राहुल भारत जोडऩे और नेता कांग्रेस तोडऩे में जुटे

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-प्रहलाद शर्मा

देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस का राज कभी पूरे हिंदुस्तान में हुआ करता था। लेकिन आज अंर्तकलह के चलते कांग्रेस किसी क्षेत्रीय दल की तरह सिमट कर रह गई है। अपने वजूद के लिए जद्दोजहद करती कांग्रेस में आज भी गणेश परिक्रमा करने वाले नेताओं का ही वजूद बना हुआ है। पार्टी के प्रति वफादारी करने वाले नेताओं की पार्टी में कोई पूछ परख नहीं होने के कारण ऐसे नेता अब पार्टी से अलविदा कहने में लगे हुए हैं। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पुत्रमोह और पार्टी में परिवारवाद के कारण कई वरिष्ठ नेता बगावती रुख अपनाते रहे हैं। कांग्रेस के वर्तमान हालातों पर पिछले दिनों एक बयान में उमर अब्दुल्ला ने कहा था कि जब कांग्रेस के नेता आपसी लड़ाई में व्यस्त हैं तो मुझे लगता है कि कांग्रेस से बीजेपी का मुकाबला करने की उम्मीद करना बेमानी होगा। उमर अब्दुल्ला की बात भी सही है कि जिस कांग्रेस का हाथ थाम कर उनके जैसे छोटे दल भाजपा का मुकाबला करने की रणनीति बना रहे, जब खुद कांग्रेस ही बिखराव की स्थिति में है तो वह क्या भाजपा का मुकाबला कर सकती हैं। सवाल यह भी है कि ऐसी डूबती नैया पर सवार होना कौन सी बुद्धिमत्ता हैं, जिसके खुद के नेता उसको छोडक़र भाग रहे हो। गौरतलब है कि वर्ष 2014 के बाद जब से देश को नरेंद्र मोदी का नेतृत्व मिला, तब से कांग्रेस पार्टी का ग्राफ लगातार नीचे जाता रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को असफल करने के लिए कांग्रेस और विपक्षी राजनीतिक दलों ने इस दौरान अनेक प्रयोग किए, लेकिन वह सभी जनता का दिल जीतने में नाकामयाब ही दिखाई दिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जितना विरोध किया जाता रहा, उससे कहीं अधिक जनता ने उन पर अपना भरोसा जताया। जिसके चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2019 में भी भाजपा और मजबूत होकर सत्ता में लौटी थी। लेकिन कांग्रेस जिन प्रदेशों में बची थी वहां से भी उसका सफाया होता चला गया। लोकसभा चुनाव दौरान मध्यप्रदेश में जहां खुद कांग्रेस सरकार में थी तब भी बमुश्किल छिंदवाड़ा सीट पर अपनी लाज बचा पाई थी। चूंकि यह सीट खुद कमलनाथ के कब्जे में थी और यहां से उनके पुत्र नकुलनाथ चुनाव लड़े थे। मुख्यमंत्री रहते हुए कमलनाथ अपने पुत्र को काफी कम अंतर से जीता कर मध्यप्रदेश में मात्र एक यही सीट हासिल कर पाए थे। लेकिन पार्टी की अंर्तकलह ने 15 वर्षों बाद बमुश्किल हाथ आई सत्ता भी 15 महीने में ही गंवा दी थी। हालात यह थे कि कांग्रेस जिस ज्योतिरादित्य सिंधिया का चेहरा दिखाकर विधानसभा चुनाव लड़ी थी उन्हें ही हाशिए पर लाते हुए सत्ता में विपक्ष की भूमिका बनाने पर मजबूर कर दिया।

