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Thursday, 29 October 2026
राष्ट्रीय

साल में सिर्फ एक बार दिवाली के मौके पर खुलता है हसनंबा मंदिर, 800 साल पुराना है इतिहास

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हमारे देश में मंदिरों की कमी नहीं है और हर मंदिर के अपने अलग ही रहस्य होते हैं। ऐसी ही एक मंदिर के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं जो कि कर्नाटक राज्य में स्थित है। जिसका कपाट भक्तों के दर्शन के लिए साल में सिर्फ एक बार ही खोले जाते हैं, जिसे देखने और अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए भारतवर्ष से श्रद्धालु वहां पहुँचते हैं। बताया जाता है कि इस मंदिर का इतिहास 800 साल से ज्यादा पुराना है। आइए जानें विस्तार से यहां…

12वीं शताब्दी में किया गया निर्माण

इस मंदिर का हसनंबा नाम है। जिसका निर्माण 12वीं शताब्दी में किया गया था जो कि अब 823 साल पुराना हो चुका है। इस मंदिर को दीवाली के एक सप्ताह पहले खोल दिया जाता है। बता दें कि इस मंदिर में माँ योगेश्वरी देवी की पूजा की जाती है। यहां के स्थानीय लोगों का कहना है कि माता के कपाट खुलते ही चमत्कारी घटनाएं होने लगती है। इस टेम्पल में 3 द्वार है, जिसका मुख्य मीनार द्रविड़ शैली में बनाया गया है। ऐसा कहा जाता है कि इसे होयसल वंश के। राजाओं द्वारा बनवाया गया था।

चिट्ठी लिखकर मांगते हैं मन्नत

प्राचीन काल से यहां भक्त देवी माँ को चिट्ठी लिखकर अपनी मन्नत मांगते हैं। बता दें की दीवाली के समय यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं का तांता लगता है। वहीं, कपाट बंद करते समय मंदिर के गर्भगृह में देवी माता की मूर्ति के सामने ज्योत जलाया जाता है। साथ ही पके हुए चावल का भोग लगाया जाता है। जिसकी खास बात यह है कि मंदिर के द्वार जब अगले साल दीवाली के मौके पर वापस खोला जाता है तो वह ज्योत वैसे ही जलता हुआ पाया है। कहा जाता है देवी माँ अपने भक्तों की लिखी हुई चिट्ठी की मन्नतें अवश्य पूर्ण करती हैं। इसलिए हर साल भक्त यहां पहुँच कर माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

वहीं, अब हम मंदिर के इतिहास के बारे में बात करें तो पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राक्षस अंधकासुर भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त कर धरती पर अत्याचार फैला दिया था। दरअसल, अंधकासुर ने कड़ी तपस्या कर अदृश्य होने का वरदान पा लिया था, जिससे परेशान और चिंतित होकर सभी देवी-देवतागण भगवान शिव के पास पहुँचे। उनकी चिंता को सुनकर भगवान शिव ने राक्षस के वध करने का निर्णय लिया। अंधकासुर को जब भी भगवान मारते तब उसके शरीर से टपकते रक्त की बूंदों से वो वापस जिंदा हो जाता। तब जाकर आखिर में भगवान शिव ने देवी योगेश्वरी को बनाया, जिन्होंने अंधकासुर का विनाश किया। तब से ही इनकी पूजा-अर्चना की जाती है।

 

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