अजातशत्रु , अर्थात ……..!
(दार्शनिक व्यंग्यकार अजातशत्रु से साहित्यकार कैलाश मंडलेकर का एक गंभीर वार्तालाप)

अजातशत्रु की रचना प्रक्रिया और जीवन दर्शन को सीधी और सरल रेखा में नहीं मापा जा सकता। उनका रचनात्मक संसार विविध और बहुआयामी है तथा उसे स्पर्श करने पर सहज ही पता चलता है कि वे हिंदी के सर्वाधिक जटिल और चिन्तनशील व्यंग्यकार हैं। यह अलहदा बात है कि उनके वैयक्तिक तथा सामाजिक संघर्षों, व्यापक अध्ययनशीलता तथा सूक्ष्म वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि को अभी ठीक से समझा नहीं गया है। दरअसल उनके व्यंग्य के तल पर भी उसी अंतिम और निहत्थे आदमी की पीड़ाएँ और दर्द विद्यमान है जिसके लिए साहित्य और राजनीति में तमाम तरह की प्रतिबद्धताएं व्यक्त की जाती रही हैं। अजातशत्रु अपने लेखन में बिना किसी घोषित प्रतिबद्धता के आज भी उस अंतिम आदमी के साथ हैं जो हर बार राजनीति के गरीबी हटाओं नारे का शिकार होते रहा और आजादी से लेकर आज तक किसी अनाम गाँव के दरिद्र घूड़े पर खाद की गाड़ी भरता रहा तथा किसी मुटमर्द जमीदार की लहलहाती फसल के लिए होम होते रहा।
अब इस विरोधाभास का क्या कीजिएगा की हिन्दी का परम्परागत आलोचना शास्त्र आरम्भ से ही साहित्य को विधाओं की सीमा में बाँध कर देखता रहा है और अजातशत्रु की कलम हर बार विधाओं की बागुड़ फलांगने की आवारगी में सृजन का सत्य तलाशती रही। वरना क्या कारण है कि जब बड़े-बड़े कलमवीर किसी न किसी विधा का पुछल्ला पकड़कर प्रायोजित समीक्षाओं के बल पर कई किस्म के छोटे बड़े पुरस्कार, पदों और पीठों को हथियाने की होड़ में किसी भी जूड़े के नीचे गर्दन झुकाने को तैयार बैठे मिलते हैं तब अजातशत्रु अपने लेखन में भाषा के मिथ्यात्व की बात करते हुए आदमी की मुक्ति का दर्शन तलाशते दिखाई देते हैं। वे फिल्म अभिनेता अशोक कुमार की बायोग्राफी अथवा लता मंगेशकर की गायकी पर लिखते हुए अक्सर गायन और एक्टिंग की उन सूक्ष्मताओं तक पहुँचते हैं जिनके तल पर शुद्ध नाद अथवा कला के औजार गढ़े जाते हैं। और जहां कलाकार को खुद पता नहीं होता कि वह स्वयं गा रहा है या उसके भीतर सुर का एक अजन्मा और कुंवारा सा झरना फूट पड़ा है। व्यंग्य में यद्यपि अजातशत्रु परसाई के प्रशंसक रहे हैं लेकिन वे इस बात से फिर भी सहमत नहीं हैं कि अंतिम व्यंग्य परसाई तक सिमट कर रह जाएगा। अजातशत्रु हर बार अपने लेखन में व्यंग्य की अगली भूमि तलाश करते नजर आते हैं। व्हाइस ऑफ हरदा में छपे उनके अनेक व्यंग्य लेखों में मौजूद ग्रामीण, भोले और अशिक्षित पात्रों में वही करुणा दिखाई पड़ती है जो चेखव के पात्रों में पाई जाती है। हालांकि यह तुलना भी बेमानी है। असल बात यह है कि अजातशत्रु, मनुष्य को उसकी जन्मना और चिरंतन परम्परा के आलोक में रखकर परिभाषित करना चाहते हैं। क्योंकि भूख और रोटी के सीखंचों में जिन्दगी को रेजिमेंट नहीं किया जा सकता। यहाँ अजातशत्रु का व्यंग्य उस सनातन ऐतिहासिकता को स्पर्श करता है जहां जीवन विराट, चिरंतन और शाश्वत है और जहां कोई भी विचारधारा अंतिम नहीं हो सकती।
अजातशत्रु से बातचीत करना, तर्क करना आसान नहीं है। मैं विगत 15 -20 वर्षों से उनसे बातचीत करते रहा हूँ। आरम्भ में इस बातचीत के पीछे मेरे कुछ निजी स्वार्थ हुआ करते थे। तब मैं अपनी कुछ तात्कालिक समस्याओं के समाधान की तलाश में रहा करता था। बाद में हमारी बातचीत गहरी होते चली गई। फलत: विचार और समझ के स्तर पर कई दृष्टियों से मेरा परिमार्जन भी हुआ और एक नया व्यंग्य बोध भी विकसित हुआ। मैंने यह भी महसूस किया कि अजातशत्रु से मिलकर आप हरगिज वह नहीं रह सकते जो उनसे मिलने के पहले होते हैं। उनसे मिलकर लौटना कई तरह के नए प्रश्नों और अनन्त जिज्ञासाओं से लबरेज होकर लौटना है। हरदा के निकट पलासनेर गाँव में स्थित उनके पुश्तैनी घर से लगे हुए खले में यूकेलिप्टस, नींबू और अमरूद के दरख्तों के बीच बैठकर उनसे बतियाना एक बारगी उस दुनिया से रूबरू होना है जो कुछ -कुछ नई अथवा समानांतर दुनिया का बोध कराती है। अजातशत्रु की यह दुनिया रोमांच और जिज्ञासाओं से भरी भी होती है और कबीर के ब्रह्म की तरह पुहुप वास से पातरी भी। इस बातचीत में उस दुनिया की एक छोटी सी झलक मौजूद है। यह वार्तालाप यदि जस का तस पाठकों तक पहुंचता है तो इन पंक्तियों के लेखक का श्रम सार्थक होगा।

कैलाश मंडलेकर : व्यंग्य लेखन की शुरुआत कैसे हुई। पहला व्यंग्य कब लिखा?
