Skip to content
Thursday, 29 October 2026
विशेष लेख / संपादकीय

साहित्यिक जगत की धरोहर है साहित्यकार अजात शत्रु

18 min read
Text Size:

हरिशंकर परसाई भी करते थे जिनके व्यंग्य लेखन की सराहना

– प्रहलाद शर्मा
संपादक दैनिक अनोखा तीर

आज दैनिक अनोखा तीर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा है। चूंकि आज अखबार द्वारा देश के उस सशक्त हस्ताक्षर के जन्मदिन पर विशेषांक का प्रकाशन किया जा रहा है जिसे समूचे हिन्दुस्तान में साहित्यकार अजात शत्रु के नाम से पहचाना जाता है। वैसे तो मुझमें वह सामथ्र्य नहीं है और ना ही मेरे पास वह शब्दकोष है जिसके माध्यम से साहित्यिक जगत की इस हस्ती के बारे में कुछ लिख पाऊं। चूंकि उन्होंने जब अपनी साहित्य यात्रा १९६८ में प्रारंभ की तब मैं ठीक से चलना तो क्या बोल पाना भी नहीं सीख पाया। हां बड़ा होने के बाद उनके असंख्य पाठक वर्ग में एक मैं भी हुआ करता था। आज मैं उस व्यक्ति की जीवन यात्रा पर कुछ प्रकाश डालने जा रहा हूं जिन्होंने मध्यप्रदेश ही नहीं अपितु संपूर्ण भारत को अपनी लेखनी के माध्यम से एक दिशा देने का प्रयास किया है। मैं बात कर रहा हूं संचार क्रांति के इस युग में सोशल मीडिया जैसे प्लेटफार्म से दूर अपनी फक्कड़ मिजाजी की जिंदगी कीपेड मोबाईल तक सीमित रखते हुए जीने वाले प्रोफेसर आर.एस. यादव की, जिन्हें साहित्यिक जगत में अजात शत्रु के नाम से जाना जाता है। हिन्दुस्तान के विभिन्न राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में वर्षों तक अपने व्यंग्य लेखन के माध्यम से समाज और व्यवस्थाओं पर तीखे व्यंग्य प्रहार करने वाले अजात शत्रु की प्रशंसा मध्यप्रदेश के ही ख्यातनाम व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई भी करते थे। शरद जोशी और हरिशंकर परसाई के समकालीन अजातशत्रु ने न केवल व्यंग्य लेखन ही किया अपितु फिल्मी दुनिया में भी अपने डायलॉग लेखन तथा लता मंगेशकर, आशा भोंसले और मोहम्मद रफी जैसे गायक कलाकारों के गीतों की सूक्ष्म समीक्षा करते हुए उन पर किताबें भी लिखी है। नवभारत नागपुर ने व्यंगकार शरद जोशी के कॉलम व्यंग्यकार की डायरी के लिए शरद जोशी के स्थान पर अजात शत्रु से यह कॉलम लिखाना शुरु किया था। भारत की स्वर कोकिला लता मंगेशकर के अनेक साक्षात्कारों सहित उनके गाये ८० उत्कृष्ट गीतों की समीक्षा पर जो किताब लिखी थी उसका विमोचन देश के राष्ट्रपति स्व. शंकरदयाल शर्मा ने स्वयं लता जी की उपस्थिति में किया था। आज मैं ऐसे प्रथम श्रेणी के साहित्यकार प्रो. आर.एस. यादव उर्फ अजात शत्रु के ८१ वें जन्मदिवस पर उनके निजी जीवन से आपको वाकिफ कराना चाहता हूं। चूंकि साहित्यकार अजात शत्रु साहित्यिक जगत की अनमोल धरोहर भी है।


जीवन परिचय
