पलासनेर की पगडंडियों पर, शब्दों का सन्यासी

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– ज्ञानेश चौबे
साहित्यकार, हरदा

‘रहता हूं वीराने में तन्हाई के सहारे,
जैसे हो कोई मंदिर किसी गांव के किनारे।Ó
प्रोफेसर अजातशत्रु पर लिखना आसान हो सकता है पर पलासनेर के श्री राधेश्याम यादव यादों पर लिखना उतना ही कठिन है। विविधताओं और नवाचारों से भरा लेखन करने वाले प्रोफेसर आर.एस. यादव उर्फ अजातशत्रु जितने अच्छे लेखक हैं उससे कहीं अधिक सक्रिय पाठक भी। लेकिन जैसा कि आम लेखकों कवियों और समीक्षकों के जीवन में होता है, वैसे किसी संकलित लेखन करने का प्रयास उन्होंने कभी नहीं किया। प्रकाशन की चाह ने उन्हें कभी नहीं छुआ। वे निरंतर पढ़ते रहे और लिखते भी रहे लेकिन उनको निकट से जानने वाले लोग जानते हैं कि उन्होंने पढ़ा ज्यादा लिखा कम।
अगर मैं उनके 80 वर्षों के जीवन पर कुछ लिखने का प्रयास कर रहा हूं तो कारण यह है कि विगत 25-30 वर्षों में जितना और जैसा मैंने उन्हें देखा है वे मुझे बड़े पाठक लगे। लगभग एक पुस्तक उनके 24 घंटे के लिए पर्याप्त होती है। हर नए मिलने वाले से उनको प्रसन्नता होती है, जब वह कोई पुस्तक लेकर उनसे मिलता है। लेखक बड़ा हो या छोटा वह उनके लिए जब पुस्तक लेकर पहुंचता है मैं समझता हूं, उस लेखक से कहीं ज्यादा आनंदित भैया अजातशत्रु हुआ करते हैं। जी हां अजातशत्रु यही लोक संबोधन अब अंचल में उनके लिए आम हो गया है। महाविद्यालयीन शिक्षा के बाद उन्होंने कुछ दिनों तक सिवनी मालवा में अध्यापन किया लेकिन मुश्किल से एक-दो वर्षों के बाद ही, उनका चयन अंग्रेजी के प्रोफेसर के रूप में उल्हासनगर हो गया।
हमने अजातशत्रुजी को हमारे बचपन से देखा है, उनके मामा का घर हमारे मोहल्ले में था। हम जब प्राइमरी स्कूल के विद्यार्थी थे तब लगभग हर गर्मी की छुट्टियों में उनका आगमन हरदा होता था और 1970- 71 का यह दौर, वह समय था जब हमारे मोहल्ले में रहने वाले शिक्षक श्री कृष्ण टमने जी ने कविता लेखन की शुरुआत की थी। नई कविता और गीतों तक लेखन को अपना विषय बनाया। वे हमारे मोहल्ले के लोकप्रिय शिक्षक और पारिवारिक शुभचिंतक रहे हैं। उनके घर नियमित रूप से तत्कालीन लेखकों और कवियों की गोष्ठियां होती थी। विभिन्न विषयों पर विमर्श होता था, बहस होती थी और टेमने सर का कबीट वाला मकान हरदा नगर के रचनाकारों के विमर्श का केंद्र हुआ करता था। तब टाई लगाकर साइकिल पर आते जाते अजातशत्रु जी को देखना स्मृति में है, यही वह समय था जब हमने पहली बार उन्हें देखा। जब कुछ बड़े हुए तो नईदुनिया में उनके स्थाई कॉलम पढऩा हमारी जिज्ञासा और कौतूहल का विषय था। हरदा के घंटाघर पर श्री रमेश सुगंधी की दुकान उनकी स्थाई बैठक हुआ करती थी। बाद में हमारे अग्रज श्री कंचन चौबे जी की उनसे बहुत निकटता बढ़ी और अजातशत्रुजी उन्हें अपना गुरु मानने लगे। वे जब स्मृतियों में डूबे होते हैं तब वे कहते हैं कंचन चौबे, राजेंद्र माथुर से बड़े पत्रकार होते यदि पत्रकारिता को अपना क्षेत्र बनाते। उनकी यह निकटता शायद अंग्रेजी में उन दोनों की अध्ययन और अनुभवों के कारण रही ।