अजातशत्रु : बचपन से ही सोचना और बोलना कुछ -कुछ व्यंग्य में ही होता था। आज भी आक्रोश से भर उठता हूँ तो अपने आप कोई फैंटेसी सूझ जाती है। कहने का आशय यह कि व्यंग्य मुझे सीखना नहीं पड़ा। हाँ पठन पाठन का प्रभाव अनजाने जरूर पड़ा होगा।
पहला व्यंग्य कॉलेज के दिनों में लिखा था जब मैं द्वितीय वर्ष कला का छात्र था। यह व्यंग्य एक औसत छात्र के दैनंदिन के बारे में था जिसमे हास्य और व्यंग्य सहजता से आये थे। उन दिनों के मेरे प्राध्यापक श्री श्रीकांत जोशी, श्री नारायण उपाध्याय, श्री डी डी विद्यार्थी और श्री रक्षा कुमार वाजपेयी (सब खंडवा के) ने इस रचना को काफी पसंद किया और सराहा। उसके बाद व्यंग्य 3-4 साल बाद लिखा जब प्रोफेसर हो गया और बंबई आ गया। पहला प्रकाशित व्यंग्य आदमी चाँद पर उतर गया था जो नवभारत टाइम्स के बंबई संस्करण में छपा था। इस व्यंग्य पर (और बाद के अनेक व्यंग्यों पर अरसे तक) परसाई जी का बहुत असर था।

कैलाश मंडलेकर : आपने पिछले वर्षों में सार्थक व्यंग्य लेखन किया। नई दुनिया में हस्तक्षेप जैसा महत्वपूर्ण व्यंग्य कॉलम भी लिखा। आजकल आप व्यंग्य लेखन के प्रति उदासीन हैं, क्यों? क्या विसंगतियों, विरोधाभासों पर प्रहार करने में व्यंग्य के हथियार भोंथरे साबित हुए हैं?
अजातशत्रु : व्यंग्य लिखता हूँ। आज भी लिखता हूँ। मगर एक छोटे से अखबार में। यह काम निरंतर 15-20 वर्षों से एक साप्ताहिक व्यंग्य स्तम्भ के रूप में जारी है। बड़ी पत्रिकाओं में व्यंग्य लिखने की कोशिश नहीं की, क्योंकि मेरे पास आधुनिक शहरी भाषा नहीं है। लेखन के भीतर तरतीब नहीं है। अक्सर व्यंग्य लेखन सनकों से भरा हुआ होता है। उसमें एक शख्स की अराजकता होती है। कुछ इस ख्याल से मैं स्थापित पत्रिकाओं को अपना लिखा नहीं भेज पाता। फिर ऐसा भी मानता हूँ कि व्यंग्य लेखन स्वाभाविक लेखन नहीं है। व्यंग्य गढ़ा जाता है। परसाई जी चौबीसों घंटे न व्यंग्य बोल सकते थे न लिख सकते थे। उन्होंने जो भी लिखा था किन्ही अर्थों में उसे साधा भी था। सीधे विचार प्रवाह से मोड़कर उसे श्रमसाध्य या संकल्पजन्य ट्विस्ट भी दी थी। इससे परसाई जी का गहरा सोच, स्वाभाविक विस्फोट कुछ हद तक प्रभावित भी हुआ होगा। इससे निजी तौर पर नुकसान तो होता ही है भले ही आपकी बाहरी छवि या कीर्ति क्यों न बड़ी हो। व्यंग्य के मामले में मेरी एक निजी दिक्कत यह भी है कि बार-बार उसे निश्चित अंत की तरफ मोडऩा पड़ता है। यानी लड़ो, विद्रोह करो, मोर्चा सम्हालों वगैरह-वगैरह की स्थायी सीख। यह मुझे अपने प्रति झूठा, सीमित और फरमाइशी लगता है। मैं देखता हूँ कि जीवन अपरिमित है, वह किसी विधा में नहीं अटता। वहाँ हमें अनेक प्रश्नों का सामना करना पड़ता है जो आज राजनीति और व्यवस्था के प्रश्न नहीं है। तो जब जैसा बना, जरूरी लगा वैसा लेखन हुआ। व्यंग्य और अव्यन्ग्य सब एक विरल लेखन के हिस्से हैं। रहा विरोधाभासों और विसंगतियों का प्रश्न तो व्यंग्य लेखन का एक गहरा रूप यह भी हो सकता है कि वह और भी गहरी विसंगतियां पकड़े जो आदमी के आदमी होने की विसंगति है। आदमी की शाश्वत दार्शनिक उलझनें हैं। उसकी अपनी चारित्रिक दुर्बलताएं हैं। यानी कि खुद व्यंग्यकार कितने गहरे अज्ञान या लाचारी का शिकार है इसे भी स्वयं व्यंग्यकार को खोजना होगा। और अपने साथ तथा प्रगट विश्व के साथ दार्शनिक की तरह जूझना होगा। मेरी मान्यता है कि गुरु परसाई की तरह आचार्य शंकर और बुद्ध भी व्यंग्यकार ही हैं वो उनके वक्तव्य या उद्गार में सीधा व्यंग्य नजर नहीं आता।
