अजातशत्रु अब दूसरा नहीं होगा

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– प्रो. धर्मेेेंद्र पारे
निदेशक, जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी
जनजातीय संग्रहालय श्यामला हिल्स, भोपाल।

आने वाली नस्लें तुम पर फख्र करेंगी हम-असरो
जब भी उन को ध्यान आएगा तुम ने ‘फिराकÓ को देखा है।
अजातशत्रु उर्फ हरदा के हम सब पढऩे लिखने सोचने विचारने वालों के ‘भैयाÓ। जब भी उनके बारे में सोचता हूँ हमेशा मन में रघुपति सहाय उर्फ शायर फिराक गोरखपुरी का यह शेर मन में कौंध जाता है। सचमुच आने वाले वक्त की क्या कहें। अपने वर्तमान में ही जब हम उनके विषय में दूर अनजान शहरों के लोगों से बात करते हैं लोग सहसा भरोसा नहीं कर पाते हैं कि कोई लेखकीय शख्सियत ऐसी भी है। जिसने राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार सम्मानों को सहज ही ठुकरा दिये। जिन्हें यही पता नहीं कि उनका कोई लेख वर्षों से महाराष्ट्र के स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ाया जा रहा है। जिन्होंने कितना लिखा कहॉं लिखा कभी अबेर समेट कर नहीं रखा। चार छह नहीं फिल्मों के सैकड़ों गीत, कथाएं, दार्शनिकों के उद्धरण लगभग कंठस्थ हैं। बिना किसी मोबाईल या कम्प्यूटर के सहारे के। वे निरन्तर पढ़ते रहते हैं। निरन्तर बात करते हैं। उनकी स्मृति का कोई सानी नहीं। निरन्तर विचार करते हैं। वे निरन्तरता के द्रष्टा हैं। उनको बड़ी सभाओं और सभागारों की दरकार नहीं। वे अपने खले की खाट पर जो खबते हैं वैसा तो कोई बड़ी बड़ी आसंदी पर प्रतीत नहीं होता। वे निरन्तर चिंतन की एक नदी हैं। जिसमें कहीं भी ठहराव नहीं है। आधी रात को भी नींद में उठाकर उनसे संवाद किया जा सकता है।
ऐसा दार्शनिक लेखक, ऐसा चिंतक और ऐसा फक्कड़ व्यक्तित्व। इस तोड़ का कोई आदमी खोजना थोड़ा कठिन है। एक ऐसा शख्स जो मुम्बई जैसी महानगरी में अंग्रेजी का प्रोफेसर रहा हो। ऐसा लेखक जो देश की श्रेष्ठ पत्र-पत्रिकाओं में छपता लिखता रहा हो। यदि वे चाहते तो देश विदेश के संस्थानों में बड़े पदों पर प्रतिष्ठित हो सकते थे। जुगाड़ से नहीं अपनी सामथ्र्य से। किन्तु उन्होंने यह नहीं किया। सवाल यह है कि यह क्यों नहीं किया। उसका एकमात्र उत्तर है उनका तत्व ज्ञानी होना। उनका तपस्वी होना और उनका गहरा आध्यात्मिक होना। अजातशत्रु को जो लोग लेखक भर मानते हैं वह आधी अधूरी समझ है। वस्तुत: वे साधु सन्याासियों, संतो दार्शनिकों की तोड़ के विरले मनुष्य हैं। लेखन भर उनकी चाह नहीं है। छपना उनका मकसद नहीं है। लेखन के माध्यम से वे कोई संगठन की बात नहीं करते। वे बांधने या जुटाने की बात नहीं करते कभी। उनका लिखा हम सबने खूब पढ़ा है। मुझे लगता है कि उनका मूल लेखन उनके हजारों हजार पत्रों और नेति नेति कॉलम में है। अभी समय है कि उनके सब आत्मीय जन मिलकर उनके लिखे को अबेर सकें तो बड़ा पुण्य का काम होगा। हरदा के साहित्य और पत्रकारिता का इतिहास बहुत समृद्ध और पुरातन है। अजातशत्रु इस इतिहास के सबसे उज्ज्वल पृष्ठ हैं। वे हमेशा मुक्त होने की बात करते हैं। सबकी मुक्ति की बात। सबसे मुक्ति की बात। यह संयोग ही है कि आज बुद्ध पूर्णिमा है और भैया का जन्मदिन भी। बुद्ध को भी सांसारिक माया और उसकी छाया बांध नहीं सकी। भैया अजातशत्रु ऐसे ही वीतरागी मनुष्य हैं। उन्हें बहुत शुभकामनाएं।

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