मुझे याद आता है घंटाघर का वह कवि सम्मेलन जो शायद हरदा के इतिहास का पहला वह कवि सम्मेलन था जो घंटाघर पर हुआ, घंटाघर चौक को सामान्यत: राजनीतिक सभाओं के लिए ही याद किया जाता है। लेकिन मुझे याद है कि उस कवि सम्मेलन में शायद मुंबई के प्रोफेसर रमेश सेजपाल आए थे और उन्होंने वर्षा के मुहाने पर खड़े हुए उस मौसम में जो गीत पड़ा था उसकी कुछ पंक्तियां मुझे स्मरण हो आती है,
‘नील गगन के वर्षा वाले बादल,
बरस बरस कर कर दे इस धरती का गीला आंचल।Ó
तब रमेश सुगंधी सहित कई कवियों ने उस कवि सम्मेलन में कविता पाठ किया था। इसके बाद एक स्थापित व्यंग्यकार के रूप में उनके व्यंग्य पढऩे का अवसर बचपन से, नईदुनिया के पाठक रूप में मिलता रहा। उनके नियमित स्तंभ हस्तक्षेप और ‘अधबीचÓ के माध्यम से उन्हें पढऩे का अवसर लगातार मिलता रहा। बाद में उन्होंने फिल्मी गीतों की समीक्षा को अपना लेखन का क्षेत्र बनाया। वे निरंतर ‘गीत-गंगाÓ के माध्यम से नईदुनिया में अपना स्तंभ लिखते रहे। उन्हें पढऩा एक सधे हुए अनुशासित लेखन को पढऩा है। उन्होंने खूब लिखा, लेकिन प्रकाशन के मोह से वे सदैव बचे रहे। जब उनसे बात होती है वे आज भी खुले मन से इस बात को स्वीकार करते हैं कि उनका श्रेष्ठतम लेखन, भैया महेश कौशिक के ‘वॉइस ऑफ हरदाÓ में प्रकाशित लेखों में देखा जा सकता है। बाद में प्रहलाद जी शर्मा ने उनसे ‘अनोखा तीरÓ में भी बहुत कुछ लिखवा लिया। यहां यह लिखते हुए की लिखवा लिया या बुलवा लिया दोनों बहुत चुनौती के काम हैं। भैया के मूड को पकड़ कर उनसे लिखवा लेना या बुलवा लेना दोनों बहुत कठिन काम है। पाठक के तौर पर उनकी सक्रियता आज भी बनी हुई है वे निरंतर पुस्तकों को पढऩे में अपना समय व्यतीत करते हैं। पलासनेर का उनका खला आज भी हरदा से जाने वाले उनके शुभचिंतकों, परिचितों और आत्म आत्मीयजनों के लिए विमर्श का केंद्र बना हुआ है। आज जब भैया 80 वर्ष पूरे कर रहे हैं तब शायद एक बात स्थापित तौर पर कही जा सकती है कि लेखन से उनका मोहभंग हुआ है, लेकिन अच्छी पुस्तकें आज भी उनका सहारा बनी हुई है। उनके जीवन व्रत में अगर उनसे स्पष्ट तौर पर पूछी जाए कि आप ‘अच्छे लेखक है या पाठकÓ? तब शायद उनका मत एक अच्छा पाठक होने में सहमति भरा होगा। लेखन से अचानक विरक्ति का कारण हैं कि वे जीवन को बुद्ध की तरह पहचानने की कोशिश कर रहे हैं ।
प्रकृति के साथ उनका तादात्म्य सन्यासी की तरह हो रहा है, जो पलासनेर की पगडंडियों पर न केवल लेखन के सत्य को बल्कि जीवन के सत्य को खोजने की कोशिश कर रहे हैं। वे अंदर से साफ हो गए से लगते हैं। अजातशत्रुजी लगातार मिलने वालों से यही कहते हैं कि मुझसे बात की जाए, बहस की जाए ,’आई एम नॉट ए गुड राइटर बट ए गुड टेबल टाकरÓ। उनकी स्वीकारोक्ति सत्य भी है। वे सन्यासी की तरह साधना में सत्य की खोज में लीन लगते है। मुझे लगता है कि सन्यास का यह बीज तत्व प्रारंभ से ही उनके भीतर ही रहा और यही कारण है के प्रकाशन और पुरस्कारों के मोह से निरंतर बचते रहे। उनके लेखन का प्रकाशन हो यह अपेक्षा उनकी कभी नहीं रही। कई बड़े सम्मान और पुरस्कारों की स्वीकृति तक उन्होंने देना उचित नहीं समझा। आज वे पलासनेर में अपने खले और वैसे के वैसे ही बने हुए अपने उस घर के दालान में नीम के झाड़ के नीचे खटिया बिछाए गांव के लोगों से बतियाते हुए मिल जाते हैं।