सीधे सीधे कहूँ तो यह कि जिस लेखक को जो सूझता है उससे जो सधता है वह उसे ही करें। नकल फकल के चक्कर में क्यों जाए। देश में परसाई जी और शरद (जोशी) का व्यंग्य लेखन में इतना नाम रहा कि अधिकाँश नव व्यंग्यकारों ने जाने अनजाने उन्ही की तरह लिखना चाहा, वैसे ही जुमले बनाने की कोशिश की और अपने स्वाभाविक विकास को अवरुद्ध किया। परसाई जी एक जन्मना व्यंग्यकार थे और उनकी सोच प्रतिभा और दृष्टि राजनीति की ओर मुड़ी हुई थी। उन्होंने अपने तई और अपने समय के प्रति एक निश्चित, सही सीमा में सफल और सार्थक व्यंग्य लेखन किया। लेकिन परसाई पर जाकर जीवन, इंसान,आदमी की आभ्यांतरिक उलझनें और अज्ञान के अनेक आयाम खत्म हो जाते हैं, ऐसा नहीं है। एक राजनीतिक विचारक, जो परसाई थे के आगे हमें ऐसा व्यंग्यकार भी चाहिए जो जीवन को चेखव व बर्नाड शा की तरह बल्कि इनके भी आगे जाकर एक मेटाफिजिकल, चिन्तक की हैसियत से पकड़े। हमें सम्मानीय परसाई के डरावने प्रेत से मुक्त होकर व्यंग्य की नई जमीनें भी तलाशनी होगी जो आदमी की आत्मा और उसकी भीतरी जटिलताओं में है। आगे भाषा को लीजिये और देखिये कि इससे बड़ा व्यंग्य धरती पर कहाँ है कि अनुभव को व्यक्त करने के लिए हमारे पास कोई भाषा नहीं है, और इधर भाषा अनुभव नहीं है और न ही भाषा से अनुभव पैदा किया जा सकता। यहाँ से वहाँ तक आदमी अच्छे और बुरे अर्थ में शाश्वत से अकेला है और शब्दों तथा इंसान की भीड़ में उसे पुन: अपना अकेलापन तलाशना होगा , जहाँ वह अपराधी की तरह अकेला नहीं, मुक्त आत्मा की तरह तन्हा और विश्वव्यापी आत्मा है। आप इसे आध्यात्म या मेटाफिजिक्स कहकर लाख रिडिक्युल कर लें मगर आदमी की तासीर यही है कि रोटी के साथ और रोटी के बिना वह अपने आप का क्या करें, कैसे खुद को टैकल करें। व्यंग्यकार को मार्क्सवादी सीमा में काम करते हुए मार्क्सवादी दुराग्रहों को फलांगना भी पड़ेगा। उसे सब कुछ लिखकर बार बार इस स्वस्थ संदेह को साथी बनाना पड़ेगा कि भाषा में लिखा, पढ़ा गया अपने आप में कन्ट्रेडिक्ट है, मिथ्या है, काम चलाऊ है। इसलिए अनुभव की दुनिया को अतीन्द्रीय स्तर तक फैलाना होगा। यह स्वयं भाषा पर शक करने के कारण ही संभव होगा। एक बात और, आज युवा व्यंग्यकार अपने आपको स्मार्ट पर्सन समझता है, तेवर साधता है, मुद्रा अख्तियार करता है, सोचता है कि वह तीसमारखां हो गया और व्यवस्था से उसका झगड़ा ही झगड़ा है। नहीं व्यंग्यकार भी इसी जगत का प्राणी है और प्रकृति के रहस्यों का शिकार है। वह मुक्त नहीं है और उसका लेखन किसी दूसरे आदमी को मुक्त नहीं कर सकता। अभी व्यंग्यकार भी व्यंग्य का विषय ही है। हमें फैशनी क्रांतिकारिता से आगे जाना होगा।
कैलाश मंडलेकर : शुरुआती दौर में तो साहित्य में व्यंग्य की बहुत प्रतिष्ठा नहीं थी और न ही व्यंग्य को विधा माना जाता था। फिर आप व्यंग्य लेखन की तरफ क्यों प्रवृत्त हुए, क्या इसके पीछे पूर्ववर्ती लेखकों यथा परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, त्यागी आदि का प्रभाव था या स्वत: स्फूर्त आप व्यंग्य लिखने लगे?
