-झापल से नर्मदा संगम तक का सफर समेटे है धार्मिक, ऐतिहासिक और आर्थिक महत्व
सादिक खान मंसूरी, रहटगांव। बैतूल जिले के झापल क्षेत्र से उद्गमित होकर हरदा जिले के वनांचल और अनेक गांवों से गुजरने वाली गंजाल नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि हजारों ग्रामीणों के जीवन, आस्था और आजीविका का आधार है। चट्टानों का सीना चीरते हुए घने जंगलों के बीच कल-कल बहने वाली यह नदी अपने साथ प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक धरोहरों और धार्मिक मान्यताओं की समृद्ध विरासत लेकर आगे बढ़ती है। अंतत: गंजाल नदी नर्मदा में समाहित होकर अपना सफर पूरा करती है।
सात नदियों का मायका है झापल
बताया जाता है कि गंजाल नदी का उद्गम बैतूल जिले के झापल से होता है। झापल को क्षेत्र में सात नदियों का मायका कहा जाता है। उद्गम स्थल से निकलकर गंजाल नदी सूर्योदय से सूर्यास्त की दिशा में बहती हुई वनांचल के विभिन्न क्षेत्रों को जीवन प्रदान करती है। इसके जल से अनेक गांवों में खेती होती है और बड़ी संख्या में किसान अपनी आजीविका चलाते हैं।
काजल में पांडवकालीन शिवलिंग का करती है अभिषेक
नगर के सुप्रसिद्ध कथावाचक पंडित नीरज महाराज के अनुसार, वनांचल में कथा प्रवास के दौरान आदिवासी समाज के वरिष्ठ ग्रामीणों से गंजाल नदी से जुड़ी अनेक धार्मिक मान्यताओं का उल्लेख सुनने को मिलता है। ग्रामीणों के अनुसार, गंजाल नदी झापल से बहती हुई काजल क्षेत्र में पहुंचती है, जहां नदी में स्थित पांडवकालीन शिवलिंग का अभिषेक करती है। इसके बाद गंजाल आगे बढ़कर काजलेश्वर महादेव के समीप काजल नदी से संगम करती है। इस संगम स्थल को अत्यंत पवित्र माना जाता है। प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां मेला लगता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु और आदिवासी समाज के लोग यहां पहुंचकर स्नान, पूजन और दर्शन करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस संगम का विशेष पौराणिक महत्व है।
राजा बरारी से महागांव तक ऐतिहासिक धरोहरें
काजल संगम के बाद गंजाल नदी आगे बढ़ते हुए राजा बरारी स्टेट के समीप से गुजरती है। राजा बरारी को वनांचल के व्यवस्थित गांवों में गिना जाता है, जहां राधा स्वामी संस्था द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क जैसी सुविधाओं के विकास में योगदान दिया गया है। इसके बाद नदी महागांव पहुंचती है। यहां गंजाल नदी के किनारे अर्जुन के तीर से जुड़े बताए जाने वाले पत्थर मौजूद हैं, जिन्हें स्थानीय लोग भील और भीलनी के नाम से जानते हैं। नदी के दूसरे किनारे राजा चोवा का किला भी क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है। ये स्थल गंजाल नदी के प्रवाह को स्थानीय इतिहास और लोककथाओं से जोड़ते हैं।
हाथी कुंड और गंजाल डेम परियोजना
महागांव से आगे गंजाल नदी महुखाल और बोथी गांव के बीच से गुजरती है। यहां नदी में लगभग 50 फीट गहराई वाला एक स्थान है, जिसे ग्रामीण हाथी कुंड के नाम से जानते हैं। स्थानीय मान्यता है कि पुराने समय में यहां हाथियों के झुंड स्नान किया करते थे। इसके बाद गंजाल नदी पत्थरों के बीच से बहती हुई जवारधा पहुंचती है। इसी क्षेत्र में प्रस्तावित गंजाल डेम परियोजना का निर्माण होना है। यह परियोजना क्षेत्र के किसानों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। परियोजना के पूर्ण होने पर हरदा सहित आसपास के जिलों के किसानों को सिंचाई सुविधा मिलने की उम्मीद है। इससे कृषि क्षेत्र को बढ़ावा मिलने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है।
आल्हा ओखली का देव कुंड आस्था का केंद्र
जवारधा से आगे बढ़ते हुए गंजाल नदी टेमागांव के समीप प्रसिद्ध देवस्थल आल्हा ओखली पहुंचती है। यहां नदी के किनारे भगवान शिव का मंदिर स्थित है। इसी क्षेत्र में एक देव कुंड भी है, जिसे लेकर ग्रामीणों में कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस कुंड में स्नान करने से चर्म रोग जैसी समस्याओं से मुक्ति मिलने की मान्यता है। अमावस्या और सावन माह में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। ग्रामीण बताते हैं कि कुंड की गहराई इतनी अधिक है कि खटिया बुनने में उपयोग आने वाली पूरी रस्सी भी इसमें डूब जाती है। हालांकि, इन मान्यताओं का आधार स्थानीय आस्था और परंपरा है।
