज की उदास सांझ….

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-नहीं रहे नईदुनिया के स्वर्णिम दौर के कलमकार देवेन्द्र जैन
नवीन उपाध्याय, हरदा।
स्मृतियां शूल भी होती है  और फूल भी… हरदा में पिछले चार दशको तक नईदुनिया के स्वर्णिम दौर के पत्रकार रहे देवेन्द्र जैन भैया के निधन की खबर ने आज स्तब्ध कर दिया। आज हरदा के स्थानीय मुक्तिधाम पर वे पंचतत्व में विलीन हो गए। जिस ख़ामोशी से देवेन्द्र भैया ने अपने नगर  को अलविदा किया। तब उगते सूरज के जगमगाते ताप और डूबते सूरज की उदास सांझ के फर्क को मानों बड़े करीब से जानां। बचपन में हरदा में घंटाघर चौक पर स्थित उनकी दुकान पर जाकर नईदुनिया, धर्मयुग, सरिता, कादंबिनी,दिनमान पड़ा करता था।  देवेन्द्र भैया ने 1968 से नईदुनिया में लिखना शुरू किया जो चार दशकों तक निरंतर जारी रहा…ये नईदुनिया के कालखंड का वह दौर था जब नईदुनिया में छपी खबर की हैसियत किसी दस्तावेज से कम नहीं हुआ करती थी। घंटाघर पर देवेन्द्र भैया की दुकान के ओटले पर रात्रि में हरदा के पत्रकारो, राजनेताओ और नगर के प्रबुद्ध वर्ग की बैठके हुआ करती थी। तब हरदा में सभी तरह की जनसभाए भी घंटाघर चौक पर ही हुआ करती थी। अखबारों की अहमियत, खबरों के असर और पत्रकारों की विश्वसनीयता का वह ऐसा दौर था जिसकी कल्पना भी अब बेमानी लगती है। अपनी निष्पक्ष लेखनी और नईदुनिया की गरिमा के मार्फत देवेन्द्र भैया ने एक ऐसे दौर की पत्रकारिता को जिया जो किसी तीर्थ के स्पंदन से सराबोर करती है। साईकल और कुर्ता पजामे के आवरण को ताउम्र आत्मसात कर जैन साहब ने आत्मसम्मान के जिन मापदंडो पर पत्रकारिता की।  उसकी साख को अंत तक कायम रखा। समय ने करवट बदली और दोनों पैरों के घुटनों ने जवाब दे दिया। चलना फिरना दूभर हो गया, कलम क्या थमी  लोगों की नजरें ही बदल गई। चार दशकों  के दौर में जैन साहब ने ना जाने कितने दिग्गजों के इन्टरव्यू लिये, ना जाने कितने राजनेताओ को संसद और विधानसभा के गलियारो तक पहुंचाया। शहर की साहित्य और संस्कृती की फिजा को कलम के मार्फत वर्षों तक महकाते रहे, लेकिन मोकापरस्त और वदगुमानी की बानगी देखिए पलक झपकते ही  पूरा नजारा ही बदला गया। आज ऐसी अनगिनत स्मृतियां जहन में है जो कहीं शूल के तरह वेदना से लथपथ हैं.. तो कहीं फूल की महक के मानिन्द गहरा सुकून देती हैं।
जैन साहब अंत में अपनी जिन्दगी के हर फलसफे के दौर की साक्षी रही अपनी आंखें यहीं दान कर गए। मैं अपने तीन दशक के पत्रकारिता के दौर में देवेन्द्र भैया जैसी सहजता और सहृदयता को नहीं खोज सका। वे उजास के असंख्य सूर्यो के मानों ऐसे प्रकाश पुंज थे, जिनकी आभा सदैव आत्मा को आलौकिक करती थी। आपकी कमी जीवन की हर दुरूह राह में बैचेन करती रहेगी। दैनिक अनोखा तीर परिवार की ओर से भी शत- शत नमन, विनम्र श्रद्धांजली।

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