अजातशत्रु : इसमें दो राय नहीं है कि जाने अनजाने मुझ पर कबीर और परसाई का असर पड़ा। पहला तो इसलिए कि अनादि से आदमी व्यंग्य पसंद करते आया है, क्योंकि गहरे में वह असंतुष्ट है, शोषित है, उपेक्षित है बदला लेना चाहता है वगैरह वगैरह। दूसरा असर इसलिए पड़ा कि मुझे लगा कि व्यंग्य की शक्ल में मैं भी अपनी बात इन व्यंग्यकारों की सी सहजता से कह, लिख सकता हूँ। तीसरा कारण यह है जो शायद पहला कारण है कि अपने आक्रोश को साहित्य में कहने का तरीका व्यंग्य ही है भले ही तब आप ऑफिशियली व्यंग्य रचें या आपके लेखन में व्यंग्यात्मकता का स्वाद आ जाए। एक और बात। अक्सर यह उक्ति मैं वर्षों से सुनते आ रहा हूँ कि भारत में व्यंग्य अन्य विधाओं की बनिस्बत नया है। मै पूछूँ इसका क्या मतलब है। व्यंग्य कभी उपेक्षित नहीं रहा। वह अनादि है क्योंकि असंतोष आक्रोश अनादि है। हाँ व्यंग्य उपेक्षित रहा तो इसलिए कि व्यंग्य लिखा ही नहीं गया जैसा कि आज नजर आता है। दूसरे, हालात भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। तीसरे, व्यंग्य भारत में एक नया फिनामेनन है। (उस मायने में जैसा आज नजर आता है) क्योंकि आज व्यंग्य बोध और व्यंग्य लिखने की तत्परता, संवेदनशीलता ज्यादा स्पष्ट है। बहुत कुछ व्यंग्य लेखन विश्व साहित्य से हमारे संपर्क बढ़ जाने के कारण भी हुआ है। परसाई जी पर रूसी लेखक चेखव का स्पष्ट प्रभाव है।
कैलाश मंडलेकर : आपके लेखन में एक किस्म का दार्शनिक आग्रह होता है और आप हर जगह एक औपनिषदिक सच को खोजते दिखाई देते हैं। क्या लेखन अपने आपमें सत्य की तलाश नहीं है। बर्नाड शा ने कहा है व्यंग्य लेखन का सर्वोत्तम तरीका है सत्य कहना। आप क्या कहते हैं। क्या दार्शनिक का सच और लेखक का सच दो भिन्न चीजें हैं।
अजातशत्रु : लेखन अपने आप में सत्य की तलाश है। लेखन में भाषा को फलांगने की कोशिश की जाती है। और अनजाना लक्ष्य यही रह जाता है कि हम लेखन के भी पार निकल जाएँ। प्रश्न है इससे क्या होगा। सच क्या है ? भाषा के पार क्या है ?और वह हमारे दैनिक जीवन में किस काम का है ? मैं, आपको बता दूँ कि जाने अनजाने मैं शुरू से ही शून्य की तलाश में रहा हूँ और शून्य मेरे लिए ईश्वर, स्पष्टता और मोक्ष का पर्याय है। इसका अर्थ यह नहीं है कि लेखन दैनिक जीवन और उसके यथार्थ को नकारता है। जी नहीं वस्तु जगत और उसके छोटे बड़े यथार्थ तो कभी रद्द होते ही नहीं, बल्कि लेखन द्वारा भाषा के पार जाकर उस शून्यता को खोज लिया जाता है जो तमाम यथार्थों के बीच भी अछूती है। लेख के ही कारण अंत में भाषा के पार जाकर मैं वापस यह देख और समझ पाया कि भाषा ही मूलभूत बंधन है और भाषा से अलग आदमी के लिए कोई बंधन नहीं है। ऐसा इसलिए कि वस्तुओं का कोई नाम नहीं है और वस्तु जगत भाषा के बिना खड़ा है। यह सच लेखन के द्वारा ही मंै समझ पाया। आपने पूछा है कि क्या लेखक का सच और दार्शनिक का सच दो भिन्न चीजें हैं? इसका जवाब है कि भाषा ही लेखक का, दार्शनिक का बंधन है। इसके पार कोई सवाल, कोई जवाब और कोई सच नहीं है। यही सच है। फिर भी आप जानना चाहते हैं तो एक बेहूदी बात सुन लीजिये लेखक और दार्शनिक का सच एक ही है बशर्ते सच उसे माना जाए जहां भाषा रद्द हो जाती है और जहाँ कुछ भी कहना वापस विरोधाभास के गर्त में गिरना है। रही बात बर्नाड शा की तो वह जिसे सच बताते हैं वह कोई सोशल या पोलटिकल कमिटमेंट है। जाना उसके भी पार पड़ता है।
