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Thursday, 22 October 2026
हरदा

साधु-संतों की सुरक्षा और बड़ों का सम्मान करने वाला घर मंदिर के समान : विशेषसागर महाराज

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अनोखा तीर, हरदा। दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित ग्रीष्मकालीन वाचना के दौरान पूज्य उपाध्यायश्री 108 विशेषसागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि प्रत्येक जीव अपने शुभ और अशुभ कर्मों का स्वयं कर्ता और भोक्ता होता है। मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि बोए बीज बबूल का, आम कहां से होय की कहावत आज भी पूरी तरह सार्थक है। व्यक्ति बबूल का बीज बोकर आम की अपेक्षा करता है, जबकि कर्मों के अनुसार ही फल मिलता है। उपाध्यायश्री ने कहा कि व्यक्ति जीवन में सुख और शांति चाहता है, लेकिन उसके कर्म अक्सर इसके विपरीत होते हैं। वह लाभ की कामना तो करता है, किंतु शुभ कार्य करने से बचता है। उन्होंने कहा कि शुभ कार्य करते रहना चाहिए और लाभ की चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अच्छे भावों का फल कभी बुरा नहीं होता और बुरे भावों का फल कभी अच्छा नहीं हो सकता। उन्होंने आत्मकल्याण का संदेश देते हुए कहा कि यदि आत्मा का कल्याण चाहते हैं तो आज और अभी से दूसरों को दोष देना बंद कर दें। जिस द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव में जो होना है, वह होकर ही रहेगा, इसलिए अनावश्यक चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। प्रवचन के दौरान उपाध्यायश्री ने पूज्य गणाचार्यश्री विरागसागर गुरुदेव का स्मरण करते हुए कहा कि जिस घर में बड़ों का आदर-सत्कार होता है, भाई-भाई तथा परिवार के सदस्य प्रेमपूर्वक साथ रहते हैं, संतों का सम्मान होता है और साधु-संत आहार चर्या के लिए आते हैं, वह घर मंदिर के समान पवित्र होता है। उन्होंने आगे कहा कि जिस प्रकार व्यक्ति अपने घर-परिवार और धन-संपत्ति की रक्षा की चिंता करता है, उसी प्रकार साधु-संतों, धर्मात्माओं और साधर्मियों की सुरक्षा की चिंता भी करनी चाहिए। आगम में कहा गया है न धर्मो धार्मिके बिना, अर्थात धर्मात्माओं के बिना धर्म का अस्तित्व नहीं रह सकता। उपाध्यायश्री ने कहा कि समाज का परम कर्तव्य है कि वह उन साधु-संतों की रक्षा और सेवा करे, जिन्होंने आत्मकल्याण, जिनशासन की प्रभावना और संरक्षण के लिए घर-परिवार का त्याग कर मोक्षमार्ग को अपनाया है। वे पदविहार करते हुए निस्वार्थ भाव से स्वयं के साथ-साथ समाज के कल्याण का भी कार्य करते हैं। उन्होंने साधु और श्रावक के संबंध को एक गाड़ी के दो पहियों के समान बताते हुए कहा कि साधु साधना करते हैं और श्रावक उनकी साधना में सहयोग प्रदान करते हैं। उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से संकल्प लेने का आह्वान किया कि जीवन पर्यंत त्रिलोक पूज्य, धरती के देवता साधु-साध्वियों की रक्षा और सेवा के लिए तत्पर रहेंगे। कार्यक्रम की शुरुआत क्षुल्लकश्री विश्वोतीर्णसागर महाराज द्वारा मंगलाचरण के साथ की गई, जिसके पश्चात धर्मसभा का शुभारंभ हुआ।
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