अपने तो अपने होते हैं, विधानसभा चुनाव में दिखे अपनत्व के दृश्य

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चुनाव परिणाम ने इंदौर के सभी भाजपा प्रत्याशियों के चेहरे कमल की तरह खिला दिए। इस बीच तमाम मुस्कुराते चेहरों के बीच एक दृश्य ऐसा भी रहा, जिसमें आंखों में आंसू थे। दरअसल भाजपा के लिए शहर में सबसे कठिन मानी जा रही विधानसभा तीन की सीट पर गोलू शुक्ला ने जीत दर्ज की। जीत भी ऐसी कि उनसे पहले यहां भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के पुत्र आकाश भी इतने मतों से जीत न सके थे। जीत के बाद गोलू जब अपने बड़े भाई बब्बी शुक्ला से मिले तो भावनाएं आंखों से फूट पड़ी। इंदौर में भगवा पार्टी को मजबूत करने वाले शुक्ला परिवार से पहली बार कोई कमल निशान पर विधायक बना। अपनों से मिलकर ही आशीर्वाद और आश्रय दोनों मिलता है। हालिया चुनाव में इसी विधानसभा में ऐसा ही दृश्य चुनाव के पहले भी दिखा था, जब कांग्रेस प्रत्याशी पिंटू जोशी अपने बड़े भाई अश्विन से ‘मन’ मिलने के बाद गले मिले थे।
विधायक बनते ही बदले तेवर
प्रदेश में चर्चा मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर है तो इंदौरी अपने भिया विजयवर्गीय को तभी से पद का दावेदार मानने लगे थे, जब उन्हें प्रत्याशी बनाया गया था। चुनाव जीतने के बाद विजयवर्गीय के तेवर भी बदले-बदले नजर आते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने लाड़ली बहना योजना की तारीफ की थी, लेकिन अब लाड़ली बहना के सवाल पर कुछ खफा से हो जाते हैं। जीत का श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को देने में देर नहीं करते। उमा भारती के हटने के बाद ही उनकी मुख्यमंत्री बनने की इच्छा किसी से छिपी नहीं है। इतने सालों के बाद अब फिर उन्हें ‘अवसर’ नजर आ रहा है। वैसे संगठन में बिताया वक्त और नेतृत्व से निकटता विजयवर्गीय का दावा मजबूत करती है, लेकिन हमेशा अचरज करने वाली मोदी-शाह की जोड़ी इस बार क्या फैसला लेती है, इस पर सभी की निगाह है।
दरबार ने गिराया टीम सिंधिया का विकेट
सालों तक भगवा राजनीति में रचे बसे भंवर सिंह शेखावत दिल पर पत्थर रखकर कांग्रेस में गए जरूर थे, लेकिन फैसला सही साबित हुआ। भाजपा की प्रचंड लहर भी उनके मजबूत ‘हाथ’ को डिगा नहीं सकी। अपनी सरकार गिरने के बाद से ही कांग्रेस के निशाने पर भाजपा से ज्यादा ज्योतिरादित्य सिंधिया रहे हैं। ऐसे में दरबार ने अपनी अनदेखी का हिसाब भाजपा से वसूलते हुए कांग्रेस का भी हिसाब बराबर कर दिया। बदनावर में उन्होंने मंत्री राज्यवर्धन सिंह दत्तीगांव को हराकर सिंधिया खेमे का अहम ‘विकेट’ गिराया। पिछली बार भी इन्हीं दोनों में टक्कर थी, लेकिन दत्तीगांव कांग्रेस तो शेखावत भाजपा में थे। प्रदेश की राजनीति के साथ ही इस परिणाम का असर मप्र के क्रिकेट की राजनीति पर कितना पड़ता है, इस पर सभी की निगाह है। प्रदेश क्रिकेट में सिंधिया का सिक्का चलता है। सिंधिया की सहमति से ही यहां अहम पदों पर शेखावत के भाई सहित अन्य नजदीकी काबिज हैं।
कांग्रेस के साथ ही शहर के खिलाड़ी भी हैरान
हर चुनाव शहर के खिलाड़ियों के लिए चिंता बनकर आते हैं। बहुत पहले से स्टेडियम छिन जाता है और सरकार बनने के सालों तक ताले नहीं खुलते। मगर इस बार प्रशासन ने ऐसी सक्रियता दिखाई कि खुद खिलाड़ी भी वैसे ही अचरज में पड़ गए, बिल्कुल वैसे ही जैसे भाजपा की भव्य जीत ने कांग्रेस को अचरज में डाला है। मतगणना के बाद अल सुबह ही ईवीएम मशीनों को स्टेडियम से बाहर करते हुए खिलाड़ियों के अंदर आने का रास्ता तैयार कर दिया। कलेक्टर इलैया राजा टी इसके पहले खेलो इंडिया यूथ गेम्स के दौरान खेलों के प्रति गंभीरता दिखा चुके हैं। वह केंद्र सरकार का आयोजन था तो सक्रियता लाजमी थी, लेकिन मगर स्टेडियम के खिलाड़ियों के लिए ऐसी सक्रियता प्रशंसनीय है। कुछ दिनों में स्टेडियम पूरी तरह खिलाड़ियों का होगा। अब गेंद खिलाड़ियों के पाले में है। पदक जीतकर इंदौर का नाम खेल मैदान में रोशन करना उनकी जिम्मेदारी होगी।

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