कैलाश मंडलेकर : आधी वैतरणी के बाद आपका कोई व्यंग्य संग्रह नहीं आया। प्रकाशन के प्रति इस उदासीनता के क्या कारण हैं। क्या आप किसी लम्बी व्यंग्य रचना जैसे उपन्यास या नाटक आदि पर काम कर रहे हैं।
अजातशत्रु : सच कहूँ, प्रकाशन में इतनी स्वभावगत दिलचस्पी मुझे कभी नहीं रही कि छपी हुई रचनाएं पुस्तकाकार होकर सामने आ जाएँ, इसका कारण यह है कि मैं शुरू से ही अपने को, या सच को, या किसी मूलभूत तल को खोजने में व्यस्त हूँ और सतह पर इतना नहीं आ पाता कि सामान्य दुनियादारी निभा सकूँ। अलावा इसके मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि मैंने कोई तुर्रमखां चीज लिख दी है जिसे जमाना देखे। एक प्रच्छन्न पेसिमिज्म (श्चद्गह्यह्यद्बद्वद्बह्यद्व) शायद यह भी है कि लोग बाग और बुद्धिवादी वादों और ढांचों में इतने बंधे हुए हैं कि अलहदा, विचित्र और बेहद एकान्तिक चीज उन्हें विवादास्पद और आर्म चेयर का विलाप लगेगी। फिर भी अगर थोड़ा बहुत लिखा है और छपा है तो शायद वह संपादकों, मित्रों और शुरू शुरू में प्रसिद्धि की वासना के कारण अधिक था, मेरी खुल्ली तैयारी की कारण कम। हाँ एक उपन्यास दिमाग में है और वह भी सिर्फ एक उपन्यास। यह दरअसल उपन्यास नहीं है एक सतत ब्यौरा है, शाब्दिक अरेंजमेंट है उस सबका जिसे मैंने बचपन से अपने गाँव में देखा है, भोगा है और भोगते जा रहा हूँ । जाहिर है यह व्यंग्य उपन्यास का ही विषय है। क्योंकि सन 50 के बाद और खासकर 60 के बाद देश में जो अपसंस्कृति पनपी है, काले और सस्ते पैसे की बाढ़ और निर्लज्ज राजनीति ने जिस तरह पाँव पसारे हैं – वह आपसे धांसू उपन्यास के सिवा क्या लिखायेगी।
कैलाश मंडलेकर : स्वातंत्र्योत्तर व्यंग्य मूलत: देश के अभाव ग्रस्त मध्यम वर्ग की स्थिति में बदलाव की बैचेनी से ओतप्रोत रहा है। लेकिन फिलहाल बदलाव के कोई संकेत दिखाई नहीं देते बल्कि स्थितियां और भी बदतर हुई हैं। क्या यह व्यंग्य लेखन की असफलता है?
अजातशत्रु : आप कुछ भी कहें, कितनी बहस करें, कितनी फिलासफियाँ बना लें, सच्चाई यह है कि लेखन कुछ नहीं बदलता। कुछ नहीं बदल सकता। वह मात्र वर्णन करता है – जबकि लेखक के आग्रह, दुराग्रह, अपने होते हैं। ब्रह्माण्ड की नाना रूपात्मकता और अनेकधर्मिता में लेखन एक ऐसा निजी काम है जो लेखक के अपने आत्मसुख और समाधान के लिए है और दूसरी ओर उस पाठक के लिए जो अपनी पसंद का साहित्य खोज कर पढ़ता है। अर्थात लेखन एक सलेक्टिव एक्ट है जिसमें एक ओर से लेखक लिखने के लिए और पाठक पढऩे के लिए घुसता है। इसमें कोई किसी से बंधा हुआ नहीं है। बस म्युचुअल टेस्ट मिलवा देता है। फिर भी अगर साहित्य सामान्य कालों में (भौतिक उथल पुथल के प्रसंगों को छोड़कर) आदमी को बदलता है तो इस मायने में कि वह इंसानों के दूसरे हिस्से यानि पाठकों को सोचने को मजबूर करता है। पर सोचने से सब कुछ हो जाए – यहाँ तक कि आप बुद्ध या सिकंदर भी बन जाएँ तो भी संसार कुल मिलाकर हमारी टेमिंग (नियंत्रण) से बाहर ही रहता है और अपनी आंतरिक समग्रता से ही आगे बढ़ता है। अत: खुदा कोई नहीं है। और इस मायने में लेखक भी कोई विशिष्ट चीज नहीं है। मैंने ऐसा इसलिए कहा कि मुझे ऐसा ही दिखता है। या मैं ही खास किस्म का हूँ जिससे शेष संसार मेरे हाथ से निकल जाता है।
कैलाश मंडलेकर : क्या नए व्यंग्यकार व्यंग्य के पुराने मुहावरों को तोड़ पा रहे हैं या विवश पुनरावृत्तियाँ हो रही हैं?
