ज्ञात-अज्ञात बलिदानियों और वीरांगनाओं को समर्पित रही राष्ट्र वंदना गोष्ठी

अनोखा तीर, भोपाल।  अखिल भारतीय साहित्य परिषद, भोपाल इकाई के तत्वावधान में आयोजित राष्ट्र वंदना गोष्ठी ज्ञात-अज्ञात बलिदानियों एवं वीरांगनाओं को समर्पित रही। देशभक्ति के रंग, वंदे मातरम् के संग विषय पर आयोजित यह गोष्ठी विश्व संवाद केंद्र में संपन्न हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता परिषद के वरिष्ठ सदस्य एवं वरिष्ठ साहित्यकार रमेश व्यास शास्त्री ने की। मुख्य अतिथि के रूप में हिंदी लेखिका संघ की पूर्व अध्यक्ष डॉ. कुमकुम गुप्ता उपस्थित रहीं। कार्यक्रम की स्वागताध्यक्ष एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद, भोपाल इकाई की अध्यक्ष तथा मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ. नुसरत मेहदी ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत किया। परिषद की महामंत्री सुनीता यादव ने बीज वक्तव्य दिया। कार्यक्रम का सफल संचालन युवा कवि दिनेश गुप्ता मकरंद ने किया। कुमारी रोमषा तिलेट ने सरस्वती वंदना, श्रद्धा यादव ने परिषद गीत तथा डॉ. प्रतिभा द्विवेदी वेदी ने संपूर्ण वंदे मातरम् का गायन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के अंत में परिषद के युवा कवि राजेश विश्वकर्मा ने आभार व्यक्त किया।
साहित्य समाज की दशा और दिशा तय करता है : रमेश व्यास शास्त्री
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में रमेश व्यास शास्त्री ने कहा कि समाज को संस्कारों का अर्घ्य देने का काम साहित्यकारों का है, क्योंकि साहित्य ही समाज की दशा और दिशा तय करता है। उन्होंने अपनी कविता की पंक्तियाँ तुममें साहस हो या न हो, मैं तो साहस कर दिखलाऊँ, कड़वा सच मैं बतलाऊँ प्रस्तुत कर साहित्यकार की सामाजिक जिम्मेदारी और साहस को रेखांकित किया।
वंदे मातरम राष्ट्रीय आत्मबोध और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक : डॉ. नुसरत मेहदी
स्वागताध्यक्ष डॉ. नुसरत मेहदी ने वंदे मातरम की साहित्यिक निष्पत्ति और राष्ट्रीय चेतना में उसकी भूमिका पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम केवल एक राष्ट्रगीत नहीं, बल्कि भारतीय साहित्यिक परंपरा में राष्ट्रगीत आत्मबोध, सांस्कृतिक अस्मिता, सौंदर्य, शक्ति और समर्पण का स्थायी प्रतीक है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत मातृभूमि को केवल भौगोलिक भूखंड के रूप में नहीं, बल्कि माँ, शक्ति और सांस्कृतिक चेतना के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
इतिहास की स्मृति राष्ट्र की अस्मिता का आधार : डॉ. कुमकुम गुप्ता
मुख्य अतिथि डॉ. कुमकुम गुप्ता ने कहा, जो राष्ट्र अपना इतिहास भूल जाता है, उसका भूगोल भी बदल जाता है। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम अपने राष्ट्र के प्रति सदा समर्पित रहें और देशभक्ति के भाव से जुड़े रहें।  उन्होंने ज्ञात-अज्ञात बलिदानियों को नमन करते हुए अपनी रचना की पंक्तियाँ भी प्रस्तुत कीं..डरे नहीं जो मौत से, दिया अपना बलिदान, कभी नहीं भूलेगा उनको हिंदुस्तान।
ज्ञात-अज्ञात बलिदानियों का स्मरण
परिषद की भोपाल इकाई की महामंत्री सुनीता यादव ने ज्ञात-अज्ञात बलिदानियों को उनके नाम के साथ स्मरण किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र की स्वतंत्रता एवं अस्मिता के लिए योगदान देने वाले इन वीरों की स्मृति को जीवित रखना साहित्य और समाज दोनों का दायित्व है। उन्होंने भोपाल के बेनी माधव एवं बकाबाई, कानपुर के रघु जी भोसले एवं आपा साहिब तथा नर्मदा क्षेत्र के रामकिशन, दौलत सिंह और कल्याण सिंह के योगदान को अविस्मरणीय बताया।
राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत हुआ रचनापाठ
गोष्ठी में भोपाल की विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े वरिष्ठ साहित्यकारों और रचनाकारों ने राष्ट्रभक्ति, बलिदान, सांस्कृतिक एकता, स्वदेशी और राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत अपनी रचनाओं का पाठ किया। शशि प्रभा शाक्य, होशियार सिंह पटेल, कमल किशोर दुबे, उषा चतुर्वेदी, किशन तिवारी, अनीशा जैन, प्रेमचंद गुप्ता, वैशाली नरवरे, डॉ. प्रियंका श्रीवास्तव, डॉ. जया आर्य, अशोक व्यास, बिहारी लाल सोनी, डॉ. सीमा अग्रवाल, नीता सक्सेना, डॉ. प्रतिभा द्विवेदी, कैलाश मेश्राम, सुरेश पटवा, पंकज पराग, बी.के. श्रीवास्तव, राजेश विश्वकर्मा, डॉ. रश्मि मिश्रा, जगत शर्मा, ऋषि जी और दिनेश प्रभात सहित अन्य रचनाकारों ने अपनी कविताओं और रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रप्रेम और बलिदान की भावना को स्वर दिया। संपूर्ण कार्यक्रम में साहित्य और राष्ट्रबोध का सुंदर समन्वय देखने को मिला तथा ज्ञात-अज्ञात बलिदानियों और वीरांगनाओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई।

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