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Thursday, 22 October 2026
हरदा

डीजल का संकट : सुरक्षा के मानक और किसान की मजबूरी का कॉमन-ग्राउंड

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अनोखा तीर, हरदा। भारत का अन्नदाता जब भोर के धुंधलके में अपने खेत की मेड़ पर पसीना बहाता है, तब वह महज एक फसल नहीं उगा रहा होता, बल्कि वह इस राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा की धुरी को थामे खड़ा होता है। लेकिन विडंबना देखिए, जिस डीजल के दम पर उसके सिंचाई पंप धड़कते हैं और कटाई के वक्त हार्वेस्टर दौड़ते हैं, उसे लाने के लिए वही किसान पेट्रोल पंपों पर अक्सर एक याचक या किसी कानून तोड़ने वाले की तरह खड़ा दिखाई देता है। क्या कंटेनर में ईंधन लेना महज एक सुविधा की मांग है, या यह आधुनिक कृषि के संचालन की एक अनिवार्य शर्त है? यह सवाल आज न केवल किसानों का है, बल्कि उस व्यवस्था का भी है जो नीति और व्यावहारिकता के बीच झूल रही है।
हमारे ग्रामीण अंचलों की भौगोलिक सच्चाई यह है कि खेत और पेट्रोल पंप के बीच मीलों की दूरी है। जब सिंचाई का पंपसेट खेत के सुदूर कोने में लगा हो, या कटाई के पीक सीजन में हार्वेस्टर को खेत में ही ईंधन की जरूरत हो, तो हर लीटर के लिए भारी-भरकम मशीनरी को सड़क तक लाना न केवल खर्चीला है, बल्कि समय की बर्बादी भी है। ऐसे में किसान जब सुरक्षित कंटेनर में डीजल मांगता है, तो वह सुविधा नहीं, बल्कि अपनी कृषि उत्पादकता को बचाने की जद्दोजहद करता है। प्रशासन और पेट्रोलियम विभाग का सुरक्षा को लेकर रुख प्रशंसनीय है, क्योंकि प्लास्टिक की बोतलें या असुरक्षित बर्तनों में ज्वलनशील ईंधन का परिवहन सचमुच किसी बड़े हादसे को न्योता देना है। पेट्रोल पंप संचालक भी अपनी जगह सही हैं, जिन्हें कानूनी पेचीदगियों और लाइसेंस रद्द होने का डर सताता है। लेकिन यहाँ समस्या डीजल नहीं, बल्कि संवाद का वह अभाव है जिसने किसान को संदिग्ध और प्रशासन को कठोर बना दिया है। समाधान का रास्ता प्रतिबंध की संकीर्ण गलियों से नहीं, बल्कि मानकीकरण के खुले मैदान से होकर गुजरता है। दुनिया भर में कृषि के लिए ईंधन की आपूर्ति के विशेष प्रोटोकॉल हैं, जहाँ सुरक्षा और आवश्यकता के बीच एक विवेकपूर्ण संतुलन बनाया जाता है। हमें भी इसी मॉडल को अपनाना होगा। क्या यह संभव नहीं कि पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन (पीईएसओ) द्वारा अनुमोदित सुरक्षित कंटेनरों की एक स्पष्ट सूची हर पेट्रोल पंप पर चस्पां हो? यदि किसान एक निर्धारित मानक वाले कंटेनर और अपनी वैध पहचान के साथ आता है, तो उसे ईंधन देने में कोई प्रशासनिक बाधा नहीं होनी चाहिए? इसके विपरीत, जो नियम तोड़ें, उन पर सख्ती जरूरी है। लेकिन, नियमों का पालन सुनिश्चित कराने की प्रक्रिया इतनी जटिल नहीं होनी चाहिए कि वह अंतत: किसान की मेहनत को ही बाधित करने लगे।
लोकतांत्रिक शासन की सार्थकता इस बात में है कि वह नीति और धरातल की हकीकत के बीच कितना सामंजस्य बिठा पाती है। आज जब कृषि लागत आसमान छू रही है, तब प्रशासन को नियमों के रक्षक के साथ-साथ सुविधा प्रदाता की भूमिका में भी आना होगा। हरदा जिले जैसे क्षेत्रों में, जहाँ कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, प्रशासन, पंप मालिकों और किसान प्रतिनिधियों के बीच एक साझा संवाद समय की मांग है। सुरक्षा के मानकों पर कोई समझौता न हो, लेकिन उन मानकों तक पहुँच किसान के लिए सरल होनी चाहिए। अंतत: एक संवेदनशील शासन व्यवस्था वही है जो खेत में काम करने वाले हाथ और सार्वजनिक सुरक्षा की चिंता करने वाले मस्तिष्क के बीच एक भरोसेमंद पुल का निर्माण करे। समय आ गया है कि हम सुरक्षा के नाम पर अड़चन के बजाय सुरक्षा के साथ सुगमता का मंत्र अपनाएं।

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