दिनेश निगम ‘त्यागी
फिर ताजा हो गया कर्नल सोफिया के अपमान का मामला….
लगभग 15 माह पहले प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री और आदिवासी नेता विजय शाह की एक टिप्पणी से कर्नल सोफिया कुरैशी और सेना के कथित अपमान का मामला फिर ताजा हो गया। वजह है प्रदेश के पूरे मंत्रिमंडल का शाह के समर्थन में खड़ा होगा और सुप्रीम कोर्ट की मंशा के विपरीत एसआईटी को अभियोजन की स्वीकृति देने से इंकार कर देना। भाजपा कई अवसरों पर विपक्ष को राष्ट्रद्रोही और खुद को सबसे बड़ा राष्ट्रभक्त सिद्ध करती है। बावजूद इसके सेना के अपमान के मुद्दे पर वह सेना की बजाय अपने मंत्री के साथ खड़ी नजर आई। वह राजनीतिक नफा-नुकसान का आंकलन कर रही है। उसे आशंका है कि शाह के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति देने से आदिवासी वोटों का नुकसान हो सकता है। तर्क है कि शाह अपने बयान के लिए तीन बार बिना शर्त सार्वजिनक माफी मांग चुके हैं। यह पश्चाताप पर्याप्त है। इधर पूर्व सैनिकों ने केबिनेट के निर्णय को पूरी सेना का अपमान बताया है और विरोध करने का निर्णय लिया है। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने राष्ट्रपति और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने राज्यपाल को पत्र लिख कर मंत्री को बर्खास्त कर अभियोजन की स्वीकृति देने का आग्रह किया है। पटवारी और सिंघार का कहना है कि निर्णय से भाजपा की नकली राष्ट्रभक्ति की पोल खुल गई है। अब गेंद सुप्रीम कोर्ट और राज्यपाल के पाले में है।
राखी पर शुरू नहीं हो सकी सीएम की सरकारी बस सेवा….!
रक्षाबंधन का पावन पर्व निकल गया लेकिन मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा का संचालन प्रारंभ नहीं हो सका। इस सरकारी बस सेवा की याद दो कारणों से ज्यादा आई। पहला यही कि खबर थी कि यह सेवा रक्षाबंधन से शुरू होगी। भाई-बहन के रिश्तों से जुड़े इस पावन पर्व पर लोग परिवहन सेवा का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण अन्य पर्वों की तरह निजी बस मालिक यात्रियों की भीड़ का बेजा फायदा उठाते हैं। किराया चार से पांच गुना तक वसूलते हैं। लोग यह देने के लिए मजबूर होते हैं। इस कारण भी लोगों को सरकारी बस सेवा का इंतजार था। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव इस सेवा को प्रारंभ करने में खास रुचि ले रहे हैं। निजी बस संचालक बसें बड़े शहरों तक तो चलाते हैं लेकिन छोटे कस्बों-ग्रामीण क्षेत्रों में ये नहीं पहुंचतीं। मुख्यमंत्री ने लोगों की इस परेशानी को समझा और मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा प्रारंभ करने का निर्णय लिया। पूरे राज्य को 7 परिवहन क्षेत्रों इंदौर, उज्जैन, भोपाल, जबलपुर, सागर, ग्वालियर और रीवा में बांटा गया है। सबसे पहले इसकी शुरुआत इंदौर क्षेत्र से 150 इलेक्ट्रिक बसों के साथ करने का निर्णय हुआ। कहा गया कि पहले चरण की शुरुआत रक्षाबंधन से हो जाएगी, लेकिन मुख्यमंत्री की यह लोकप्रिय परिवहन सेवा प्रारंभ नहीं हो सकी। इसका अब तक इंतजार ही हो रहा है।
धार्मिक भावनाएं उकसाने में दिग्विजय को आता है मजा….!