जिसके चलते आखिरकार ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस को अलविदा कह दिया। यह शायद देश में पहला अवसर था कि किसी एक नेता के पक्ष में आकर कांग्रेस के २२ विधायकों ने सामूहिक रुप से पार्टी से इस्तीफा देकर अपने नेता की अगुवाई में भाजपा पर विश्वास जताया। मंत्री और विधायकी को त्यागने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित सभी विधायकों ने कमलनाथ से ज्यादा भाजपा के शिवराज सिंह चौहान और उनके विकास कार्यों पर भरोसा जताया था। कांग्रेस के तमाम आरोप प्रत्यारोपों के बावजूद कांग्रेस से बगावत करने वाले यह विधायक भाजपा के बैनर तले शिवराज सिंह की नीतियों के सहारे ही वापस निर्वाचित होकर आने में भी सफल हुए। लेकिन कांग्रेस के बिखराव का सिलसिला यही नहीं थमा बल्कि इसके बाद भी कांग्रेस के विधायकों का भाजपा में आना मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि देश में आज भी जारी है। जिसके चलते आज कांग्रेस पूरे देश में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा संकट खुद कांग्रेसी ही बने हुए हैं। परिवारवाद की राजनीति के चलते कांग्रेस के निष्ठावान नेता पार्टी छोडक़र या तो भाजपा का दामन थाम रहे हैं या खुद नया दल बनाकर कांग्रेस को चुनौती देते नजर आ रहे हैं। हाल ही में जम्मू-कश्मीर से कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने इस्तीफा देने के बाद खुद अपनी पार्टी का एलान कर दिया है। इससे पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा ने इस्तीफा दिया था। उसके बाद हिमाचल के रामलाल ठाकुर ने उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया। इन हालातों को देखते हुए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि आज कांग्रेस में रहकर कांग्रेस के नेता, पदाधिकारी और उनके कार्यकर्ता खुद को असुरक्षित समझ रहे हैं। कांग्रेस के इसी बिखराव के चलते कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा शुरू की है। अब राहुल गांधी इस यात्रा के माध्यम से किसको कितना जोड़ पाते हैं यह तो फिलहाल नहीं कहा जा सकता, लेकिन उनके जोडऩे के प्रयासों दौरान ही पार्टी तोडऩे के संकेत ज्यादा दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस की वर्तमान स्थिति को देखते हुए एक लोक कहावत ‘घर के डांडे से माथा फूटना’ याद आ गई। हाल ही में राजस्थान एपीसोड ने कांग्रेस के भारत जोड़ो अभियान की हवा निकालने का काम कर दिखाया। खुद को जादूगर कहने वाले और गांधी परिवार की गणेश परिक्रमा करते हुए राजस्थान में लंबे समय से कांग्रेस का चेहरा बने अशोक गहलोत ने ही कांग्रेस को हंसी का पात्र बना दिया। वर्षों से गांधी परिवार से हटकर राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की मांग करते जहां अनेक पुराने कांग्रेसी नेता पार्टी को अलविदा कह गए, वहीं वर्तमान में होने जा रहे पार्टी अध्यक्ष चुनाव में अशोक गहलोत खुद प्रबल दावेदार बनकर उभरे हैं।

लेकिन इससे पहले मुख्यमंत्री पद को लेकर श्री गहलोत ने राजस्थान में ऐसा जादू दिखाया कि अपना सर्वाधिक विश्वासपात्र मानने वाले सोनिया और राहुल गांधी भी हैरत में पड़ गए। वैसे तो अशोक गहलोत ने पार्टी नेतृत्व से माफी मांग ली है, परंतु ऐसे नाजुक समय में राजस्थान का यह ड्रामा कांग्रेस नेतृत्व को रास नहीं आया। राहुल गांधी की भारत जोड़ों यात्रा के चलते राजस्थान का यह एपीसोड एकलौता ही नहीं है जिसमें उनके प्रयासों को ठेस पहुंचाई हो, बल्कि इससे पहले केरल में भी यात्रा प्रारंभ होने के साथ ही विवाद शुरु हो गया था। वह भी अभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। वहीं तमिलनाडु में विवादित पादरी जार्ज पौनईया से हुई राहुल गांधी की मुलाकात ने भी जहां भाजपा को हमलावर होने का मौका दिया, वहीं कांग्रेस को बेकफुट पर ला खड़ा किया। यात्रा को लेकर भी कांग्रेस दो धड़ों में बटी नजर आती है।

ऐसी स्थिति में राहुल गांधी की यह यात्रा कांग्रेस को मजबूती प्रदान करने में कितनी कारगर साबित होगी इसका स्वत: ही अंदाजा लगाया जा सकता है। कैसी विड़म्बना है कि कभी लोकसभा में भारी बहुमत के साथ काबिज रहने वाली कांग्रेस के आज महज ५२ सांसद शेष रह गए है, जिसके चलते वह दमदार विपक्ष भी नहीं बन पाई। इन हालातों में आगामी वर्ष होने वाले चार प्रदेशों के विधानसभा चुनाव दौरान कितना दम भर पाएगी यह कह पाना मुश्किल है। फिलहाल तो कांग्रेस की हालत को देखते हुए दुष्यंत कुमार का एक शेर याद आता है कि ‘तुम्हारे पांव के नीचे कोई जमीन नहीं, कमाल यह है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं।’

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