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Saturday, 17 October 2026
हरदा

पर्यावरण दिवस विशेष

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खेत की मेड़ों पर लहलहा रहे सागौन के वृक्ष
-पर्यावरण संरक्षण और किसानों की समृद्धि के बन रहे सारथी

अनोखा तीर, मसनगांव। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पर्यावरण संरक्षण को लेकर मसनगांव क्षेत्र एक प्रेरणादायी उदाहरण के रूप में उभर रहा है। तेजी से घटते वन क्षेत्र और बढ़ते तापमान के बीच यहां किसानों ने खेतों की मेड़ों पर सागौन, बांस और फलदार पौधों का रोपण कर पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक सशक्तिकरण की अनूठी मिसाल प्रस्तुत की है। आज गांव और आसपास के क्षेत्रों में खेतों की मेड़ों पर हजारों सागौन के वृक्ष लहलहा रहे हैं, जो भविष्य में हरित संपदा के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। पर्यावरण प्रेमी गौरीशंकर मुकाती के प्रयासों से क्षेत्र में खेत की मेड़ों पर वृक्षारोपण का अभियान लगातार आगे बढ़ रहा है। ग्रामीण किसानों ने इसे अपनाकर पर्यावरण संरक्षण के साथ अपनी आय का एक स्थायी स्रोत भी विकसित किया है। जानकारी के अनुसार ग्राम और आसपास के क्षेत्र में करीब 50 हजार से अधिक सागौन के पौधे खेतों की मेड़ों पर लगाए जा चुके हैं, जो आने वाले वर्षों में विशाल वृक्षों का रूप लेकर पर्यावरण संतुलन को मजबूत करेंगे।
महिला किसान गायत्री बाई बनीं प्रेरणा का स्रोत
करीब दो दशक पहले ग्राम की महिला कृषक गायत्री बाई राठौर ने अपने खेत की मेड़ों पर लगभग 40 सागौन के पौधे लगाए थे। उस समय कई लोगों ने उन्हें ऐसा करने से मना भी किया, लेकिन पर्यावरण संरक्षण का सपना उनके मन में था। आज वे पौधे विशाल वृक्ष बनकर खड़े हैं और क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुके हैं। गायत्री बाई बताती हैं कि परिवार के सहयोग से लगाए गए ये पौधे आज न केवल पर्यावरण को लाभ पहुंचा रहे हैं, बल्कि गांव की पहचान भी बन गए हैं। इन वृक्षों को देखने और इस मॉडल को समझने के लिए देश-विदेश से लोग यहां पहुंचते हैं।
फलदार पौधों से भी बढ़ रही आय
ग्राम के किसान मोहम्मद सलीम शाह और शमीम शाह ने भी खेतों में फलदार पौधों और सागौन के वृक्षों का समन्वित रोपण कर खेती का नया मॉडल विकसित किया है। खेतों में फसलों के साथ अमरूद, आम और मेड़ों पर सागौन के वृक्ष लगाए गए हैं। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ किसानों की अतिरिक्त आय भी सुनिश्चित हो रही है।
पेड़ों से कम होता है तापमान
बढ़ती आबादी और घटते वन क्षेत्र के कारण क्षेत्र का तापमान गर्मी के दिनों में 42 से 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जबकि वृक्षों की छाया वाले क्षेत्रों में यह 28 से 32 डिग्री सेल्सियस के बीच बना रहता है। इससे स्पष्ट होता है कि पेड़ केवल ऑक्सीजन ही नहीं देते, बल्कि प्राकृतिक शीतलन का कार्य भी करते हैं। यही कारण है कि क्षेत्र के अनेक किसान खेतों की मेड़ों पर वृक्षारोपण को प्राथमिकता दे रहे हैं।
देश-विदेश में चर्चा का विषय बना मॉडल
पर्यावरणविद् गौरीशंकर मुकाती ने बताया कि मसनगांव और आसपास का क्षेत्र पर्यावरण संरक्षण तथा कार्बन ट्रेडिंग के क्षेत्र में नया प्रतिमान स्थापित कर रहा है। किसानों द्वारा खेतों की मेड़ों पर सागौन और बांस का बड़े पैमाने पर रोपण किया गया है। इस मॉडल को देखने और समझने के लिए देश-विदेश से शोधार्थी और विभिन्न कंपनियों के प्रतिनिधि यहां पहुंच रहे हैं। उन्होंने बताया कि इसी मॉडल को अपनाकर नर्मदापुरम, हरदा, सीहोर और खंडवा जिलों में अब तक दो करोड़ से अधिक सागौन के पौधों का रोपण किया जा चुका है।
खेत की मेड़ों पर सागौन रोपण के प्रमुख उद्देश्य
किसानों की आय को सुनिश्चित और स्थायी बनाना।
-किसानों के लिए भविष्य निधि के रूप में हरित संपदा तैयार करना।
-पर्यावरण संतुलन, भू-जल संवर्धन और भूमि संरक्षण को बढ़ावा देना।
-नदियों के कटाव को रोकना तथा जलीय जीवों की रक्षा करना।
-लकड़ी के आयात पर होने वाले विदेशी मुद्रा व्यय को कम करना।
-ग्रामीण वानिकी के सफल अनुभवों को आगे बढ़ाना।
-भविष्य में लोहा और सीमेंट पर निर्भरता कम करने की दिशा में कार्य करना।
संभावित लाभ
आने वाले 20 वर्षों में करोड़ों घनमीटर इमारती लकड़ी का उत्पादन, लाखों करोड़ रुपये मूल्य की हरित संपदा का निर्माण, करोड़ों टन मिट्टी को नदियों और समुद्र में बहने से बचाना, क्षेत्रीय तापमान में कमी और रबी फसलों के उत्पादन में वृद्धि तथा कार्बन अवशोषण बढ़ाकर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना।  विश्व पर्यावरण दिवस पर मसनगांव का यह मॉडल यह संदेश देता है कि यदि किसान अपनी भूमि की मेड़ों को हरियाली से जोड़ दें तो पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास दोनों लक्ष्य एक साथ प्राप्त किए जा सकते हैं। यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरित और सुरक्षित भविष्य की नींव साबित हो सकता है।

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