आखिर 16वें वर्ष में प्रवेश कर गया आपका दैनिक अनोखा तीर

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-अब अखबार चलाना लोहे के चने चबाना जैसे हो गया
प्रबुद्ध पाठकों, धन्यवाद , आभार, बधाई हो, आज आपका दैनिक अनोखा तीर अपनी निरंतर यात्रा के 16वें वर्ष में प्रवेश कर गया है। यह सब आपके अटूट विश्वास और सहयोग से ही संभव हो पाया है। हरदा जैसे छोटे शहर से दैनिक अखबार का प्रकाशन और उसकी निरंतरता बनी रहना, सच कहूं तो मेरे लिए किसी अंचभे से कम नहीं है। सीमित संसाधनों और अपर्याप्त स्टाफ के दैनिक अखबार को प्रतिदिन समय पर तैयार करना, नियत समय पर छपना ओर फिर विभिन्न संसाधनों से आठ जिलों में समय पर पहुंचाकर उसे पाठकों तक पहुंचाना, यह समूची कार्य व्यवस्था कितनी कठिनाई पूर्ण होती है, इसका सहज अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। खैर यह सब तो वर्षों वर्ष से चलता आया है और चलता रहेगा। लेकिन अब जो दौर चल रहा है इसमें दैनिक अखबार चलाना लोहे के चने चबाना जैसे हो गया है। दैनिक अखबार के लिए अब किसी एक मौर्चे पर चुनौतियां नहीं है, बल्कि चारों ओर चुनौतियां ही चुनौतियां नजर आ रही है। सबसे बड़ी चुनौती तो मेनपावर की है। कहने को चाहे रोजगार का संकट और बेरोजगारी को लेकर हो-हल्ला मचाया जा रहा हो, लेकिन अखबारों के लिए स्थानीय स्तर पर काम करने वाले युवक युवतियों का आज भी अभाव बना हुआ है। अब खबर को पहचानने और उसे सत्यता की कसौटी पर परखते हुए प्रस्तुत करने वाले अनुभवी पत्रकारों की संख्या निरंतर घटती जा रही है। कम बजट और सीमित संसाधनों के माध्यम से छोटे शहरों से निकलने वाले दैनिक अनोखा तीर जैसे अखबारों के सामने बदलते दौर की पत्रकारिता तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया, डिजिटल मीडिया और अब एआई के इस आधुनिक दौर में अपनी पहचान बनाएं रखना काफी चुनौतीपूर्ण कार्य हो गया है। आज अखबार को प्रिंट और डिजिटल दोनों माध्यमों को अपनाया जाना लगभग जरुरी हो गया है। इस सबके बावजूद सबसे बड़ी चुनौती स्पष्टवादी, निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता करना या अखबारों के लिए उनका प्रकाशन करना भी बन चुकी है। चूंकि आज निरंतर बढ़ती मंहगाई के इस दौर में अखबार का प्रकाशन इतना महंगा हो गया है कि उसकी उत्पादन लागत पर पाठक उसे खरीदेगा नहीं और लागत निकालने के लिए मिलने वाले विज्ञापन बगैर समझौते वादी पत्रकारिता के संभव नहीं है। अगर निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता की जाती है तो स्थानीय स्तर से लेकर सत्ताधीशों तक के आंखों की किरकिरी बन जाते हो। अब वह समय भी नहीं रहा जब स्वच्छ समीक्षा तथा निर्भीक पत्रकारिता को सकारात्मक दृष्टिकोण से लिया जाता था। सीधे तौर पर कहां जाएं तो अब नीचे से ऊपर तक सबकों चाटूकारिता, चापलूसी करने वालों की दरकार है, पत्रकारिता के माध्यम से आइना दिखाने वाले पत्रकारों की नहीं। वह दौर निकल गया जब पार्षद से लेकर मुख्यमंत्री तक और पटवारी से  मुख्य सचिव तक की कार्यप्रणाली को लेकर तीखे सवालों के साथ खबरों का प्रकाशन किया जाता था और वह पूरी विनम्रता के साथ अपनी बात रखते हुए अपनी कार्यशैली में सुधार करते थे। पत्रकार भी विषय की तह में जाकर तथा अध्ययन करने के बाद विषय सामग्री का प्रकाशन करते थे। आजकल पत्रकारिता का स्तर भी उतना ही गिर गया है जितना जनसेवा का लबादा ओढ़कर कार्य करने वालों का। यूट्यूब और सोशल मीडिया जैसे प्लेटफार्मों ने तो पूरी विश्वसनीयता ही खो दी है। ऐसी स्थिति में अखबार का प्रकाशन व संचालन और भी दुभर हो