अजातशत्रु जी से लगातार मिलने का उपक्रम और अवसर उपलब्ध कराने का श्रेय, अनन्य मित्र डॉक्टर डॉ. धर्मेंद्र पारे के साथ रहा। पहले मोटरसाइकिल और बाद में जब 12-15 साल पहले उन्होंने जब हरदा छोड़ दिया और भोपाल में बसे तो सुविधाजनक वाहनों से उनके हरदा आने पर भैया से पलासनेर जाकर मिलने का कार्यक्रम लगभग तय होता है। इन यात्राओं में श्री हरी मोहन शर्मा, भाई देवेंद्र शुक्ला धर्मेंद्र हरण, राजेंद्र मालवीय नियमित साथी हुआ करते हैं। एक फक्कड़ और मस्त व्यक्ति से यदि किसी को मिलना है तो आप आज भी पलासनेर की यात्रा कर सकते हैं। मुझे लगता है कि उल्हासनगर के मुंबई महानगरी से लगे हुए उस महाविद्यालय में अंग्रेजी जैसे विषय का अध्यापन करते हुए, प्रोफेसर अजातशत्रु की तुलना में, उन्हें अपने गांव पलासनेर की पगडंडियों पर घूमते हुए ,उन प्रश्नों के उत्तर ज्यादा मिल रहे थे जो उनकी जिज्ञासा में न जाने कब से आंदोलित हो रहे थे।
अजातशत्रु जी ने जब व्यंग लिखे तो खूब लिखे। खूब पढ़े गए, उन पर खूब बातचीत हुई, मेरे जैसे पाठक के लिए उनके लेखों में वह शब्द जो हमारे अंचल की ग्रामीण बोली की धरोहर है, अक्सर ही मिल जाया करते हैं। उनकी साफगोई बहुत विख्यात हुई जब उन्होंने लेखन प्रकाशन और पुरस्कारों से तटस्था बनाई। उन्होंने ऐसा किया भी और साथ में यह तर्क भी कि ‘अभी तक जो मैंने कहा वह बकवास है पूरी दुनिया में जो कुछ लिखा गया या पढ़ा गया सबसे अच्छा लेखन लिखा जाना बाकी हैÓ वह लिखा ही नहीं गया। रमण महर्षि, गौतम बुद्ध उनसे बातचीत के विषय होते है, आज भी वे प्रश्नों के घेरे में रहकर उत्तरों की तलाश निरंतर कर रहे हैं। उनके घर आम, बेर, चीकू से घिरी हुई खटिया पर बैठकर बतियाना बात करना, सवाल पूछना, बहस करना, उन्हें सुकून देता है। बार-बार ऐसा लगता है कि यही बैठकर पूरी रात गुजार दी जाए।
मुझे याद आता है 1977-78 में बाबूलाल जी सिलारपुरया विधायक हुआ करते थे, किसी मुद्दे पर युवा नेता प्रखर वक्ता जमना जैसानी आमरण अनशन पर बैठे थे और नाजर जी उस सभा में उपस्थित हो गए थे। किसी कारण से 1 दिन पहले वह नहीं आ पाए थे तब उस सभा को संबोधित करते हुए हमने अजातशत्रु जी का वह रूप देखा, उन्होंने कहा था-आपको कल आना था, अगर आप अपनी जनता के बीच में रहोंगे तो आपको यह कई बार विधायक बना देगी।
अपने लेखन में उन्होंने स्थानीय समस्याओं पर खूब लिखा, जी भर कर लिखा वह प्रकाशित भी हुआ। विविधता भरा यह लेखन हरदा पलासनेर और आसपास के अंचल की आंचलिकता पर ऐसा दस्तावेज है जिसका संग्रह और प्रकाशन समय की मांग है। एक प्रयास उनके संकलन का भैया श्याम साकल्ले, डॉ. धर्मेंद्र पारे ने किया था और तत्कालीन पुलिस अधिकारी श्री अरुण खमरिया ने उसके प्रकाशन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस कृति के लोकार्पण में शैल चतुर्वेदी मुख्य अतिथि थे। वह कार्यक्रम कच्छकड़वा धर्मशाला में संपन्न हुआ था और किसी साहित्य कृति के विमोचन में इतनी भीड़ पहली बार देखी गई थी। शर्म कीजिए श्रीमान इस कृति का लोकार्पण निश्चित तौर पर पहला प्रयास था जिसे अब और निरंतर करने की आवश्यकता महसूस होती है।