अजात शत्रु का जन्म ५ मई १९४२ को मध्यप्रदेश के खंडवा जिले की हरसूद तहसील अंतर्गत पिपलानी रेलवे स्टेशन के पास एक रेलवे क्वार्टर में हुआ था। यहां उनके नानाजी स्व. हरभजन यादव रेलवे में सेवारत थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा महाराष्ट्र के भुसावल में हुई। जहां उनके पिता कालीचरण यादव रेलवे में ट्रेन एक्जामिनर के पद पर कार्यरत थे। पिता का स्थानांतरण खंडवा होने के उपरांत कक्षा चौथी से एमए इंग्लिश तक की शिक्षा खंडवा में ही प्राप्त की। उच्च द्वितीय श्रेणी एमए इंग्लिश होने के कारण कॉलेज में नौकरी के लिए अपना पहला इंटरव्यूव १९६६ में हरदा कॉलेज में दिया था। वहीं दूसरे दिन कुसुम महाविद्यालय सिवनी मालवा में भी साक्षात्कार था तो वहां भी साक्षात्कार देने पहुंच गए। इस महाविद्यालय ने उनका चयन कर लिया था। जहां कुछ महीने ही अपनी सेवाएं दे पाए थे कि सरकार ने इमरजेंसी नौकरी में उन्हें बिलासपुर शासकीय गल्र्स डिग्री कॉलेज के लिए चयनित कर लिया। परंतु तब सरकार की नीति अनुसार ६ माह पश्चात पीएससी की परीक्षा देना भी अनिवार्य था। इसी दौरान एक दिन रेलवे प्लेटफार्म पर चने चटकारे खाने वाले कागज में उल्हासनगर सीएचएम कॉलेज का विज्ञापन पढऩे को मिला। उन्होंने जब वहां जाकर साक्षात्कार दिया तो उनका चयन हो गया। सन् १९६८ से २००२ तक इसी कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर के रुप में सेवाएं देते हुए सेवानिवृत्त हुए। अपने शिक्षाकाल में ही नानाजी होशंगाबाद जिले के पलासनेर रेलवे स्टेशन पर स्थानांतरित होकर आ गए थे। जहां उन्होंने अपना स्थायी निवास भी बना लिया था। यही कारण था कि पिता भी पलासनेर आकर ही रहने लगे। आज अजात शत्रु का परिवार चाहे स्थायी रुप से उल्हास नगर में रहता है लेकिन वह अपने ग्राम पलासनेर आकर फक्कड़ जीवन जीते हुए जो आत्मसंतुष्टि महसूस करते है वह उन्हें मुंबई की आबोहवा में नहीं मिलती।


साहित्य यात्रा
अजात शत्रु ने लेखन का कार्य अपनी ८ वीं कक्षा दौरान शुरू कर दिया था। उन्होंने पहली कहानी ‘बैलÓ लिखी थी। परंतु व्यंग्यकार के रुप में सर्वाधिक चर्चित नवभारत टाईम्स में प्रकाशित व्यंग्य १९६८ में ‘जब चांद पर चढ़ा आदमीÓ से हुए। उसके बाद राष्ट्रीय पत्रिकाएं धर्मयुग, सारिका, कादिम्बनी, साप्ताहिक हिन्दुस्तान सहित पंजाब केसरी, दैनिक जागरण, जनसत्ता तथा नवभारत टाईम्स जैसे अनेक अखबारों में प्रकाशित होते रहे। इस दौरान नवभारत नागपुर में व्यंग्यकार की डायरी कॉलम का लेखन शरद जोशी द्वारा किया जाता था। परंतु किसी कारणवश अखबार ने शरद जोशी के बजाए यह कॉलम अजात शत्रु से लिखवाना शुरु कर दिया। यही दौर था जब हरिशंकर परसाई भी अपने व्यंग्य लेखन के माध्यम से साहित्य के क्षेत्र में एक पहचान कायम कर चुके थे। लेकिन स्वयं श्री परसाई अजात शत्रु को श्रेष्ठ व्यंग्यकार मानते थे। व्यंग्य लेखन के साथ ही उल्हास नगर मुंबई में रहने तथा खंडवा में शिक्षा दौरान दादामुनी अशोक कुमार से हुई मित्रता के चलते फिल्मी दुनिया में भी अपनी छाप कायम करने में सफल हुए। फिल्म निर्माता व डायरेक्टर बी.