छिदगांव मेल में मोरण नदी से संगम
आल्हा ओखली से आगे गंजाल नदी छिदगांव पहुंचती है, जहां मोरण नदी का इसमें संगम होता है। इसी कारण इस स्थान को छिदगांव मेल के नाम से भी जाना जाता है। यह क्षेत्र दो जिलों की सीमा के निकट स्थित होने के कारण भी महत्वपूर्ण है। गंजाल और मोरण नदी के किनारे बसे गांवों में खेती-बाड़ी और सब्जी उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जाता है। नदी के तट और रेत में उगने वाले तरबूज तथा देशी ककड़ी अपनी गुणवत्ता और स्वाद के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं। यहां उत्पादित तरबूज आसपास के क्षेत्रों के साथ अन्य स्थानों तक भी पहुंचते हैं।
रेत, मछली और खेती से ग्रामीणों को आर्थिक संबल
गंजाल और मोरण नदी से प्राप्त रेत का उपयोग मकान निर्माण में किया जाता है। इससे जुड़े कार्यों से स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलता है और खनिज विभाग को भी राजस्व प्राप्त होता है। वहीं, नदी में पाई जाने वाली मछलियों से मछुआरा समुदाय के अनेक परिवारों की आजीविका चलती है। इस प्रकार गंजाल नदी का महत्व केवल सिंचाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कृषि, मत्स्य पालन, रेत आधारित रोजगार और स्थानीय व्यापार के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
गोंदागांव गंगेश्वरी में नर्मदा से मिलती है गंजाल
राष्ट्रीय राजमार्ग और रेलवे पुल के नीचे से गुजरती है। इसके बाद गंजाल और मोरण की संयुक्त जलधारा गोंदागांव पहुंचती है, जहां गोमती और नर्मदा नदी के साथ संगम होता है। इस स्थान को गोंदागांव गंगेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है। गोंदागांव गंगेश्वरी संगम क्षेत्र का धार्मिक महत्व स्थानीय लोगों के बीच विशेष रूप से माना जाता है। यहां स्नान और पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालु पहुंचते हैं। स्थानीय मान्यताओं में इस संगम को मोक्षदायी बताया गया है। गंजाल नदी का नर्मदा में विलय उसके लंबे सफर का अंतिम पड़ाव है, जहां वह अपनी जलधारा को मां नर्मदा को समर्पित कर देती है।
गंजाल के तट पर मिलते हैं शजर जैसे प्राकृतिक पत्थर
गोंदागांव के आसपास गंजाल नदी के क्षेत्र में विशेष प्रकार के चिकने, रंगीन और आकृतियों वाले पत्थर भी पाए जाते हैं। स्थानीय लोग इनमें से कुछ पत्थरों को शजर पत्थर के नाम से पहचानते हैं। प्राकृतिक रूप से बने इन पत्थरों पर विभिन्न आकृतियां और रंग दिखाई देते हैं, जिन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने स्वयं इन पर चित्रकारी की हो। हालांकि, नदी में मिलने वाले सभी ऐसे पत्थरों को शजर पत्थर कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा। कुछ पत्थर नर्मदेश्वर या अकीक जैसे प्राकृतिक पत्थरों की श्रेणी में भी हो सकते हैं। इनकी वास्तविक पहचान विशेषज्ञ जांच के बाद ही सुनिश्चित की जा सकती है।
संरक्षण और संवर्धन की जरूरत
गंजाल नदी वनांचल सहित अनेक गांवों के लिए जीवनदायिनी है। इसके जल से खेतों को सिंचाई, ग्रामीणों को रोजगार, श्रद्धालुओं को आस्था का केंद्र और क्षेत्र को ऐतिहासिक पहचान मिलती है। ऐसे में नदी के संरक्षण, जल प्रवाह को बनाए रखने, अवैध उत्खनन पर नियंत्रण और तटों की स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जाना आवश्यक है। गंजाल नदी केवल एक नदी नहीं, बल्कि हरदा अंचल की प्राकृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक और आर्थिक विरासत है, जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना सामूहिक जिम्मेदारी है।
वनांचल सहित अनेक गांवों की जीवनदायिनी है गंजाल नदी

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