अनोखा तीर हरदा। स्वावलंबन, आत्मनिर्भर भारत तथा सामाजिक विकास की दिशा में युवाओं को प्रेरित करने और समाज में वरिष्ठ नागरिकों की सकारात्मक भूमिका को रेखांकित करने के उद्देश्य से हैप्पी हरदा के तत्वावधान में किसान भवन में उद्यमिता एवं समाज में वरिष्ठ नागरिकों की भूमिका विषय पर वृहद संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में स्वर्णिम भारत फाउंडेशन के चेयरपर्सन एवं पंजाब नेशनल बैंक के पूर्व जनरल मैनेजर सतीश चावला ने उद्यमिता, स्वावलंबन और युवाओं के लिए उपलब्ध अवसरों पर मार्गदर्शन दिया। संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि युवाओं के सामने रोजगार की बढ़ती चुनौती का स्थायी समाधान केवल नौकरी तक सीमित न रहकर स्वरोजगार, उद्यमिता, नवाचार और कौशल विकास की दिशा में आगे बढ़ने में है। युवा अपने आत्मविश्वास, प्रतिभा और स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर स्वयं के लिए रोजगार के अवसर
अनोखा तीर, हरदा। लो फिर शुरु हो गया मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान और उसकी कागजी खानापूर्ति का सिलसिला। क्या वास्तव में यह अभियान जनविश्वास अर्जित करने का कार्य कर रहा है? शासन का आदेश है और इस आदेश के परिपालन में कलेक्टर के निर्देश है तो शिविर लगाना अधिनस्थों की मजबूरी भर है। वास्तव में तो ना इससे पहले के ऐसे अभियानों में आम लोगों की समस्याओं का समाधान हुआ और ना ही प्रति सप्ताह लगने वाली जनसुनवाई में कोई सुनवाई होती है। आज फिर कलेक्टर ने निर्देश दिए कि १८ सितम्बर को जिले के रहटाखुर्द, रन्हाईकला, भाटपरेटिया, कुकरावत, कनारदा, दुरगाड़ा, सुखरास, खामापड़वा, कड़ोलाउबारी, पलासनेर, केलनपुर, बीड़, मसनगांव व कांकरिया के ग्रामीणों की समस्या हेतु मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान के तहत शिविर का आयोजन किया जाएगा। कलेक्टर सिद्धार्थ जैन ने अधिकारियों को निर्देशित भी किया है कि अभियान को पूरी गंभीरता से संवेदनशीलता एवं जनहित की भावना के साथ संचालित करें। सरकारी प्रवक्ता द्वारा बकायदा कलेक्टर के इन निर्देशों को लेकर प्रेस नोट जारी किया गया है। करना भी चाहिए। लेकिन क्या वास्तव में स्वयं कलेक्टर साहब जनहित की भावनाओं को, समस्याओं को गंभीरता और संवेदनशीलता से निराकृत करने का प्रयास करते है? जब लगभग चार महीने पहले हरदा से महज ढाई किलोमीटर दूर स्थित ग्राम रूपीपरेटिया में मुक्तिधाम की समस्या को लेकर सीधे कलेक्टर साहब से ग्रामीणों की गुहार लगाई गई थी, यहां तक की व्यक्तिगत निवेदन भी किया गया था, लेकिन वह समस्या आज भी जस की तस है। गांव में शासकीय भूमि उपलब्ध है। मुक्तिधाम निर्माण के लिए महज भूमि चिन्हित करना है और यह कार्य स्वयं कलेक्टर के सीधे अधीनस्थ आने वाले राजस्व विभाग का ही कार्य है। इसके लिए शासन स्तर से कोई कागजी स्वीकृति या बजट आवंटन की आवश्यकता भी नहीं थी। फिर भी ग्रामीणों की इस मार्मिक गुहार को नहीं सुना गया। यह महज हांडी के एक चावल टटोलने जैसी बात है। जिस काम के लिए कुछ खर्च भी नहीं करना था और किसी से अनुमति भी नहीं लेना था। जब ऐसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता तो भला सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऐसे शिविरों में लोगों की कितनी सुनवाई होती होगी और कितना उनकी समस्याओं का समाधान। वास्तविकता यही है कि ऐसे तमाम शिविर और जनसुनवाई महज कागजी खानापूर्ति भर होती है, इसका आम जनता की समस्याओं के समाधान से कोई सरोकार नहीं होता। अगर वास्तव में समस्याएं निराकृत की जाती तो किसी मंत्री संत्री के आने पर हाथों में आवेदन लेकर याचक की तरह खड़े रहने वाले लोगों की लंबी कतारें नहीं होती। हर सप्ताह लगने वाली जनसुनवाईयों में इतने लोग अपनी समस्याएं लेकर नहीं आते। एक छोटा सा जिला जो कभी होशंगाबाद जिले का मात्र एक अनुविभाग भर था, जिसमें कभी मात्र एक एसडीएम हुआ करता था आज यहां अधिकारियों की फौज तैनात है। एक एसडीएम के स्थान पर तीन एसडीएम, कलेक्टर, अपर कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर और न जाने कितने अधिकारी लोगों की समस्याओं के समाधान में जुटे है। इसके बाद भी समस्याएं सुरसा के मुंह की तरह फैलती ही जा रही है। साहब यह समस्याएं है या रक्तबीज जैसा राक्षस जो एक हल करो तो चार खड़ी हो जाती है। श्रीमान सही मायने में देखा जाए तो इनके समाधान का प्रयास ही नहीं किया जाता। समस्याएं केवल वह निराकृत होती है जिसके आवेदन के साथ गांधीजी विराजमान होते है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को शायद इस बात का अहसास नहीं है कि उनके आदेश निर्देश का पालन उनका प्रशासन तंत्र तभी करता है जब मोहन यादव का चेहरा नहीं बल्कि मोहनदास करमचंद गांधी का चेहरा अधिकारियों को दिखाई दें। इसलिए श्रीमान हम तो कुछ कहते भी नहीं, चूंकि कहने पर तूफान उठा लेती है दुनिया अब इस पर कयामत है कि हम कुछ कहते नहीं।
उद्यमिता एवं समाज में वरिष्ठ नागरिकों की सकारात्मक भूमिका पर संगोष्ठी

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