के. आदर्श के संपर्क में आने के पश्चात फिल्मों के लिए डायलॉग लिखने का कार्य भी शुरु कर दिया। जहां फिल्मी दुनिया के मशहूर कलाकार कादर खान खुद डायलॉग लिखते थे वहीं अजात शत्रु ने कादर खान के लिए भी फिल्म गुप्त ज्ञान में डायलॉग लिखे। वहीं फिल्म नागफनी के लिए संवाद तथा पटकथा, डायलॉग, स्क्रीनप्ले सभी अजात शत्रु द्वारा लिखा गया। डायलॉग लेखन के चलते ही आपकी दोस्ती फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा से हुई। वहीं अपने घनिष्ठ मित्रों में अभिनेता प्राण को भी मानते रहे है। इसी दौरान स्वर कोकिला लता मंगेशकर के गाये पुराने गीतों की समीक्षा ने उन्हें लता जी के इतने करीब ला दिया कि लता जी उन्हें अपना भाई मानने लगी। लता जी के गाये गानों की समीक्षा को लेकर नईदुनिया इंदौर ने अजात शत्रु के नाम पर गीत गंगा कॉलम प्रारंभ कर दिया। जिसमें वह लगभग ३६ वर्षों तक लिखते रहे। इस दौरान उन्होंने लता जी पर गाए गीतों की किताब ‘बाबा तेरी सोनचिरैयाÓ लिखी। जिसका विमोचन एक भव्य समारोह दौरान लता मंगेशकर की उपस्थिति में राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने किया। वहीं लता जी के गीतों पर ही ‘लता और सफर के साथीÓ, आशा जी के गीतों पर ‘सदियों में एक आशाÓ, ‘अंजाने गायक अनसुने गीतÓ ‘एक मशाल आजादी के तरानों कीÓ जैसी अनेक किताबों के लिए लेखन किया। इसी तरह गीतकार मोहम्मद रफी के गाए गीतों पर तथा मध्यप्रदेश लघु फिल्म निगम द्वारा प्रकाशित किताब अशोक कुमार का लेखन भी किया। मध्यप्रदेश सरकार के लिए आदिवासी जनजाति संग्रहालय हेतु भी किताब का लेखन किया गया। इतना ही नहीं बल्कि इंग्लैंड की प्रसिद्ध उपन्यासकार ऐमिली ब्रॉन्टी के उपन्यास वदरिंग हाइट्स का हिन्दी अनुवाद किया, जिस पर फिल्म दिल दिया दर्द लिया बनी हुई है। राष्ट्रीय पटल पर लम्बे समय तक लेखन करने वाले इन हरफनमौला साहित्यकार का सर्वाधिक लगाव अपने अंचल की माटी और वहां के दीनहीन लोगों से सदैव ही बना रहा है। यही कारण है कि जहां वह अपने उच्च कोटि के साहित्य और व्यंग्य लेखों से देश दुनिया को दिशा देने का कार्य करते थे तो वहीं अपने क्षेत्र की छोटी-छोटी समस्याओं और शासन की योजनाओं के क्रियान्वयन सहित राजनीतिक घटनाक्रमों को लेकर हरदा से प्रकाशित साप्ताहिक वाईस ऑफ हरदा में घंटाघर से बाबूलाल कॉलम लोकभाषा में लिखा करते थे। उनके इन्हीं देशज भाषा के व्यंग्य लेखों को लेकर ‘शर्म कीजिए श्रीमानÓ किताब का प्रकाशन भी हुआ। वहीं जब दैनिक अनोखा तीर अखबार का प्रकाशन हरदा से शुरु हुआ तो आपने ‘मत चूके चौहानÓ व्यंग्य कॉलम के माध्यम से पाठकों को गुदगुदाया।

जब अनोखा तीर के लिए की लाईव रिपोर्टिंग
