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Tuesday, 20 October 2026
बैतूल

बैतूल लोस चुनाव की जमीनी हकीकत

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राधेश्याम सिन्हा, बैतूल। बैतूल-हरदा-हरसूद लोक सभा क्षेत्र में 7 मई को अर्थात कल मतदान होना है। जिसके लिए भाजपा की तैयारी साफ दिख रही है लेकिन मतदाताओं में कोई उत्साह नजर नहीं आ रही है, जिससे उदासीनता बनी हुई है। वही प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस की जमीनी स्थिति समझ से परे नजर आ रही है। इसके पीछे जानकारों का मत है कि जिले की कांग्रेसी सिर्फ और सिर्फ दिखावा के लिए काम कर रहे हैं जो कि निश्चित ही कांग्रेस के लिए घातक सिद्ध होने वाला है। जबकि कांग्रेस में एकजुटता के साथ सक्रियता होती तो निश्चित ही मौजूद भाजपा सांसद और भाजपा प्रत्याशी डीडी उईके के खाते में कोई उपलब्धि दर्ज नहीं होने का फायदा कांग्रेसी उठा सकते थे लेकिन ऐसा नहीं होना कांग्रेस के लिए अत्यंत खेद जनक है। परंतु दूसरी ओर भाजपा के लोग ओवर कॉन्फिडेंस में चल रहे हैं। जानकारी के मुताबिक बैतूल-हरदा लोकसभा क्षेत्र में आजादी के बाद लगभग चार दशक तक कांग्रेस का ही वर्चस्व रहा है। यानी यह कहा जाए कि लगभग लगातार आठ लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का वर्चस्व रहा है और इस लिहाज से केंद्रीय नेतृत्व द्वारा बैतूल-हरदा संसदीय क्षेत्र को सुरक्षित सीट के रूप में यहां से आयातित प्रत्याशियों को थोपते गए हैं और बैतूल-हरदा क्षेत्र के मतदाता उन्हें सिर आंखों पर स्वीकार भी करते रहे। लेकिन वह दौर बदला और बैतूल के स्थानीय उम्मीदवार के रूप में जब भाजपा ने पहली बार भाजपा तत्कालीन जिलाध्यक्ष विजय कुमार खंडेलवाल को मैदान में उतरा। परिणामत: श्री खंडेलवास्ल ने बाहरी प्रत्याशियों को धूल चटा दिया। 1996 में विजय कुमार खंडेलवाल ने विजय हासिल किया और फिर उसके बाद कांग्रेस भी स्थानीय प्रत्याशी देने लगे। लेकिन तब तक समय काफी लेट हो चुका था जिसके चलते भाजपा की जिले में गहरी पैठ जम चुकी थी। लिहाजा यही हुआ कि बैतूल-हरदा संसदीय क्षेत्र में लगातार भाजपा प्रत्याशी विजय श्री लेने लगे। हालांकि लगातार लोस के चार चुनाव विजय कुमार खंडेलवाल जीत हासिल करते रहे। लेकिन उनके असामयिक निधन होने के बाद 2008 में हुए उप चुनाव में उनके ही पुत्र हेमंत खंडेलवाल ने जीत हासिल किया। हालांकि उनका कार्यकाल सिर्फ एक वर्ष का था। इसके बाद परिसीमन में अनुसूचित जनजाति के लिए बैतूल-हरदा लोकसभा क्षेत्र आरक्षित हो गया। अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित होने के बाद लोस के तीन चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस पराजित तो हुए लेकिन कांग्रेस का वोट बैंक लगातार गिरते चला गया। आरक्षण के बाद 2024 का यह लोकसभा का चौथ चुनाव है। इस चुनाव में भी कांग्रेस में एकजुटता नहीं होने से अच्छी स्थिति की कल्पना करना बेमानी लग रहा है। गौरतलब है कि कांग्रेस ने पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी रहे रामू टेकाम को इस बार भी दोबारा मौका दे दिया। जबकि पिछली बार 3 लाख 60 हजार से अधिक वोटों से उनकी हार हुई थी। इसलिए उनकी टिकिट के फाइनल होते ही बैतूल में कांग्रेस के एक गुट विशेष द्वारा जमकर विरोध किया था। राजनीतिक प्रेक्षकों ने तभी कांग्रेस का इस चुनाव में किस तरह का प्रदर्शन होने वाला है, उसका अनुमान लगा लिए थे जो कि साफ दिखाई दे रहा है।

क्या कर रहे हैं कांग्रेस के कर्णधार

बैतूल-हरदा हरसूद लोकसभा क्षेत्र में मात्र 12 घंटे बाद मतदान होना है। लेकिन अभी कांग्रेस के जिम्मेदार कर्णधार क्या कर रहे हैं बिल्कुल समझ से परे नजर आ रहे है। यहां बता दें कि 2023 में हुए विधानसभा के चुनाव में जिले की सभी पांचों सीटों पर कांग्रेस की करारी हार हो चुकी है। जिससे आहत सभी पांचों पूर्व विधायकों के परफॉर्मेंस इस चुनाव में बेहतर होने की कल्पना नहीं की जा सकती। इस संदर्भ में जब कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हेमंत वागद्रे से राय जानने उनके मोबाइल पर फोन किया तो वे फोन रिसीव नहीं किया। जिला कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता रहे वरिष्ठ कांग्रेसी हेमंत पगारिया से चर्चा हुई तो उन्होंने बताया कि वे अपने बेटे की शादी में व्यस्त हैं। इस समय वे चुनावी गतिविधियों से अपने आप को बिलकुल अलग रखे हुए हैं। कांग्रेस प्रत्याशी रामू टेकाम के खास मित्र केंद्रीय बैंक के पूर्व अध्यक्ष वरिष्ठ कांग्रेस नेता अरुण गोठी जरूर पिछले 10 दिनों से विधान सभा क्षेत्र हरसूद में डटे हुए हैं। यहां यह उल्लेख करना भी लाजिमी होगा कि पिछले 2019 के विधानसभा चुनाव में जिले के चार विस सीटों में कांग्रेस की जीत हुई थी। जिसका श्रेय कांग्रेस कमेटी के जिलाध्यक्ष रहे सुनील शर्मा की भूमिका की प्रशंसा हुई थी। लेकिन वे अभी हाल ही में भाजपा का दामन थाम लिया है और वे भाजपा के लिए सक्रिय नजर आ रहे हैं। वहीं कई ऐसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं जिनकी पूछ परख नहीं होने के कारण वे अपने घर पर बैठे हुए हैं।

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