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह खुद को सनातनी कहते हैं। आखिर, वे शंकराचार्य के दीक्षित शिष्य हैं। बावजूद इसके यह किसी की समझ नहीं आया कि उन्हें लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत करने में मजा क्यों आता है? कई बार तो वे जरूरी न हो तो भी बिना संदर्भ के अनावश्यक टिप्पणी कर धार्मिक संगठनों को छेड़ देते हैं। ताजा मामला ही ले लीजिए, वे चयनित शिक्षकों का समर्थन करने धरने पर पहुंचे। दिग्विजय को उनकी मांगों से संबंधित बात करनी चाहिए लेकिन वे कांवड़ यात्रियों पर बेवजह की उकसाने वाली टिप्पणी कर बैठे। सावन का महीना चल रहा है। भगवान शिव के भक्त जगह जगह कांवड़ यात्रा निकाल रहे हैं। इन यात्राओं में कुछ उपद्रवी शामिल हो सकते हैं लेकिन अधिकांश भक्ति भाव से कांवड़ यात्रा निकालते हैं। दिग्विजय ने कहा कि युवाओं को कांवड़ यात्रा में शामिल किया जा रहा है, लेकिन उन्हें रोजगार या नौकरियां प्रदान नहीं की जा रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कांवड़ यात्रा के दौरान क्या-क्या होता है, इस पर बोलने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि भाजपा चाहती है कि कांवड़ जैसी यात्राओं में शामिल होकर युवा गंवार बने रहें और रोजगार की बात न करें। बस क्या था हिंदू संगठन भड़क गए। प्रदेश पीडब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह और विधायक रामेश्वर शर्मा ने भी बयान की तीखी आलोचना की।
महंगी शक्कर पर यह क्या बोल गए भाजपा के दिग्गज….?
आसमान छूती शक्कर की कीमतों ने त्यौहारों की मिठास तो फीकी की ही है, भाजपा सरकार और नेताओं की भी नींद उड़ा रखी है। भाजपा के दिग्गजों को सूझ नहीं रहा कि क्या जवाब दें। नतीजा यह कि कोई बिना जवाब दिए मैदान छोड़ रहा है तो कोई अजीबोगरीब जवाब दे रहा है। भाजपा के दो बड़े नेताओं केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का इस मसले पर रुख गौर करने लायक है। शिवराज से पत्रकारों ने सवाल किया कि त्योहार के सीजन में मिठास कम हो गई है। चीनी महंगी हो गई है, तो वे अपनी कुर्सी से उठ गए और बोले कि ‘सब इंतजाम हो रहा है जी, चिंता मत करो।Ó उन्होंने यह नहीं बताया कि आखिर कौन से इंतजाम हो रहे हैं और महंगी शक्कर के दाम कम करने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है। कैलाश ने तो हद ही कर दी। उन्होंने इंदौर में शक्कर की बढ़ती कीमतों को लेकर सवाल पूछे जाने पर कहा कि कीमत कल-परसों 70 रुपए थी, आज 60 रुपए है। आगे और कम हो जाएगी। उन्होंने कहा कि आजकल करीब 90 प्रतिशत लोग मीठा खाना पसंद नहीं करते। अपने उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वे खुद मीठा नहीं खाते। मजाकिया अंदाज में उन्होंने कहा कि वे तो चाहते हैं कि शक्कर खूब महंगी हो जाए। प्रदेश सरकार के एक अन्य मंत्री राकेश सिंह ने कहा कि शक्कर छोड़ों, वंदेमातरम पर बात करो।
जो मीणा ने किया, वह जायसवाल भी कर सकते थे….!
-इसके लिए तो करनी होगी छतरपुर कलेक्टर की तारीफ….
केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावितों की समस्या का समाधान होता दिख रहा है। छतरपुर के नए कलेक्टर मृणाल मीणा के प्रयास सफल होते दिखाई पड़ रहे हैं। छतरपुर, पन्ना जिले के इन प्रभावित आदिवासियों ने मुआवजे को लेकर अमित भटनागर के नेतृत्व में लंबी लड़ाई लड़ी। चिताएं सजा कर उनमें लंबे समय तक लेटे। जल सत्याग्रह किया और खुद अमित ने लंबा आमरण अनशन किया। इस आंदोलन की गूंज भोपाल और दिल्ली तक पहुंची। इधर जिला प्रशासन आंदोलन को कुचलने पर आमादा हो गया। जबरन उन्हें खदेड़ा गया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से आंदोलनकारियों ने दो बार दिल्ली में मुलाकात की। राहुल ने उनकी लड़ाई लड़ने का भरोसा दिलाया। इधर मामले के ज्यादा तूल पकड़ता देख मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने अफसरों को गांव जाकर प्रभावितों से बात करने के निर्देश दिए। इसके बाद ग्राम ढोढ़न में छतरपुर के कलेक्टर मृणाल मीना कुर्सी-टेबल छोड़कर विस्थापितों के बीच जमीन पर बैठे और तीन घंटे तक जनसुनवाई की। नतीजा, जो पेचीदगी तीन महीने से नहीं सुलझ रही थी, वह तीन मिनट में सुलझ गई। एक ही दिन में 30 लंबित प्रकरणों का निस्तारण हो गया। यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति का परिणाम है। सवाल है कि जो मृणाल मीणा ने किया, क्या पहले के कलेक्टर जायसवाल नहीं कर सकते थे?
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