देश के ऐसे ख्यातनाम साहित्यकार, व्यंग्यकार, फिल्म समीक्षक, फिल्म डायलॉग लेखक प्रो. आर.एस. यादव ‘अजात शत्रुÓ का सानिध्य मुझे विगत ३५ वर्षों से मिलता रहा है। आज मैं यह लिखते हुए गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं कि ऐसे प्रख्यात साहित्यकार ने अपने जीवनकाल में पहली बार दैनिक अनोखा तीर के लिए ही जनता के बीच पहुंचकर जरुरतमंद गरीबों की पीड़ा से रुबरु होते हुए लाईव रिपोर्टिंग भी की। महज दो दिन की इस लाइव रिपोर्टिंग से प्रशासन के आलाधिकारी मानों सकते में आ गए थे। तब नर्मदापुरम् संभाग के संभागायुक्त मनोज श्रीवास्तव ने स्वयं मुझसे चर्चा कर कहा था कि प्रहलाद अजात शत्रु जी से यह क्या करवा रहे हो? ऐसी रिपोर्टिंग से क्या कलेक्टर के प्राण लोंगे? उन्होंने स्वयं अजात शत्रु जी से निवेदन कर लाईव रिपोर्टिंग न करने की बात कही। दैनिक अनोखा तीर के आग्रह पर ही वह पिछले कुछ वर्षों से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के जन्मदिन पर प्रकाशित की जाने वाली पत्रिका ‘मैं हूं नाÓ के लिए लेख अथवा शिवराज जी पर अपने विचार व्यक्त करते रहे। जिन्हें प्रकाशित कर हम फर्क महसूस करते रहे। यह फक्कड़मिजाज साहित्यकार दीन दुनिया की लाग लपेट से दूर, स्वयं के नाम की ख्याति या मंचीय सम्मानों से परहेज रखते हुए हरदा जिले के नजदीकी ग्राम पलासनेर में वर्ष में दो बार आकर अपने ग्रामीणों के बीच सादा जीवन जीते है। उनका मानना है कि मैनें अभी तक जिंदगी के बारे में लिखा, अब मैं जिंदगी हूं। अपनी लेखनी यात्रा में उपनिषेदों पर लिखने में सर्वाधिक आनंद की प्राप्ति बताने वाले अजात शत्रु अपने समकालीन व्यंग्यकारों पर भी बेबाक टिप्पणी करते है। उन्होंने कहा कि शरद जोशी माचिस थे तो हरिशंकर परसाई जलती हुई तीली थे। वैसे तो इस ख्यातनाम व्यंग्यकार को लेकर अगर किताब भी लिखी जाए तो कमतर है, लेकिन मुझे लगा कि अपने जीवनकाल में ५० वर्षों से भी अधिक लेखन सफर करने वाले साहित्यकार अजात शत्रु से वर्तमान पीढ़ी के पाठकों को अवगत कराया जाना आवश्यक है। चूंकि वह इंटरनेट या सोशल मीडिया जैसे किसी प्लेटफार्म का उपयोग कर स्वयं को प्रचारित नहीं करते है ऐसी स्थिति में न तो आज की पीढ़ी और न वर्तमान सरकार प्रदेश की ऐसी धरोहर से वाकिफ हो सकती है जिसने साहित्य को ओढ़ा बिछाया और पिया है। इसी बात को दृष्टिगत रखते हुए मैनें कुछ साहित्यकारों से भी संपर्क कर उनके विचार आमंत्रित किए। जिसका प्रकाशन इस विशेषांक के माध्यम से करने का प्रयास कर रहा हूं।

साहित्य की मूलभावनाओं के कथाकार है अजात शत्रु
