-हरदा में सामने आया मामला : गलत भू-अभिलेख में दर्ज नाम के आधार पर रजिस्ट्री की आशंका, वर्षों से कब्जे का दावा
अनोखा तीर, हरदा। मध्यप्रदेश में 17 सितंबर से शुरू हो रही स्वामित्व अधिकार अभिलेख निष्पादन एवं पंजीयन योजना-2026 के तहत ग्रामीण आबादी क्षेत्रों के अधिकार अभिलेखों के नि:शुल्क पंजीयन की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही इसके क्रियान्वयन को लेकर सवाल भी सामने आने लगे हैं। पायलट प्रोजेक्ट के रूप में स्वामित्व योजना का कार्य देख चुके हरदा जिले में अब एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें आबादी भूमि के भूखंड को लेकर आपसी विवाद और भू-अभिलेख में दर्ज नाम को लेकर आपत्ति जताई गई है। ग्राम बाजनिया निवासी एक आवेदक ने तहसीलदार/रजिस्ट्रार को दिए आवेदन में आरोप लगाया है कि उसके लंबे समय से आधिपत्य एवं कब्जे वाले आबादी भूखंड का स्वामित्व अभिलेख तैयार करते समय गलत व्यक्ति का नाम दर्ज हो गया। आवेदन के अनुसार संबंधित भूखंड पर आवेदक के वर्षों पुराने कब्जे का दावा है तथा ड्रोन सर्वे के दौरान गलत प्रविष्टि दर्ज होने की बात कही गई है। आवेदन में यह भी बताया गया है कि संबंधित भूखंड को लेकर पूर्व में राजस्व अधिकारियों के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया जा चुका है और मामला राजस्व प्रकरण के रूप में भी दर्ज रहा है। आवेदक का कहना है कि जब भूखंड पर स्वामित्व एवं कब्जे को लेकर विवाद लंबित है और अभिलेख में दर्ज नाम पर ही आपत्ति है, तो उसी आधार पर स्वामित्व योजना के तहत रजिस्ट्री कराए जाने से भविष्य में विवाद और बढ़ सकता है। आवेदन में प्रशासन से मांग की गई है कि विवादित भूखंड के संबंध में पहले रिकॉर्ड एवं वास्तविक स्थिति का परीक्षण किया जाए और उसके बाद ही पंजीयन की कार्रवाई की जाए।
पटवारी संघ भी उठा चुका है यही सवाल
इधर प्रदेश के विभिन्न जिलों में पटवारी संघ द्वारा भी स्वामित्व योजना में पटवारी को निष्पादन अधिकारी बनाए जाने पर आपत्ति दर्ज कराई जा रही है। पटवारियों का तर्क है कि ड्रोन सर्वे, नक्शे और आबादी अधिकार अभिलेखों में यदि किसी प्रकार की त्रुटि रह गई है और किसी दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज हो गया है, तो उसके आधार पर तैयार होने वाले दस्तावेज पर पटवारी के ई-साइन और निष्पादन की जिम्मेदारी तय करना भविष्य में कानूनी परेशानी का कारण बन सकता है। ग्वालियर सहित कई जिलों में पटवारी संघ ने इस संबंध में शासन को ज्ञापन भी दिए हैं। हरदा में भी पटवारियों की आपत्ति का प्रमुख आधार यही है कि जिस संपत्ति के वास्तविक स्वामित्व, कब्जे अथवा अभिलेख को लेकर विवाद हो, उसमें निष्पादन की जिम्मेदारी मैदानी कर्मचारी पर डालने से भविष्य में व्यक्तिगत जवाबदेही का प्रश्न खड़ा हो सकता है।
धारा 32, 32-ए और 33 को लेकर भी चर्चा
कानूनी रूप से देखें तो रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 की धारा 32 दस्तावेज को पंजीयन कार्यालय में प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति की श्रेणियां निर्धारित करती है—दस्तावेज का निष्पादन करने वाला/उसके तहत दावा करने वाला व्यक्ति, उसका प्रतिनिधि या अधिकृत पावर ऑफ अटॉर्नी वाला एजेंट। धारा 32ए अचल संपत्ति के हस्तांतरण संबंधी दस्तावेज में खरीदार और विक्रेता के फोटो एवं फिंगरप्रिंट से संबंधित है, जबकि धारा 33 मान्य पावर ऑफ अटॉर्नी की व्यवस्था बताती है। इसलिए सामान्य निजी संपत्ति के विक्रय विलेख और सरकार द्वारा विशेष योजना के तहत तैयार किए जा रहे डीड ऑफ कन्वेयंस को एक ही कानूनी स्थिति मानना उचित नहीं होगा। मध्यप्रदेश सरकार ने 2026 की विशेष योजना के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था बनाते हुए पटवारी को निष्पादन अधिकारी तथा तहसीलदार, नायब तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक आदि को पंजीयन अधिकारी की जिम्मेदारी दी है। यही वजह है कि अब मूल सवाल यह बन गया है कि विशेष योजना के तहत पटवारी को दी गई निष्पादन की शक्ति की सीमा क्या है, विवादित अथवा त्रुटिपूर्ण अधिकार अभिलेखों के मामलों में क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी और भविष्य में ऐसी रजिस्ट्री से उत्पन्न विवाद की जिम्मेदारी किसकी होगी?
रिकॉर्ड में गलती हुई तो पहले सुधार जरूरी
मध्यप्रदेश में स्वामित्व योजना के तहत आबादी भूमि का सर्वे कर अधिकार अभिलेख तैयार करने की कार्रवाई राजस्व विभाग द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत की गई है। शासन के पुराने निर्देशों में भी स्वामित्व योजना के अंतर्गत अधिकार अभिलेख तैयार करने की प्रक्रिया का आधार मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता की संबंधित धाराओं को बताया गया है। वहीं विधानसभा में भी सरकार की ओर से यह जानकारी दी जा चुकी है कि स्वामित्व योजना के तहत आबादी भूमि का सर्वे कर संपत्ति धारकों के अधिकार अभिलेख तैयार किए जाते हैं। ऐसे में हरदा में सामने आया विवाद प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा बन गया है। यदि किसी भूखंड पर पहले से कब्जा, खरीद, उत्तराधिकार या स्वामित्व को लेकर विवाद है और रिकॉर्ड में किसी दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज हो गया है, तो रजिस्ट्री से पहले रिकॉर्ड की शुद्धता और विवाद की स्थिति स्पष्ट करना आवश्यक होगा, ताकि स्वामित्व देने के उद्देश्य से शुरू की गई योजना भविष्य में नए विवादों का कारण न बने। अब निगाह इस बात पर है कि हरदा प्रशासन इस मामले में विवादित भूखंड की वास्तविक स्थिति, पुराने राजस्व रिकॉर्ड, कब्जे और स्वामित्व संबंधी दस्तावेजों की जांच कर क्या निर्णय लेता है और शासन द्वारा पटवारियों की आपत्तियों तथा उनकी कानूनी जिम्मेदारी को लेकर क्या स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं।
स्वामित्व रजिस्ट्री पर विवाद सामने आने लगे, पटवारी को निष्पादन अधिकारी बनाने पर उठे सवाल

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