उड़ा से उल्लासनगर, पलासनेर से परेल, पगडंडियों से महानगरों और राजपथ तक की अजातशत्रु जी की यात्रा स्थापित लेखक समीक्षक व्यंग्यकार की वह यात्रा है जिसमें मोह नहीं है। जिस पर कबीर की सादगी है, फक्कड़पन है, जिसमें द आंचलिकता के शब्दों को सहज ही सम्मान दिलाने की चाह है। अपने अंचल के लोग कितने प्रिय होते हैं उनसे बात करना बतियाना प्रश्न करना, गांव के होनहार युवाओं की चिंता करना, उन्हें अंग्रेजी पढ़ाना, सिखाना, यह सब उस व्यक्ति की दिनचर्या में अब शामिल है जिसे प्रोफेसर आर.एस. यादव या अजातशत्रु कहा जाता है।
अनोखा तीर का यह प्रयास निश्चित ही अनोखा है। हरदा जिस नाम को बड़ी सदाशयता जीता है हरदा मूल रूप से व्यंग की भूमि है। देश के स्थापित व्यंगकार हरदा ने देश प्रदेश को दिए डॉ हरी जोशी, डॉ मूलाराम जोशी, डॉ. कृष्ण चराठे, कैलाश मंडलेकर के क्रम में अजातशत्रु स्थापित नाम है। जिन्होंने अपने लेखन में यहां के आंचलिक शब्दों को स्थापित किया। लेकिन वे निरंतर पढ़ते अधिक रहे। नई पुस्तकों से उनका रिश्ता बहुत जल्द ही स्थापित होता है। लेखन ऐसा जिसमें वे आज भी आमजनों की भावनाओं का अधिक ध्यान रखते हैं।
मुझे याद आ रहा है 2007-०8 में ‘हरदा के गांधीÓ प्रोफेसर महेशदत्त मिश्र पर एक ग्रंथ प्रकाशित होना था। डॉ धर्मेंद्र पारे और मैं रात के लगभग 8:30-9 बजे पलासनेर पहुंचे। सुबह भैया को इंदौर निकलना था। हमने जब आने का कारण बताया उन्होंने कहा कि सुबह मुझे इंदौर निकलना है। लेकिन तुम लोग आए हो मैंने महेश बाबू को देखा है जब मैं खंडवा एस.एन. कॉलेज में विद्यार्थी था तब मैंने उनको सुना था यह शायद 1966 की बात है। 40 वर्षों के बाद यह संयोग ही था कि हम उनसे महेश बाबू पर कुछ लिखने का आग्रह लेकर गए थे। लगभग 10 बजे हम लौट आए थे। भैया के पलंग के पास रखे हुए टेबल पर घासलेट का लैंप जल रहा था। बिजली का बल्ब लगभग टिमटिमा रहा था। उन्होंने कहा कि कल सुबह 6 बजे मैं निकल जाऊंगा। तुम लेख का लिफाफा उमेश नायक के घर से ले लेना। सुबह 9-10 बजे हम जब उमेश नायक के घर गए तो महेश बाबू पर एक संस्मरण आत्मक लेख लिखकर भैया इंदौर रवाना हो गए थे। लेख का शीर्षक था ‘जस की तस धर दीनी चदरियाÓ यह लेख महेश बाबू के व्यक्तित्व पर एक प्रमाणित आलेख था। 1966 और 2007 के बीच में लगभग 42 वर्षों का अन्तराल था। किसी युवा छात्र के सामने वह दृश्य भी, जिसके बारे में तय नहीं था 40-45 साल के बाद इस कार्यक्रम पर कुछ लिखना पड़ेगा। हम असमंजस में थे। 10 और 6के बीच में कुल 8 घंटे का समय, भैया ने लेख घासलेट लैंप के उजाले में कैसे पूरा किया होगा? वे कब सोये होंगे? कब उठे होंगे? कब हरदा से बस पकड़ी होगी? और इंदौर रवाना हुए होंगे। यह उनके व्यक्तित्व को बताता हुआ वह संस्मरण है जो सिद्ध करता है कि वे अंदर से कितने गहराई से प्रतिबद्धताओं को जीने वाले व्यक्ति हैं। जब उनसे पूछा जाता है तो एक बैरागी बोलता है ….