अजात शत्रु का लेखन पढऩे ही नहीं अपितु प्रकाशित करने का भी मुझे लम्बे समय से सौभाग्य मिला है। वह जहां अजात शत्रु के नाम से व्यंग्य लेख और फिल्मी समीक्षा लिखते रहे वहीं शून्यानंद के नाम से आध्यात्मिक लेखन भी करते रहे है। जिसमें साहित्य की वह मूलभावनाएं देखने को मिली जिससे साहित्य अतीत से प्रेरणा लेते हुए वर्तमान को चित्रित करने का तथा भविष्य के मार्गदर्शन का कार्य करता है। उनके आध्यात्मिक लेखन में पाठक जहां मानवीय बाह्य विकृतियों और विशेषताओं का दर्शन करता है वहीं साहित्यिक लेखन में मानव की आंतरिक विकृतियां और खूबियां स्पष्ट नजर आती है। उन्होंने साहित्य के माध्यम से जिन वृहत्तर और गंभीर उत्तरदायित्वों के लिए हुकमरानों को सचेत करने का कार्य किया वहीं उन आधारभूत मूल्यों को भी रेखांकित किया है जिनसे विकसित समाज का निर्माण हो। साहित्यकार होने के नाते उनका मानव समाज के साथ एक ऐसा विशिष्ट संबंध लेखन में नजर आते रहा जिससे वह समाज को दिशा प्रदान करने का कार्य करते रहे। वह चाहे अपने सेवाकाल में अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रहे लेकिन हिन्दी की उत्कृष्ट भाषाशैली के साथ ही उन्होंने भारत की मूलभावना ग्रामीण भाषाशैली को भी उतनी ही बखूबी से अपनी लेखनी से सजाया है। अजात शत्रुजी वह साहित्यकार है जो महज शब्द मात्र की अभिव्यक्ति से ही संतुष्ट नहीं होते अपितु वह उस शब्द के स्त्रोत अथवा रुड तक जाने का हमेशा प्रयास करते रहे है। व्यंग्य लेखन में उनके द्वारा लिए जाने वाले पात्र और उनके माध्यम से किए जाने वाला चरित्र चित्रण भी हमेशा अनूठा ही रहा है।

लोक भाषा को लिखा ही नहीं जिया भी है
साहित्यिक जगत में अपनी उत्कृष्ट लेखन शैली के माध्यम से छाप कायम करने वाले अजात शत्रु ने लोक भाषा को ही उतनी ही संजीदगी के साथ लिखा भी है और वर्तमान में जी भी रहे है। कहने का आशय यह है कि देशज भाषा के माध्यम से अनेक गुदगुदाने वाले व्यंग्य लेख लिखते हुए जहां उन्होंने ग्रामीण जीवन का सजीव चित्रण अपनी लेखनी से किया है तो वह उस ग्रामीण जीवन को उसी अंदाज में जीते भी है। हरदा जिले के निकटवर्ती ग्राम पलासनेर में एक खलिहान में अपना आशियाना बनाकर वहां खटिया पर पूरी फक्कड़मिजाजी के साथ ग्रामीणों के बीच गांव का गज्जू बनकर बतियाने में उन्हें जो सुखानुभूति होती है वह मुम्बई के उल्लास नगर की चकाचौंध भरी दुनिया में नहीं। वर्षों पहले स्वयं के द्वारा रोपे गए वह पौधे जो आज उनके खलिहान में आम, नींबू, चीकू, जाम जैसे फलदार वृक्षों का स्वरुप धारण कर चुके है उन्हीं के बीच पहुंचकर वह अनंत के सुख की अनुभूति करते है। मुझे भलीभांति याद है कि लगभग २५ साल पहले जब मोबाईल ठीक से प्रचलन में नहीं आया था उस दौर में हम कुछ मित्रों के साथ अजात शत्रुजी के पास इन्हीं पेड़ पौधों के बीच बैठकर बतिया रहे थे। तब उन्होंने अनायास ही कहा कि अगर मैं मुम्बई में रहते हुए इस दुनिया से विदा भी ले लूं तो मेरे जाने की सूचना आपको मेरे यह पेड़ पौधे दे देंगे। बहुत ही मार्मिक रुप से उन्होंने कहा था कि जिस दिन इन पेड़ पौधों की पत्तियां निष्प्राण सी होकर झूली हुई प्रतीत हो समझ लेना अजात