खुसुर-फुसुर….. आखिर कहां हो नेताजी

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राज्य विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। इस बीच दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों की तैयारियां जोर-शोर पर हैं। इनमें सत्तारूढ़ दल हर बार की तरह बाजी मारता हुआ दिख रहा है। चाहे चर्चा टिकिट वितरण की हो या फिर क्षेत्र में सक्रियता का मामला हो। वह सबसे आगे रहती है। परंतु इस बीच इन दिनों चुनावी समर का शंखनाद होने के बावजूद पार्टी के युवा पदाधिकारी प्रमुख अवसरों पर नदारद दिख रहे हैं या यूं कहें कि पूरी तरह निष्क्रिय दिख रहे हैं। इनमें से एक नाम की चर्चा खूब जोरों पर हैं और हो भी क्यों नही ? क्योंकि नेताजी जिला संगठन की प्रथम कतार में शुमार हैं। ऐसे में उनका नदारदमय रवैया स्वत: कई सवालों को जन्म दे रहा है। खासकर निष्ठावान पदाधिकारी व कार्यकर्ताओं के हाथों में किसी मुद्दे से कम नही है। खैर, ये सब संगठन का मामला है। ऐसा भी मुनासिब नही कि संगठन के लोग इससे अनभिज्ञ होंगे। ये तो चुनावी शंखनाद के बीच चल रहीं चर्चाओं का एक हिस्सा है। जिसे इन दिनों खुसूर-फुसूर का तमगा मिला है।

देर ना हो जाए कहीं देर ना हो जाए

विधानसभा चुनाव को लेकर जहां सत्तारूढ़ दल ने एक के बाद एक तीन सूची जारी कर करीब सवा सौ से ज्यादा प्रत्याशी घोषित कर चुके हैं। जिसका असर संबंधित विधानसभा क्षेत्रों में भी दिखाई देने लगा है। परंतु इन सबके बीच विपक्ष की तैयारियों पर सबकी नजर टिकी हुई हैं। ऐसे में हाल यह है कि टिकिट की राह ताक रहे उम्मीदवारों के लिये एक-एक पल खास है। जिसकी कीमत संबंधित ही समझ रहा है। वहीं दूसरी ओर शहर में चर्चाओं का बाजार गर्मा गया है। वह यह कि कहीं विपक्ष की लेटलतीफी उसके लिये नुकसानदायक साबित ना हो जाए ? ऐसा इसलिये क्योंकि चुनावी कार्यक्रम की घोषणा हो चुकी है। ऐसे में जिले की दोनों सीटों पर नामों का एलान अधर में होने से कई कयास लगाए जाने लगे हैं। इनमें शीर्ष पर रूठों का साथ, प्रमुख कार्यकर्ताओं से संयुक्त संवाद समेत जिम्मेदारियों के बंटवारे में आनन-फानन का मार्ग पकड़ना होगा, जो कि आम जनता के साथ साथ पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच मुख्य खुसूर-फुसूर है।

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