– डॉ. जगदीश सूचिक
साहित्यकार, भुसावल

अनेकों अनायोजित सहज संगोष्टियों का साक्षी पलासनेर वह आम का वृक्ष आज भी इस अनासक्त गृहस्थ साधु की ज्ञान व भक्ति निष्ठा का साक्षी है। कई रातें माणिक वर्मा, डॉ. श्रीराम परिहार, कैलाश मंडलेकर, महेश कौशिक, चतुर्भुज काब्जा, कंचन चौबे, शिवशंकर वशिष्ट, गोलापुरा के ऐसे कई लोगों के साथ रात-रात भर चर्चा करने की गवाही भर रहा है। मेरा इनसे जुडऩे का एकमात्र कारण तुलसी का रामचरित मानस ही रहा। जिस पर हजारों की संख्या में पत्र लिखकर मेरी जिज्ञासाओं का शमन इनकी लेखानी ने किया। प्रिय अनुज गोविंद सूचिक के पास खिरकिया में आज भी वे पत्र किसी पेटी में सुरक्षित होंगे। कहना यही है कि नित्य निरंतर अनवरत चिंतन मनन विश्लेषण करते हुए भारतवर्ष की महान वैदिक परंपरा का विस्तार इस साधु पुरुष ने अपने व्यंग्य लेखन के माध्यम से किया। कभी सम्मान पुरुस्कार पद प्रतिष्ठा कीर्ति फूलमाला मंच हार की याचना कामना किसी से कभी नहीं की। अपना सर्वस्व यादव परिवार के लिए समर्पित करते हुए हमारी आदरणीय भाभीजी के साथ सदा न्याय किया। हरदा विधानसभा के चुनावों में जब श्री विष्णु राजोरिया एवं सेठ एकनाथ अग्रवाल जी के बीच का राजनैतिक संघर्ष चरम पर था तब भी चुनाव रैलियों में हरदा के हित को सर्वोपरि प्रधानता दी। ‘ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैरÓ इसीलिए तो अपने अजातशत्रु उपनाम को सदा सार्थक कर दिया।
भारतीय फिल्मी गीतों के पिछले सौ वर्षों की गीत परंपरा पर अपने सूक्ष्म भाष्य व अपनी तीक्ष्ण मीमांसा का शब्द संसार पाठकों के लिए सुरक्षित कर दिया है। घंटाघर से बाबूलाल शीर्षक से व्हाइस आफ हरदा में निरंतर बिना पारिश्रमिक लिए स्थानीय समस्याओं व विविध विषयों पर चुभते व्यंग्य लिखे।
सबसे बड़ी बात जो मुझे नित्य निरंतर आज भी स्पर्श करती है वह यह है कि तुलसी के रामचरित मानस पर इस अविभाजित प्रतिभा के अदभुत धनी को मैंने निरंतर अश्रुपात करते देखा है। सृजन की पीठ पर सृष्टि सृजेता आशुतोष शिव के निराकार स्वरुप पर अश्रु अभिषेक करते अपने इस अभिन्न अग्रज को देखना मेरी अकूत संपदा है जिसे मैंने सांसों में संजोकर रखा है। बहुत कुछ लिखना बतलाना चाहता हूं लेकिन अब अश्रु रोक रहे हैं। भाई प्रणाम है तुम्हें। आदि शंकराचार्य के पुनर्जन्म पर मेरा अटूट विश्वास है हम फिर नया शरीर लेकर यहीं कहीं आसपास निश्चित ही मिलेंगे। याद रखना मेरे ये शब्द –
‘तात को सोच न मात को सोच
न सोच पिता सुरधाम गये को!
अवध अनाथ को सोच नहीं,
नहि सोच हमें वनवास गए को!
सीय हरण को सोच नहीं,
नहि सोच दसानन रार बढै़ को!
लक्ष्मण शक्ति को सोच नहीं,
एक सोच विभीषण बांह गहे को!
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