शत्रु इस दुनिया को अलविदा कह गए। खैर हम उनके दीर्घआयु की कामना करते है, लेकिन प्रकृति के प्रति उनके इस लगाव का उन्हीं के अनुकूल वर्णन करना मैनें यहां लाजमी समझा, इसलिए लिख दिया। ऐसा ही एक और वाक्या हास्य व्यंग्य के ठहाकों के बीच उन्होंने सुनाया था कि जब वह अपने कॉलेज से वापस घर लौट रहे थे तभी लोकल टे्रन में एक स्थानीय दैनिक दोपहर का अखबार हाथ लगा। जिसमें किसी अजात शत्रु के निधन का समाचार प्रकाशित हुआ था। चूंकि शीर्षक में अजात शत्रु का निधन लिखा था तो उन्होंने कहा कि अगर यह अखबार मेरी पत्नि ने पढ़ा होगा तो यह पढ़कर ही उसके प्राण पंखेरु उड़ गए होंगे। लेकिन यह पढऩे के बाद भी अगर वह जिंदा मिली तो मैं मर जाऊंगा। यह उनका एक महज व्यंग्य वाक्य था जो उन्होंने हास्य की दृष्टि से हमेशा सांझा किया। लेकिन इसमें भी कितनी गहराई छुपी हुई थी। अजात शत्रु अपने लेखन के प्रति जितने संजीदा रहते रहे उतने ही अपने पैतृक गांव पलासनेर की समस्याओं को लेकर भी बने रहे। पलासनेर दिल्ली मुम्बई मध्य रेल्वे का एक छोटा सा रेलवे स्टेशन है। रेलवे स्टेशन से बस्ती आने तक कच्चा रास्ता हुआ करता था। वह जब भी मुम्बई से आते तो उन्हें इस कच्चे रास्ते पर ग्रामीणों की पीड़ा हमेशा खला करती थी। इसे देखते हुए उन्होंने सीधे रेलवे के डीआरएम से मुलाकात की और उनसे अपने गांव का यह मार्ग पक्का बनाने की मांग कर डाली। चंूकि देश के जाने माने साहित्यकार ने रेलवे के सक्षम अधिकारी के समक्ष यह प्रस्ताव रखा था तो वह तत्काल स्वीकृत होकर पक्की सड़क के रुप में साकार हुआ। ठीक इसी तरह होशंगाबाद खंडवा राजमार्ग से अपने गांव तक के मार्ग को लेकर भी प्रदेश के सत्तासीनों से उन्होंने गुहार लगाई और आज जब वह मार्ग पक्का बन गया तो उन्हें ऐसा लगता है मानों अपने जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली। वर्तमान में उन्होंने फिर एक सपना देखा है कि गांव में एक हाईस्कूल खुल जाए और वह इसे लेकर कहते भी है कि अगर किसी दिन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मुलाकात होती है तो वह अपने गांव के लिए यह हाईस्कूल अवश्य मांगेंगे।

सम्मान से नहीं रहा कोई सरोकार
आज के समय में छोटा-मोटा कार्य करने वाले लोग भी स्वयं को अभिमंडित कराते हुए सम्मानित होने की जुगत करते नजर आते है। बल्कि यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि आजकल अधिकांश सम्मान और पुरुस्कार पहुंच पकड़ और जुगाड़ के माध्यम से ही अर्जित किए जाते है। लेकिन अजात शत्रु एक ऐसे साहित्यकार है जिनके पीछे सम्मान घुमता रहा और वह उससे दूर भागते रहे। बैंगलौर, नागपुर, इंदौर जैसे कई महानगरों में साहित्यिक संगठनों द्वारा कई बार उनकी साहित्य यात्रा को लेकर उनके सम्मान करने की इच्छा जाहिर की, लेकिन उन्होंने हमेशा ऐसा कोई सम्मान कराने या लेने से इंकार कर