गया है। वर्तमान स्थिति में मेरे जैसे पत्रकार तो लगभग अप्रासंगिक हो गये है। सच कहूं तो अब कुछ लिखने या अखबार चलाने की इच्छाएं भी मर चुकी है। हां इतना अवश्य है कि जब भी हरदा जिले का इतिहास लिखा जाएगा तो यहां से प्रथम हिन्दी दैनिक अखबार के तौर पर अनोखा तीर का उल्लेख अवश्य होता रहेगा। हो सकता है मेरा यह लेखन आपको निराशावादी लगें, लेकिन हकीकत यही है कि अब अखबार चलाना केवल धनपतियों के ही बूते की बात रह गई है। जो उनका सुरक्षा कवच बना रहे और काले को सफेद करने का जरिया बन जाएं। कहने को तो अखबार समाज और सरकार के बीच सेतु का कार्य करने वाले होते हैं जो जनता की आवाज सरकार तक और सरकार की जनकल्याणकारी योजनाएं जनता तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम होते हैं। लेकिन आजकल सरकार भी बड़े अखबारी घरानों की वित्तपोषक बनी हुई है। सार्वजनिक मंचों पर लोकल फार वोकल का नारा देना तो अच्छा लगता है लेकिन हकीकत का इससे कोई वास्ता नहीं होता। फिर चाहे यह नारा देने वाली भारत सरकार हो या प्रादेशिक। भारत सरकार ने तो छोटे अखबारों को पिछले पांच सालों से राष्ट्रीय पर्वों पर भी विज्ञापन देना बंद कर दिया है। वह केवल बड़े अखबारों तथा इलेक्ट्रॉनिक नेशनल मीडिया को ही बड़े बड़े पैकेज देकर अपनी वाहवाही कराने का काम कर रही है। यही स्थिति अब धीरे धीरे प्रादेशिक सरकारों की भी होती जा रही है। जिससे जिला स्तर से प्रकाशित होने वाले अखबार अब केवल अपने स्थानीय विज्ञापनदाताओं के सहारे ही जिंदा है। लेकिन गली गली में घूमने वाले यूट्यबरो ने दो पांच सो के चक्कर में जहां एक ओर पत्रकारिता को बदनाम करना शुरू कर दिया है तो वहीं स्थानीय अखबारों के विज्ञापन भी समाप्त कर दिए हैं। यही किसी एक जिले या स्थान की बात नहीं है बल्कि लगभग सभी जगह यह स्थिति निर्मित हो चुकी है। सरकार ने अखबारों को उद्योग की श्रेणी में रखते हुए कागज, छपाई, स्याही तथा विज्ञापन सब पर जीएसटी भी लगा रखा है। चलो यह भी मान लिया कि अखबार उद्योग है, तो फिर लघु उद्योगों को बढ़ावा देने की बात करने वाली सरकारें जिला स्तर से प्रकाशित होने वाले इन लघु औद्योगिक इकाइयों के प्रोत्साहन हेतु क्या कर रही है? आज एक जिला स्तर से प्रकाशित अखबार  प्रत्यक्ष रूप से लगभग 20 लोगों के और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 70-80 लोगों को रोजगार के माध्यम से उनके परिवारों में आर्थिक सहायता का जरिया बने हुए हैं। आज मुझे अनोखा तीर की वर्षगांठ के अवसर पर यह सब इसलिए भी लिखने के लिए विवश होना पड़ रहा है, क्योंकि यह अखबार प्रदेश के आठ जिलों में किसी ना किसी रूप में हमारे साथ जुड़े काफी लोगों की आजीविका निर्वहन में चाहे गिलहरी जैसा योगदान प्रदान कर रहा हो, लेकिन एक सहारा तो बना ही है। प्रदेश स्तर पर हरदा की पहचान भी बना हुआ है अनोखा तीर। सही मायने में देखा जाएं तो बीते पन्द्रह सालों में अनोखा तीर ने जिले से चल कर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर भी हरदा को अपनी अलग पहचान कायम करने में महति भूमिका निभाई है। मैं अपने सुधि पाठकों और विज्ञापनदाताओं, विभिन्न जिलों व ग्रामीण स्तर पर अपनी सेवाएं प्रदान करने वाले प्रतिनिधियों का धन्यवाद ज्ञापित करता हूं, जिनके सहयोग से अखबार अपनी निरंतरता बनाए हुए हैं। मैं आप सभी से अनुरोध करता हूं कि इस विषम परिस्थितियों में अखबार को चलाएं रखना मेरे नहीं आपके ही वश की बात है। यह अखबार कल भी आपका था, आज भी है और कल भी आपका ही रहेगा।

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