लेखक : अजातशत्रु
(यह लेख दैनिक अनोखा तीर में 25 मार्च 2012 को प्रकाशित हुआ है)

फिलहाल मेरी औकात इतनी नहीं है कि कोई संस्था नेता मंत्री को बुला रही हो, तो उसकी बराबरी पर मुझे मुख्य अतिथि बना दें। हाँ, कभी-कभी उस दर्जे का चीफ गेस्ट एन वक्त पर आना कैंसिल कर दे, तो ‘स्टेपनीÓ के रूप में मेरे से काम चला धका लिया जाता है। मैं बदली कामगार की तरह, स्टेपनी चीफ गेस्ट बनने को तैयार भी रहता है। बड़ी संस्थाओं के लिए मैं सूट बूट और टाई बंबई से धरकर चलता हूँ। उनके कार्यक्रमों की शोभा जमाने के लिए बीच-बीच में अंग्रेजी के कुछ जुमले बोल देता हूं। जिनका अर्थ मुझे भी नहीं मालूम।
सच यह है कि जैसा संस्था का स्टैंडर्ड, वैसा चीफ गेस्ट का स्टैंडर्ड। बड़ा मन होता है कि ‘भुआणा उत्सव का चीफ गेस्ट बन जाऊँ।Ó पर हिसाब लगाया तो पता चला कि इसके लिए पूरी जायदाद बेचकर चुनाव लडऩा पड़ेगा, लाखों रूपये खर्च करके मंत्री बनना पड़ेगा और चुनाव हार गये, तो फिर टक्की लगना नहीं है। सार यह है अपन बस छोटे और मकोले दर्जे की संस्थाओं के लायक है। उसी में माला पहनकर मन मार लें। ‘उतना पाँव पसारिये जितनी चादर होयÓ तो अजातशत्रु, तुम महँगी शाख वाले चीफ गेस्ट नहीं हो सकते। इस वक्त तुम सरस्वती शिशु मंदिर लायक ही हो।
हरदा में मैं चालू, बंद, छोटे ग्रांटवाली, कर्मचारियों की तन्खाह मारनेवाली या घाटे में चलने वाली, स्कूल संस्थाओं का सस्ता, सुंदर, टिकाऊ चीफ गेस्ट हूँ। एक फोन या एक निवेदन पर चीफ गेस्टई मंजूर कर लेता हूँ। कभी तो बस से खुद आ जाता है या कार्यक्रम के बाद मुझे वापस छोडऩे में पेट्रोल के खर्च के कारण संस्था में झगड़ा हो रहा है तो मैं खुद ही पैदल चलकर पलासनेर आ जाता हूं या रास्ते में किसी चालक को हाथ दिखाकर लिफ्ट ले लेता हूं। इस कारण मैं छोटी संस्थाओं का लाड़ला चीफ गेस्ट हूँ। मैं संस्कृति के आखर में वह भैंस हूं, जो ज्यादा खली नहीं माँगती। मगर दूध बाकायदा देती है। पर सच तो यह है कि चीफ गेस्ट बनने से मुझे भयकर नफरत है। इसके कई कारण है। एक तो संस्थाएँ रिवाजी तौर पर चीफ गेस्ट बनाती हैं। यानी चीफ गेस्ट बनाने का चलन न हो, तो वो तथाकथित वी.आई.पी. को फाटक से भगा दें। दूसरा यह कि खुद संस्था के कर्ताधर्ताओं को अखबारों में अपना नाम और तस्वीर छपाने की ललक होती है। इसलिए वे चीफ गेस्ट का उपयोग, बरात के नाई की तरह करते है। ऐसा सोचना भूल है कि मुख्य अतिथि के साथ गु्रप की फोटो होती है नहीं, गु्रप के साथ मुख्य अतिथि की फोटो होती है। यह ऐसा है, जैसे पटेल- परिवार के साथ कोटवार की फोटो खिंच गई। मुख्य अतिथि बनना इसलिए भी पसंद नहीं करता कि मुख्य अतिथि झूठ बोलता है। श्रोता झूठ ही ताली बजाते हैं। किसी को किसी से लेना देना नहीं है। सारा आयोजन झूठ होता है। बस रस्म निभाने के लिए वहाँ कोई आदमी सच्चा है तो दरी उठाने वाला। मगर इतना जानने-समझने के बाद भी मैं आयोजकों को टाल नहीं पाता। एक उदार बदचलन की तरह ‘हांÓ बोल ही देता हूँ ‘काई करती, दा, बहुत घेंघा रया था।Ó