दिया। वह तो स्वयं का फोटो निकलवाने या फोटो छपवाने से भी हमेशा गुरेज करते आए है। स्वयं मुझे ही कई बार फोटो लेने से इंकार कर दिया बल्कि अपनी फक्कड़ शैली में लूंगी लपेटे हुए खटिया पर अद्र्धनग्न बैठी अवस्था में ही बोल दिया कि ले लो अगर फोटो ही लेना है तो ऐसे ही ले लो। क्या करोंगे मेरी फोटो का। यह जिस देह का आप फोटो लेना चाहते हो यह तो नश्वर है। याद रखना है तो उन शब्दों को याद रखो जो ब्रम्हाण्ड में हमेशा अमर है।

साहित्य सृजन की जननी है नर्मदांचल की माटी
मध्यप्रदेश की जीवन रेखा और असंख्य श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र मां नर्मदा का यह तटवर्ती क्षेत्र हमेशा से ही ज्ञान, ध्यान, तपस्या और साहित्य साधना का केंद्र माना जाता रहा है। आदिगुरु शंकराचार्य ने जहां मां नर्मदा के तट पर नर्मदाष्टक की रचना की तो वहीं अनेक ख्यातनाम साहित्यकारों की कालजई रचना आज भी हमारा मार्गदर्शन करते नजर आती है। इस पवित्र माटी ने माखनलाल चतुर्वेदी, मुंशी प्रेमचंद, हरिशंकर परसाई, प्रेमशंकर रघुवंशी और अजातशत्रु जैसे साहित्यकार, कहानीकार हमारे समाज को दिए हैं। हमारे मानव समाज का एक दस्तूर है कि वह जब तक कोई सिद्ध पुरुष या साहित्यकार, कहानीकार हो उसकी खासियत का गुनगान उसके न रहने जितना करता है उतना उसके रहते हुए नहीं। आज दादा माखनलाल चतुर्वेदी के नाम पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय खुल गया, मुंशी प्रेमचंद और हरिशंकर परसाई जी भी उतने ही पूजे और माने जा रहे हैं। लेकिन उसके ही समकालीन बल्कि जिनकी व्यंग्य रचनाओं की स्वयं हरिशंकर परसाई जी सराहना करते थे वह अजातशत्रु जी आज एक आम व्यक्ति भर है। जबकि सही पूछा जाए तो अजातशत्रु आम से भी आम व्यक्ति में खास है। इतना सहज, सरल होना ही उनका खास होना है। उन्होंने सच्चे अर्थों में साहित्य साधना की है जो आडंबरों से दूर रहकर भी इतिहास रच बैठें हैं। उनकी सहजता का ही उदाहरण है कि अजातशत्रु जी ने जहां हिन्दुस्तान के प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में वर्षों लेखन किया है, वहीं हरदा से प्रकाशित दैनिक अनोखा तीर में और इससे पहले साप्ताहिक व्हाईस ऑफ हरदा में भी देशज भाषा शैली में व्यंग्य लेखन किया है। वर्तमान में उम्र का तकाजा है और शरीर भी उतना साथ नहीं दे पाता है इसलिए लेखन लगभग बंद कर रखा है। उन्होंने इतनी सहज सरल भाषा में लेखन किया कि अल्पज्ञानी भी उसे आसानी से समझ सकता है। आमतौर पर एक साहित्यकार अपनी रचनाओं में वहीं लिखता है जो उनके जीवन में घटित होता हैं, अथवा देश व समाज में घटित घटनाओं को आधार बनाकर उसकी रचना करता हैं। समूचे वातावरण का प्रभाव साहित्य के केंद्र में पड़ता हैं। राजा महाराजाओं के दौर में साहित्य राज दरबार, शासकों की प्रशंसा, युद्ध आदि विषय पर केंद्रित था। पराधीन भारत में महिलाओं, किसानों, क्रांतिकारियों की वेदना को साहित्य में स्पष्ट देखा जा सकता हैं। इस तरह साहित्य वक्त के साथ-साथ चलते हुए सम्पूर्ण मानव इतिहास को भी अपने साथ लिए अगले दौर में प्रवेश करता हैं। आजादी के आंदोलन में क्रांतिकारियों को भारत की आजादी के लिए लडऩे के लिए प्रेरित किया था।
