– डॉ. रमेश तिवारी
साहित्यकार, दिल्ली
व्यंग्यकार अजातशत्रु के जीवन के आज 81 वर्ष पूरे हो रहे हैं। मध्यप्रदेश के एक छोटे से कस्बे में जन्मे अजातशत्रु का मूल नाम आर.एस. यादव है। आपका जन्म 5 मई 1942 को हरसूद (पिपलानी), निमाड़, म.प्र. में हुआ। आपने अँग्रेजी साहित्य में एमए की उपाधि नीलकंठेश्ववर महाविद्यालय खंडवा से 1968 में प्राप्त की एवं अँग्रेजी के प्राध्यापक के रूप में सीएचम (1968-2002) महाविद्यालय, उल्हासनगर, कल्याण, महाराष्ट्र में कार्यरत रहे। यहीं से सेवानिवृत हुए। संख्या की दृष्टि से इनके दो व्यंग्य संग्रह आधी वैतरणी, शर्म कीजिए श्रीमान ही मेरी जानकारी में हैं किन्तु यह उल्लेखनीय है कि स्थानीय अखबारों मे इनके व्यंग्य निरंतर कई वर्षों तक प्रकाशित होते रहे हैं। इनमें नागपुर से प्रकाशित नवभारत मे साप्ताहिक स्तंभ व्यंग्यकार की डायरी, साप्ताहिक अखबार में वाइस ऑफ हरदा में एक नियमित हास्य-व्यंग्य स्तंभ ‘घंटाघर से बाबूलालÓ (25 वर्षों तक लेखन और प्रकाशन), नई दुनिया इंदौर में ‘हस्तक्षेपÓ कालम, ‘अधबीचÓ व्यंग्य स्तंभ लेखन प्रमुख हैं।
अजातशत्रु के लेखन को याद करते हुए मैं हमारे समय के व्यंग्यकार श्री सुभाष चंदर और अग्रज कैलाश मंडलेकर जी को याद करना चाहूँगा। सुभाष जी ने अजातशत्रु के लेखन से परिचित कराया शर्म कीजिए श्रीमान व्यंग्य संग्रह की रचनाओं के द्वारा। हालाँकि वह संग्रह उस समय व्यंग्यश्री सम्मान के लिए विचार किये जाने के संदर्भ हिंदी भवन की ओर गया और फिर वापस नहीं आया। इसके बाद कैलाश जी ने कुछ वर्षों पूर्व उनकी कुछ रचनाएँ मुझे फोटो स्टेट कराके भेजीं और मैं उनकी रचनाओं को पढ़कर उनके लेखन के मिजाज को समझने-बुझने की कोशिश करता रहा। उन्हीं दिनों यह भी सूचना मिली कि व्यंग्य जगत का नामचीन ‘व्यंग्य श्रीÓ सम्मान लेने से अजातशत्रु ने विनम्रतापूर्वक इनकार कर दिया है। यह वही समय है जब सम्मानों के लिए हमारे समय के नामचीन व्यंग्यकार किसी भी हद तक समझौते करने और जुगाड़ लगाने के लिए तत्पर रहते हैं। उसी दौर में छोटे शहर का एक बड़ा व्यंग्यकार इनसे अपनी असंलिप्त्तता और अनासक्ति जाहिर करते हुए अचानक सभी का ध्यान खींचता है। यह प्रसंग हम लोगों के लिए बेशक बहुत महत्वपूर्ण हो, पर मेरा अनुमान है कि अजातशत्रु के दैनिक जीवन का हिस्सा है। उनका व्यक्तित्व ऐसी ही अनासक्तियों से निर्मित हुआ लगता है। जीवन की सच्चाई की खोज और उसमें आकंठ डूबने की स्वाभाविक वृत्ति ने उन्हें प्रदर्शन से असम्पृक्ति प्रदान की है।
यह लिखना जरुरी है कि अब तक मुझे व्यंग्य जगत के अपने इस पुरखे से आमने-सामने मुलाकात करने का सौभाग्य नहीं मिल सका है। लेकिन मेरी तरह सैकड़ो हैं जो अजातशत्रु से मिलने की इच्छा रखते हैं। उन्हें सुनने-पढने की इच्छा रखते हैं। आखिर ऐसा क्या है इस शख्स में जो नई पीढ़ी ही नहीं उनकी समकालीन पीढ़ी को भी आकर्षित करता है। यह वही दौर है जब हम अपने स्वजनों से भी निरंतर सूचना प्रौद्योगिकी की इस अंधी दौड़ में विमुख होते जा रहे हैं। एक घर में यदि चार सदस्य हैं तो चारों को एक-दूसरे को कुछ कहने-सुनने की फुर्सत नहीं है। सभी के हाथ में मोबाइल है और वे अपने मोबाइल की आभासी दुनिया की कीमत पर अपनी वास्तविक दुनिया से बेखबर होने के अभ्यस्त हो चुके हैं। इसी दौर में अजातशत्रु से आप एक बार बात करें तो पाएंगे कि यह शख्स दुनिया की इस भेड़चाल से अलग अपनी एक समानांतर दुनिया रचता और जीता है। मैंने उनसे परिचयात्मक तौर पर मोबाइल से बातचीत शुरू की और पहली ही बातचीत में लगा जैसे काफी पुरानी मुलाकात है अपनी। पहली ही बातचीत में घंटाघर से बाबूलाल की जो पृष्ठभूमि उन्होंने मुझे बताई, वह निश्चित रूप से मेरे लिए अपने समय के पुरखे व्यंग्यकार को जानने का एक नया कोण प्रदान कर रहा था। बातचीत के उस दौर को स्मरण करते हुए मैं अभी भी रोमांचित हूँ। मैं याद कर रहा हूँ कि भाषा की भूमिका को लेकर मैं उनसे विनम्रता के साथ तर्क कर रहा हूँ। वे भाषा को शौचपात्र कह रहे हैं और मैं पूजा के फूल। काफी देर संवाद के बाद यह समझ आया कि यह शख्स जीवन के सुदीर्घ अनुभवों की वैतरणी पार कर कहीं बहुत आगे निकल चुका है। इतना आगे कि उन्हें औपचारिकताओं, आदर्शों और प्रदर्शन की परिधि में घेर पाना मुश्किल है। ये सारे आकर्षण उन्हें प्रभावित करने की क्षमता खो चुके हैं। ऐसे पुरखे व्यंग्यकार का लेखन हिंदी व्यंग्य को न सिर्फ समृद्ध करता है बल्कि उसे गौरव भी प्रदान करता है। मेरी शुभकामना है कि अजातशत्रु जी अपनी रचनाधर्मिता के इस बहुआयामी व्यक्तित्व से हिंदी जगत को भविष्य में भी बहुत कुछ प्रदान करें जिससे परवर्ती पीढ़ी को जीवन के कठिन क्षणों का सामना करने एवं निर्णय लेने का संबल प्राप्त हो सके। अपने इस आदरणीय एवं प्रिय व्यंग्यकार के जन्मदिवस पर उनके स्वस्थ, सुखद, सुदीर्घ एवं यशस्वी जीवन हेतु अशेष शुभकामनाएं और शत-शत प्रणाम!
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