एक बात मैं आज तक नहीं समझ सका। मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि का क्या चक्कर है। भाई मुख्य और विशिष्ट में क्या फर्क होता है? असल में यह शब्दों का खेल है। सच्चाई यह है कि विशिष्ट अतिथि वह होता है, जिसे हम मुख्य अतिथि नहीं बनाना चाहते, मगर टाल भी नहीं सकते। जैसे कमल पटेल को बुलाना है और गौरीशंकर मुकाती को टालना है और दोनों से मतलब निकालना है, तो कमल पटेल मुख्य अतिथि हो जायेंगे और मुकातीजी विशिष्ट अतिथि हो जायेंगे। इससे अलग विशिष्ट अतिथि का कोई मतलब नहीं है कि दो दूध देने वाली भैंसी को, एक ही घंटे से बाँध दिया। ‘बहनाÓ तू भी खुश वा रांड तू भी खुश। एक बार ऐसा हुआ कि एक आयोजन में मैं मुख्य अतिथि था। मगर तभी शहर में मंत्री आ गया। आयोजक परेशान कि अब क्या करें? लंगडी पोरी, दो बरात उन्होंने मुझे विशिष्ट अतिथि बना दिया और मंत्री को अतिथि बना दिया। गरज की मुख्य अतिथि कुर्सी है तो विशिष्ट अतिथि स्टूल है। पर दोनों स्टेज पर रखे हैं। दरअसल सरकारी ग्राटों के इस जमाने में शहर-शहर इतने वी.आई.पी. हो गये हैं कि स्टेज पर इन्हें मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि असिस्टेन्ट मुख्य अतिथि या उप-विशिष्ट अतिथि जैसे शाब्दिक चक्कर चलाकर एडजस्ट करना पड़ता है। संस्कृति की बस में बहुत भीड़ है। एक शीट पर दो निकाले बी.आई.पी. पु_ों को बिठालना पड़ता है। तिहाई पुट्टा चीफ गेस्ट, चौथाई पुठ्ठा विशिष्ट अतिथि।
आयोजनों में शाल उड़ाने का रिवाज है। यहाँ भी क्रम है। कोई विभूति माला के लायक, कोई विभूति माला प्लस नारियल के लायक है। शाल सिर्फ चीफ गेस्ट ओढ़ता है। आयोजन तय करते समय अचानक वी.आई.पी. बढ़ जाये तो एक महंगी शाल के चद्दल चार सस्ती शाल से देव- शांति: की जाती हैं। आम तौर पर ये रश्मि शाले ऐसी होती है कि पहली धुलाई में घर का पोछा लगाने के काम आयें। एक बार तो बड़ा मजा हुआ, यह कि एक फैसी स्टोर्स के पिछले कमरे में आदर की कट चाय पी रहा था। दुकान के मालिक मेरे भक्त है। नजर मिल जायें तो चाय पिलाने बुला लेते है मेरा ध्यान कहीं और है, तो सड़क से चले जाने देते है। तो, उस रोज उनको दुकान पर कुछ लोग आये। उनमें से एक बोला- भाई साहब जरा शाल बताइये। नौकर बोला- बढिय़ा बताऊं? जरा महंगी है। घबरा कर आदमी बोला नहीं सस्ती बताईए? नौकर धीरे से बोला- कोई गमी हो गयी है? शव पर डालना है। वह आदमी बोला- नहीं, अजातशत्रु को उड़ाना है। हमारे आज के मुख्य अतिथि है। मैं धन्य हो गया उनके जाने के बाद डटकर हंसा।
इस वक्त मेरी उम्र सत्तर साल है और सत्तर शाल है। अपनी संतानों से कह रखा कि जब रामजी से प्यार हो जाऊं इन शालों को थप्पी उड़ा दी जाये। मेरे लिए ये इसी काम की थी।
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