इस तरह अजातशत्रु जी का लेखन न केवल अपने दौर के हालातों को अगली पीढ़ी के लिए इतिहास कलमबद्ध करने की भूमिका निभाता हैं बल्कि अपने काल के समाज की आवश्यकताओं तथा तत्कालीन समस्याओं के प्रति उनकी भूमिका को भी स्पष्ट कर कर्तव्यपालन के लिए प्रेरित करता आया हैं।
साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता हैं। समाज में जो कुछ घटित होता है उसका प्रतिबिम्ब साहित्य में स्पष्ट देखा जा सकता हैं। अजातशत्रु जी का लेखन भी हमें कभी गांव के खेत-खलिहानों तो कभी वहां की बदहाल स्थिति से सीधे रुबरु कराते नजर आता है। तो कभी सत्ता के शीर्ष पर बैठे हुक्मरानों को हकीकत का आइना दिखाते हुए सीधे लताड़ता हुआ। चूंकि वह समाज की तात्कालीन परिस्थतियों को आधार बनाकर अपने साहित्य का सृजन करते रहे। इस आधार पर कहा जा सकता है कि साहित्य समाज का महत्वपूर्ण अंग हैं।
इस तरह कहा जा सकता है कि समाज का साहित्य पर और साहित्य पर समाज का परस्पर प्रभाव पड़ता हैं। यदि किसी दौर के सामाजिक राजनितिक जीवन का अध्ययन करना हो अथवा उसके सम्बन्ध में जानना हो तो उस दौर का साहित्य हमारी मदद कर सकता हैं। एक अच्छा साहित्य मनुष्य जीवन तथा समाज की उन्नति, उत्थान तथा सुचरित्र के निर्माण में सहायक होता है। मानव मस्तिष्क की परिपक्वता तथा विचारों के प्रस्फुटन में साहित्य का बड़ा महत्व होता हैं। आदर्शवादी गुणों के उद्भव एवं चरित्र में उसके प्रयोग की प्रेरणा साहित्य ही प्रदान करता हैं। इसकी अद्भुत शक्ति का प्रयोग कई इतिहास प्रसिद्ध हस्तियों ने किया, जिसके कारण आज हम उन्हें महापुरुषों के रूप में याद करते हैं। खुद अजातशत्रु जी कहते है कि जीवन का अन्य नाम गतिशीलता है। वह विचारों के रूप में जन्म लेकर जीवन को गति प्रदान करती हैं। विचारों का जनक साहित्य ही होता हैं। वर्तमान में हम अपने समाज एवं देश के जीवन, संस्कृति को भ्रमण कर लोगों से जानकर पता कर सकते हैं। मगर पूरे काल के जीवन की झलक केवल उस समय के साहित्य में ही मिल सकती हैं। देश के ऐसे प्रख्यात साहित्यकार, व्यंग्यकार, फिल्म समीक्षक बाबा शून्यानंद और हम सब के प्रेरणास्रोत प्रोफेसर आर. एस. यादव उर्फ अजातशत्रु जी को जन्मदिन पर दैनिक अनोखा तीर परिवार तथा सभी ईष्ट मित्रों की ओर से अशेष शुभकामनाएं। मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं कि आज मुझे उनके जन्मदिन पर यह विशेषांक प्रकाशित करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

295 Views
What do you think?

Leave a Reply