अजातशत्रु : मैंने तुमसे बार बार कहा है कैलाश और फिर कहता हूँ कि मेरी नजर में सबसे बड़ी क्रान्ति भाषा को तोडऩा है। ऐसी क्रांति विज्ञान में आइन्स्टीन ने की, आध्यात्म में बुद्ध , महावीर, शंकर,जे कृष्णमूर्ति और रजनीश ने की, पाश्चात्य में सात्र और अन्य एब्सर्ड्स ने की। वर्तमान व्यंग्य की, यहाँ तक कि परसाई और जोशी के व्यंग्य लेखन की भी सीमा यह है कि वे भाषा के भीतर घुसकर रह जाते हैं। उनमें अभिनव को, अकल्पनीय को, भाषातीत को और अमूर्त को खोजने, पकडऩे की व्याकुलता और सघन पीड़ा नहीं है। इसका कारण यह है कि आम लेखक और आम आदमी शुरू से ही यह मानता आया है कि समाधान भाषा या तर्क गत निष्पत्ति के भीतर है। जब तक यह आग्रह नहीं टूटता और हम स्वयं भाषा की जड़ता और मुर्देपन को नहीं पहचानते, किसी भी किस्म का मेजर ब्रेक थ्रूमुश्किल है। इस बात को सरल ढंग से कहूँ तो यह कि तर्क या भाषा की सीमा में संसार की किसी गुत्थी का उपाय है ही नहीं। (बल्कि भाषा ही असल राक्षस है) सो भाषा को तोडऩा ही हर बार अगला विकास है। और वह विकास मुझे हिन्दी में किसी भी वर्तमान लेखक में नजर नहीं आ रहा है। मार्क्सवादी समीक्षक नामवर सिंह ऐसे सोच को घटिया रहस्यवाद कहकर उपहास कर सकते हैं। मगर क्रान्ति और शान्ति के कालों में भी मूलभूत और स्थायी समस्या यह है कि आदमी कैसे भाषा से मुक्त हो। और इस तरह काल और भय से मुक्त हो। भैया मैं किसी भी क्रान्ति में विश्वास नहीं करता। दूसरे शब्दों में व्यंग्य यह है कि व्यंग्यकार स्वयं व्यंग्य से मुक्त नहीं है। बाकी, व्यंग्य लेखन तो खैर दुनियादारी है इसमें यह जवाब भी अपने आप आ गया कि आज के व्यंग्य पर मेरी नजर क्या है।
कैलाश मंडलेकर : समकालीन व्यंग्य लेखन पर आपकी प्रतिक्रिया?
अजातशत्रु : समकालीन व्यंग्य लेखन छिटपुट ही है। वह विसंगतियों को चुन लेता है और उन पर फिर व्यंग्यात्मक जुमले गढ़ते चलता है। कई व्यंग्य लेख हैं जो वाक्य दर वाक्य बढ़ते हैं और इन वाक्यों में सोच समझकर, साधकर फैशनी किस्म की व्यंग्यात्मकता डाल दी जाती है। पूरा व्यंग्य एक विजन के रूप में कली से फूल बनने की तरह नहीं फूटता। उसमें शक्तिशाली प्रेरणा का स्वाभाविक उन्मेष नहीं होता। बड़ी बात यह है कि अनप्रेडिक्टेबल, सनकी और अस्त व्यस्त नहीं होता, उसका सधा हुआ होना खटकता है। कविता की तरह शायद व्यंग्य ही एक मात्र विधा है जिसे आप गढ़ नहीं सकते, डिक्टेट नहीं कर सकते, फार्मूले में नहीं बाँध सकते। कहीं कहीं कविता से ज्यादा जटिल होकर वह अपने आप फूटता है और काव्यात्मक विजन का रूप ले लेता है। ऐसा व्यंग्य परसाई के बाद अभी तक नहीं आया। कहीं कहीं फंतासियाँ रची गई हैं मगर वे कोल्ड हैं। वे व्यंग्यात्मक वर्णन अधिक हैं फूटा हुआ सृजनात्मक एसेंस कम। हाँ ज्ञान चतुर्वेदी जरूर हैं जो मुझे फितरत से व्यंग्यकार मालूम पड़ते हैं पर उनमें विराट रचनात्मक सनक और अन्प्रेडीकटेबिलिटी का पुट करीब करीब न के बराबर है। वे संवेदनशील और समझदार व्यंग्यकार हैं पर एक व्यंग्यकार का रचनात्मक डीरेन्ज्मेंट या पागलपन उनमें नहीं मिलता। फिर भी समकालीन व्यंग्यकारों में वे अकेले ध्यान खींचते हैं और एक ध्वस्त मठ के फटे हुए झंडे को बचाए हुए हैं। प्रश्न यह भी है कि परसाई जैसा व्यंग्यकार हमारे पास क्यों नहीं आया, इसका कारण यह है कि परसाई लेखक होने से ज्यादा विचारक थे। उनके पास गहरे कन्विक्सन्स थे और वे एक राजनीतिक दार्शनिक के कन्विक्संस थे। इसके बलबूते पर वे परमात्मा से भी बहस कर सकते थे और तब उन्होंने जो लिखा बहुत मजबूती और ताकत से लिखा। परसाई जैसी व्यापक दृष्टि का हमारे व्यंग्यकारों के पास अभाव है। वे ज्यादा पढ़ते नहीं, विषय का अध्ययन नहीं करते, उसके बाबत स्कालर्स सी रिसर्च नहीं करते। सबसे बड़ी बात वे क्राफ्टमेनशिप के लिए परेशान नहीं हैं। लेखन और प्रस्तुति में अनोखापन नहीं लाना चाहते। ले दे कर परसाई या शरद जोशी के ज्यादा करीब रहते हैं। फिर अनुभव को बढ़ाने, फैलाने, सोचने विचारने के लिए उनके पास वक्त नहीं है। वे इस या उस पेशे में हैं। नौकरी और जमाने को देखते हुए वे इतने कैल्कुलेटिव, कन्जिस्टेन्ट और व्यवस्थित हो चुके हैं कि आवारगी, बेवकूफी, निकम्मेपन और उर्जस्वित लापरवाही का खतरा लेना नहीं चाहते। इससे प्रकृत, व्यापक और विस्फोटक मास्टरपीस हमारे सामने नहीं आ पाए। संक्षेप में कहूँ तो यह कि हमारे पास व्यंग्य कि जिरात में धाड़क्या, पारख्या और बरसूद्या तो हैं पर फिलहाल कोई मुखत्यार नहीं है।
कैलाश मंडलेकर : लेखन में वैचारिक प्रतिबद्धता को आप कैसे देखते हैं ?