मैंने जो कुछ लिखा वह लिख दिया मुझे नहीं मालूम कैसे लिखा गया…। यह कुछ वैसी ही विनम्रता है जो बाबा तुलसी में सहज दिखाई देती है। ऐसी विनम्रता है जो शायद हर लेखक को अपने लेखन के प्रति तटस्थ भाव से सीख लेनी चाहिए। तुलसीदास जी ने कहा है- ‘कवित विवेक एक नहीं मोरे। सत्य कहहू लिखी कागज कोरे।Ó कागजों पर कलम चलाकर जब व्यक्ति अपने आपको महान कवि लेखकों में शुमार कर रहा है, मुझे लगता है ऐसे लोगों को अजातशत्रु जी के पास जाकर सीखना, उनसे विमर्श करना चाहिए। उस व्यक्तित्व को देखना चाहिए जो उनके अंदर एक लेखक के रूप में जिंदा है, लेकिन सिर पर चढ़कर नहीं बोलता है। उस पर उनका, उनके स्वभाव का, उनके व्यक्तित्व का नियंत्रण है और आप उस लेखक का साक्षात्कार बड़े आराम से उनसे बात करते हुए कर सकते हैं।
लता मंगेशकरजी, सुमन चौरसिया मुझे लगता है कि बाद में उनके व्यवस्थित लेखन की प्रेरणा बने और माध्यम भी। सुमन चौरसिया से उनकी मित्रता और निकटता उनको कैसे अलग क्षेत्र के लेखन की तरफ ले गई व्यंग्य चिंतन से अलग फिल्मी गीतों की समीक्षा का था। गीत गंगा के माध्यम से यह एक लंबे समय तक हिंदी पाठकों को पढऩे को मिलता रहा। पुराने गीतों पर उन्होंने खूब लिखा, जमकर लिखा। समीक्षा संस्करणात्मक गीत समीक्षा ने उन्हें एक समीक्षा की नई धारा की तरफ मोड़ दिया। वे हिंदी फिल्मी गीतों के ‘इनसाइक्लोपीडियाÓ हैं, उनसे जब किसी गीत का मुखड़ा बोलकर पूछा जाता है कि भैया यह गीत किस पिक्चर का है, संगीतकार, फिल्म का नाम किस सन् में वह बनी, किन पर फिल्माया गया। यह ढेरों जानकारी मौखिक तौर पर बता देते हैं और निश्चित रूप से यह सब शायद उनकी विलक्षण याददाश्त का परिणाम है। जो खंडवा महाविद्यालय में अध्ययन करते हुए एक युवा विद्यार्थी को सिनेमा चौक की टॉकीज में ब्लैक एंड वाइट से लेकर रंगीन फिल्मों के दौर तक देखते हुए हुई होगी। हरदा और पलासनेर की पगडंडिया, उनसे कभी विस्मृत नहीं हुई। गर्मी की छुट्टियां, दिवाली का त्यौहार उन्हें ही हरदा खींच लाया करता था। ग्लैमर यह शब्द शायद उनकी दिनचर्या में कभी शामिल नहीं हुआ। सरलता, मिलनसारिता उन्हें एक बड़ा व्यक्ति बनाते हैं। संभावना विचार मंच हरदा जब अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता के सम्मान के कार्यक्रम को आकार दे रहा था। डॉ धर्मेंद्र पारे के संयोजन में 25 से अधिक जिले के शिक्षकों का सम्मान उसमें दर्ज भी है। अजातशत्रु जी उसके नियमित श्रोता हुआ करते थे। मुझे याद है कि अनेक उस छोटे से सम्मान समारोह में नियमित रूप से उपस्थित होकर श्रोता वर्ग में जमीन पर बैठकर आयोजन को ऊंचाई प्रदान की। विभिन्न आयोजनों में सितंबर के पहले सप्ताह में उल्हासनगर नगर से हरदा आते रहे और आयोजन में शामिल उपस्थित होते रहे। आज हरदा और हिंदी का पाठक वर्ग उनके प्रति उनकी सादगी के प्रति उनकी सरलता और आत्मीयता के प्रति गहरे कृतज्ञता बोध से उनके सुदीर्घ जीवन की कामना करता है और ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उनका जीवन शतायु हो वे स्वस्थ रहें।

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