जिसका कोई शत्रु न हो वो होता है अजात शत्रु

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– महेश कौशिक,
वरिष्ठ संपादक

अजात शत्रु उसे कहते है जिसका कोई शत्रु न हो। इसी उपनाम से लेखन करने वाले प्रोफेसर आरएस यादव उर्फ अजात शत्रु के बारे में लिखना याने सूरज को दीपक दिखाने जैसा है। हरदा के पास ग्राम पलासनेर के मूल निवासी प्रोफेसर आरएस यादव मुम्बई के उपनगर उल्लासनगर के सीएचएम कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे है। हिन्दी के साहित्यकार के रुप में पूरे देश में अजात शत्रु के नाम से राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में लेखन करने वाले अजात शत्रु को हरदा के गिने चुने साहित्य प्रेमी ही जानते थे। आम पाठक नहीं जानता था कि जिस अजात शत्रु को वे बड़े चाव और लगन से पढ़ते है वह हरदा के रहने वाले है। वह मुम्बई से जब भी हरदा आते थे तो गांव में पूरे समय उनका डेरा एक आम के नीचे रहता था। जहां उनके साहित्यिक मित्र स्वर्गीय कंचन चौबे, स्वर्गीय शिवशंकर वशिष्ट (गुरु), टेमले गुरुजी तथा प्रदेश और देश के अन्य क्षेत्रों से आने वाले उनके प्रशंसक वहां जाकर घंटों साहित्यिक चर्चा करते थे। हरदा में उनकी बैठक घंटाघर चौक स्थित रमेश सुगंधी की दुकान थी। उस समय मेरा अखबार साप्ताहिक वाईस ऑफ हरदा निकलता था। जिसमें स्वर्गीय श्याम साकल्ले का एक कॉलम छपता था-हरदा और आसपास। जिसमें व्यंग्य के माध्यम से श्याम साकल्ले समस्याओं को लेकर तीखी कटाक्ष करते थे। उस समय मैं अपना अखबार स्वयं वितरित करता था। इसी दौरान रमेश सुगंधी के यहां मेरी मुलाकात यादव जी से हुई। तब मुझे पता चला कि अजात शत्रु के नाम से लेखन करने वाले यादवजी यही के रहने वाले है। रमेश सुगंधी मेरे बचपन के मित्र है। उन्हें भी साहित्य से लगाव रहा है। जिसके चलते वह कभी कभी अजात मित्र के नाम से लिखते थे। अजात शत्रु को अखबार अच्छा लगा और उन्होंने कहा कि वे बड़े-बड़े पत्र-पत्रिकाओं में काफी लिख चुके है, अब वे स्थानीय अखबार में लिखना चाहते है। जिसके माध्यम से स्थानीय समस्याओं को लेकर जिम्मेदारों को लताड़ा जाए। काफी विचार विमर्श के बाद तय हुआ कि उनका कॉलम घंटाघर से बाबूलाल के नाम से चलाया जाए। उस समय बाबूलाल नाम का व्यक्ति हरदा घंटाघर के पास खड़े होकर अंग्रेज हुकूमत को गरियाता था। बताया जाता है कि उनको फौज से निकाल दिया गया था, जिसके कारण उनको दौरे पडऩे लगे थे। जब भी दौरा पड़ता था वह नॉनस्टॉप एक घंटा बड़बड़ाता था और बाद में नार्मल हो जाता था। अजात शत्रु बोले लिखूंगा मैं बोलेगा बाबूलाल, उसके पागलपन में अपन बच भी जाएंगे और अपनी बात भी कह देंगे। उस समय हरदा क्षेत्र से विधायक विष्णु राजौरिया थे। तब पहला लेख अजात शत्रु ने लिखा था जिसका शीर्षक था- हे विष्णु भगवान तुम कहां हो? इस लेख में शहर की कई समस्याओं का उल्लेख व्यंग्य के माध्यम से किया गया था। इसके बाद हर सप्ताह उनका लेख घंटाघर से बाबूलाल कॉलम में छपने लगा। लोग इस कॉलम के दिवाने हो गए। हर हफ्ते अखबार का इंतजार करने लगे। चूंकि उनका लेख पिछले पन्ने पर छपता था इस कारण यह पहला अखबार था जो पीछे से पढ़ा जाने लगा। जबकि अखबार पहले पन्ने से पाठक पढ़ता है। इस कॉलम में कई बार इस अखबार को भी उन्होंने अपने लेखन में गरियाया है। इस अखबार ने वह भी छापा है। हरदा में उनके विशेष पात्र जो लेखन में रहते थे वे रहे विष्णु राजौरिया, एकनाथ अग्रवाल, वीरेन्द्र आनंद, रामदीन पटेल इत्यादि। ये शहर की उस समय महत्वपूर्ण हस्ती थे। लेकिन यादवजी के मुरीद थे। उनके लेखन का कभी बुरा नहीं मानते बल्कि आलोचना को सकारात्मकता के साथ सराहा। जब आम पाठकों को अजात शत्रु के लेख पढऩे को मिले तो आश्चर्य हुआ कि देश का इतना विख्यात लेखक एक छोटे से अखबार में स्थानीय समस्याओं को लेकर इतना तीखा व्यंग्य कैसे कर रहा है? जब लोगों को पता चला कि प्रख्यात व्यंग्यकार अजात शत्रु हरदा के पास ग्राम पलासनेर के रहने वाले है फिर क्या था उनके प्रशसंकों की भीड़ लग गई। जब भी वे मुम्बई से आते सैकड़ों लोग प्लेटफार्म पर उनका इंतजार करते और जब मुम्बई जाते तो इतने ही लोग उन्हें छोडऩे प्लेटफार्म पर जाते थे। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि कोई भी स्थानीय कार्यक्रम उनके बिना अधूरा रहता था। शालीन, निष्कपट, गरीबों के हमदर्द अजात शत्रु के बारे में अनोखा तीर के संपादक प्रहलाद शर्मा ने पहले ही बहुत कुछ लिख दिया है। इसलिए अब मेरे पास उनके बारे में लिखने के लिए कुछ शेष नहीं है बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि इस राष्ट्रीय साहित्यकार के बारे में लिखने के लिए मेरे शब्दकोष में वह शब्द नहीं है जिससे उनकी साहित्य यात्रा का वर्णन कर पाऊं।

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