अजातशत्रु : वैचारिक प्रतिबद्धता का सीधा आशय यह है कि तय करके, सिद्धांत बनाकर किसी विशेष दिशा में लिखना और स्वभाव तथा चेतना को भी उसी दिशा में मोडऩा। यह स्वयं विरोधाभास है। देखने में ऐसा लगता है कि कुछ लोग प्रतिबद्ध होते हैं और कुछ लोग प्रतिबद्ध नहीं होते। पर कुल मिलाकर प्रतिबद्ध होते हुए भी कोई प्रतिबद्ध नहीं होता क्योंकि सब कुछ पार से आता है। इस पार का आशय परमात्मा या कोई रहस्यमय स्त्रोत नहीं है बल्कि सीधे सीधे यह है कि उत्पत्ति के पहले कुछ नहीं होता जिसमें से उत्पत्ति होती है। अत: प्रतिबद्धता का नारा लगाना जीवन और उसकी स्वतंत्रता को नहीं समझना है। रवीन्द्रनाथ टैगोर प्रतिबद्ध कवि नहीं थे क्योंकि वे आदमी के दु:ख दर्द के बजाए बहार और बगीचों पर कविता लिखते थे, पर इसे नकारा नहीं जा सकता। क्योंकि जीवन की समग्रता में सब कुछ समग्रता को ही समर्पित हो जाता है, जहां से संतोष और मुक्ति का अहसास उपजता है। प्रतिबद्धता और अप्रतिबद्धता बाद की चीज है और उस अर्थ में कोई मायने नहीं रखती, क्योंकि अतीत की चर्चा व्यर्थ है। जहाँ तक मेरा अपना सवाल है मैंने कभी प्रतिबद्ध होकर नहीं लिखा और न ऐसे किसी मिथ में विश्वास करता हूँ। मेरा ख्याल है मैंने संवेदनशीलता के साथ लिखा, सुख, दु:ख संघर्ष के बारे में लिखा क्योंकि यही किया जा सकता था – सो यह मानवतावादी लेखन प्रतिबद्ध लग सकता है पर ऐसी कोई बात मेरे मन में नहीं थी। मेरी नजर में प्रतिबद्धता ढकोसला है क्योंकि जो लिख सकता है वह प्रतिबद्ध होता ही है। घटिया रचना हो सकती है पर बढिय़ा अप्रतिबद्ध रचना नहीं होती।
कैलाश मंडलेकर : आज संचार माध्यमों के कारण एक प्रकार का सांस्कृतिक संकट सा उपस्थित हो गया है। लेखक और समाज के बीच लगभग संवादहीनता की स्थिति जैसी है। ऐसे समय में एक जागरूक और समाजचेता लेखक को क्या करना चाहिए?
