पूर्णाहुति के साथ संपन्न हुई सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा

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अनोखा तीर, मसनगांव। पुरुषोत्तम मास के अवसर पर श्री राधा-कृष्ण मंदिर परिसर में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन पूर्णाहुति एवं महाप्रसादी वितरण के साथ श्रद्धा और भक्ति भाव से संपन्न हुआ। कथा के अंतिम दिवस बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, सुदामा चरित्र तथा राजा परीक्षित के मोक्ष प्रसंग का श्रवण किया। कथावाचक पंडित ओमप्रकाश शर्मा ने भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का वर्णन करते हुए बताया कि भगवान ने 16,108 रानियों को दर्शन देकर उन्हें अपना लिया और भक्तों के कल्याण के लिए अनेक स्वरूपों में प्रकट होकर धर्म की स्थापना की। उन्होंने गुरु दत्तात्रेय के 24 गुरुओं की कथा सुनाते हुए कहा कि मनुष्य को प्रकृति और जीव-जंतुओं से भी शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। मधुमक्खी का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि अत्यधिक धन संचय अंतत: दुख का कारण बन सकता है, क्योंकि संग्रहित वस्तु कभी भी नष्ट या चोरी हो सकती है। इसी प्रकार मकड़ी अपने ही बनाए जाल में फंस जाती है, जिससे यह सीख मिलती है कि मनुष्य को ऐसे कर्मों से बचना चाहिए जो अंतत: उसी के लिए बंधन बन जाएं। उन्होंने जल के महत्व का वर्णन करते हुए कहा कि बहता हुआ जल सदैव उपयोगी और पवित्र माना जाता है, जबकि एक स्थान पर संचित जल भी आवश्यकता पड़ने पर अनेक कार्यों में काम आता है। दत्तात्रेय ने ऐसे ही विभिन्न प्राकृतिक तत्वों और जीवों से जीवनोपयोगी शिक्षाएं प्राप्त कर उन्हें अपना गुरु माना था। कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण और उनके परम मित्र सुदामा के चरित्र का मार्मिक वर्णन किया गया। बताया गया कि सुदामा ने जीवनभर अभाव और कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। जब वे द्वारका पहुंचे तो भगवान से कुछ मांगने नहीं गए थे, बल्कि केवल अपने मित्र के दर्शन करने पहुंचे थे। उनकी निस्वार्थ भक्ति और संतोष से प्रसन्न होकर भगवान ने बिना मांगे ही उनके जीवन के सभी कष्ट दूर कर दिए। यह प्रसंग सच्ची भक्ति, आत्मसम्मान और संतोष का संदेश देता है। कथा में यदुवंश के विनाश का प्रसंग भी सुनाया गया। बताया गया कि अहंकार मनुष्य के पतन का प्रमुख कारण होता है। यदुवंशियों में बढ़ते अभिमान और अनुचित आचरण के कारण उन्हें श्राप प्राप्त हुआ, जिसके परिणामस्वरूप उनका विनाश हुआ। इसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लौकिक लीलाओं का समापन कर परमधाम की ओर प्रस्थान किया। समापन प्रसंग में राजा परीक्षित और श्री शुकदेव महाराज की कथा का वर्णन किया गया। कथावाचक ने बताया कि सात दिनों तक भागवत श्रवण और गुरु कृपा के प्रभाव से राजा परीक्षित को आत्मज्ञान प्राप्त हुआ। तक्षक नाग के दंश के बाद भी उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। श्री शुकदेव महाराज की वंदना और भगवान के स्मरण के साथ कथा का समापन पूर्णाहुति, आरती एवं प्रसाद वितरण के साथ हुआ। कथा समापन अवसर पर श्रद्धालुओं ने धर्म, भक्ति और सदाचार के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
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