अजातशत्रु : मेरा आज भी विश्वास है कि छद्म लेखन और छद्म चीज ही पिटती है। जो स्वाभाविक है, सरल है, मन को छूता है और प्रकृति के करीब है वह आज भी पढा और चाहा जाता है। आचार्य रजनीश को देखिये। उनकी लोकप्रियता का कारण आध्यात्म से ज्यादा वह सरलता, सहजता और आत्मीयता थी जो उनके प्रवचनों में आती है। सच्चाई यह है कि पाठक आज भी पढऩे को तरस रहा है पर लेखक झूठा, दम्भी, फार्मूलापरस्त, शहरी और अस्वाभाविक हो गया है। वह स्मार्ट दिखने, इम्प्रेस करने, यूटोपिया बुद्धिवादी नजर आने और कोई नया करिश्मा करने के चक्कर में है सो आज का लेखन बांधता नहीं। लेखक को रोचक बनने के लिए जीवन जीने में भी सरल, बेतकल्लुफ मिलनसार, संवेदनशील और यारबाज होना पड़ेगा (कोई न हो तो अजातशत्रु जी का हुकुम नहीं है) तब जाकर वह तरलता और आत्मीयता आती है जो पाठक को खींचती है। भारतीय लेखन की फिलहाल यह खामी है कि वह गहरे में जाने की, भाषा तोडऩे की, फैंटेसी में छलांग लगाने की कोशिश नहीं करता क्योंकि डार्विन, मार्क्स और न्यूटन के चलते औसत भारतीय बुद्धिवादी ने मान लिया है कि अमूर्त पर सोचना, बहस करना तथा उस पर दिमाग और पन्ने जाया करना लौटकर बिटलना है। हम याद रखें औपनिषदक अमूर्तवाद पर लौटे बिना हम कोई मर्मस्पर्शी लेखन नहीं दे पायेंगे। कम से कम मुझ मूरख की यही आस्था है।
कैलाश मंडलेकर : आप फिल्म संगीत पर कॉलम लिख रहे हैं। जबकि यह खंडित आस्थाओं और व्यापक मूल्यहीनता का दौर है जहाँ धूर्त राजनीति निरंतर मनुष्य के कद को बौना करने की साजिश कर रही हो तथा सामाजिक अराजकता और धार्मिक कठमुल्लेपन में युग का सत्य लुप्त होते जा रहा हो वहाँ लेखक के दायित्व और लेखन की प्राथमिकता युगानुरूप नहीं होनी चाहिए?
अजातशत्रु : बड़े बड़े शब्द और कैचवर्ड्स चलाने से कुछ नहीं होगा। सच्चाई यह है कि जीवन की किसी भी समस्या का जवाब भाषा के भीतर नहीं है, अत: प्रतिबद्ध किस्म कमयुनिस्टिया लेखन भी कहीं नहीं पहुँच सकता। लिखने से ज्यादा मेरी रूचि खोज में है, उत्क्रमण में है, भाषा को फलांगने में है और आप देखेंगे कि गीतगंगा जैसे फिल्मी कॉलम में फिल्म और फिल्म संगीत से बाहर की उड़ान होती है जैसे आप अमूर्त को छू रहे हैं। अगर आप यह समझ रहे हैं कि भाषा सबसे बड़ा बंधन है तो गीत गंगा इस बर्फ को तोड़कर गला रही है। फिर एक बात और समझ लीजिये मिलिटेंट लेखन मैं करता हूँ और करता आया हूँ पर हर बार मेरी रूचि खोज में है क्योंकि निदान भाषा के भीतर है ही नहीं। मेरा सारा जीवन भाषा के खिलाफ संघर्ष है। काश आप इसे समझें।
कैलाश समस्या के हल से पहले यह पता होना चाहिए कि स्वयं समस्या क्या है और उसका मेकेनिज्म क्या है? हमने मान रखा है कि विचार की मदद से और इस तरह विचार जन्य निष्कर्षों की मदद से यथास्थिति बदल सकते हैं या मूलभूत क्रान्ति ला सकते हैं। पर यही हमारा भ्रम है। पहली बात, क्रान्ति का मतलब स्थूल, भौतिक, राजनीतिक क्रान्ति नहीं होता। क्योंकि इस प्रक्रिया में हम केवल व्यवस्था में बदलाव करते हैं और इससे ज्यादा कुछ नहीं करते। पर मूलभूत क्रान्ति अपनी सीमाओं को, अपने बौद्धिक साधनों की सीमाओं को, भाषा की जड़ता को, अतीतधर्मिता को समझने से आती है। यह भाषा के पार कर जाना है। तब जाकर हमें पता चलता है कि संसार अपनी प्रकृत अवस्था में जैसा है वैसा ही है और हम उसके मूल में कोई परिवर्तन नहीं कर सकते। हम मात्र अपनी धारणाओं और भाषा से मुक्त होते हैं। यही वह स्पष्टता या शून्यता है जहाँ से हम संघर्ष भी कर सकते हैं, समझौता भी कर सकते हैं, प्यार तथा नफरत भी कर सकते हैं पर जहां सब कुछ प्रेम से नि:सृत होता है और यह प्रेम कोई शब्द बद्ध चीज नहीं है। मेरी नजर में संसार, समाज, लोग, दायित्व और चुनाव जैसे शब्द कोई अर्थ नहीं रखते क्योंकि बाहर आप कितनी भी बड़ी भीड़ खड़ी कर लें, परमात्मा या जीवन या मूल तत्व की तरह आप अकेले हैं। और यह अकेलापन ही आपकी समस्त बाहरी गतिविधियों का स्त्रोत है। तो मैं मानता हूँ कि तथाकथित बुनियादि क्रान्ति अपने से शुरू होती है और इसमें आदमी पता लगाता है कि वह कहाँ चूक रहा है। संसार बंधन है या मेरा सोच बंधन है? क्योंकि संसार किसी भी भाषा से अप्रभावित अपनी जगह खड़ा है। अगर हम इतनी छानबीन नहीं करना चाहते हैं तो ठीक है न करें, साहित्य लिखा जाता रहेगा पसंद नापसंद किया जाता रहेगा, समीक्षाएं चलती रहेंगी और प्रश्न बने रहेंगे। ट्रांस्डेंस (उत्क्रमण) ही एकमेव उपाय है।

