-धरने की जमीन पर बढ़ता टकराव-उकसावे की आहट…
अनोखा तीर, बड़वाह। प्रशासनिक उदासीनता जब लंबी खामोशी ओढ़ ले, तो हालात केवल जमे नहीं रहते-वे सुलगने लगते हैं। रविवार को भी अपनी जायज मांगों को लेकर ग्रामीण धरना स्थल पर डटे रहे। शांतिपूर्ण विरोध के बीच एक बार फिर विवाद की चिंगारी दिखाई दी, जिसने प्रशासन की निष्क्रिय भूमिका पर फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रविवार को धरने के दौरान निजी जमीन मालिक सरदार पटेल अपने बेटे और पत्नी के साथ मौके पर पहुंचा। ग्रामीणों के अनुसार आरोप है कि उन्होंने धरना दे रहे ग्रामीणों को जमीन छोड़ने के लिए कहा और चिल्ला-चोट कर माहौल को गर्माने की कोशिश की। ग्रामीणों का कहना है कि सरदार पटेल ने सीधे तौर पर उकसावे की भाषा का इस्तेमाल किया और यह दावा किया कि धरना स्थल उनकी निजी भूमि है। उन्होंने कथित तौर पर दंड रसीद और जमीन समतलीकरण कराने की बात कहते हुए ग्रामीणों से जगह खाली करने और कहीं और जाकर धरना देने को कहा। धरने पर मौजूद ग्रामीणों ने पूरे घटनाक्रम का वीडियों भी बनाया। समय की नजाकत को समझते हुए विवाद को आगे बढ़ने से रोकने के लिए ग्रामीणों ने संयम बरता, जिसके बाद निजी जमीन मालिक वहां से चला गया। हालांकि यह घटना प्रशासनिक चुप्पी के बीच बढ़ते तनाव का संकेत जरूर दे गई।
शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे ग्रामीण
धरने पर बैठे ग्रामीण जगदीश केवट ने बताया कि कई दिनों से ग्रामीण शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। न तो कोई तोड़फोड़ की गई और न ही किसी तरह की अव्यवस्था फैलाई गई। इसके बावजूद प्रशासन की ओर से न तो सीमांकन किया जा रहा है और न ही कथित अवैध कब्जों को हटाने की कोई ठोस कार्रवाई सामने आ रही है। उन्होंने कहा कि इससे पहले भी निजी जमीन मालिक पटेल ने पंचायत द्वारा लगाए गए खंभों को उखाड़ दिया था। उस समय प्रशासन ने खंभे दोबारा लगवाए थे, लेकिन अब फिर से विवाद खड़ा किया जा रहा है।
ग्रामीणों की मांग साफ और उचित
ग्रामीणों का कहना है कि उनकी मांग साफ और स्पष्ट है शासकीय चरनोई भूमि का सीमांकन हो, वास्तविक स्थिति सामने आए और यदि कहीं अवैध कब्जा है तो उसे हटाया जाए। लेकिन प्रशासन मानो आंखें मूंदे बैठा है। न मौके पर कोई अधिकारी पहुंचता है, न कोई लिखित आश्वासन दिया जा रहा है। हम पूछते हैं तो जवाब नहीं मिलता, और जब विवाद होता है तो भी प्रशासन दूर खड़ा रहता है,यह पीड़ा धरने पर बैठे हर ग्रामीण की आवाज बन चुकी है।
कब तक मामले को टालेगा प्रशासन ….?
प्रशासन की भूमिका को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कब तक मामले को टाला जाएगा। सीमांकन न होने से भ्रम बना हुआ है, और यही भ्रम टकराव की वजह बन रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन की यह चुप्पी किसी बड़े विवाद को न्योता दे सकती है। यदि समय रहते स्थिति स्पष्ट नहीं की गई, तो शांतिपूर्ण धरना भी तनाव में बदल सकता है, जिसकी जिम्मेदारी किसकी होगी यह सवाल अब खुलकर पूछा जाने लगा है।
आखिर कब जागेगा स्थानीय प्रशासन…?
धरना स्थल पर महिलाएं, बुजुर्ग और युवा लगातार मौजूद हैं। उनका कहना है कि वे कानून के दायरे में रहकर संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता उन्हें मजबूर कर रही है। हम शांति चाहते हैं, लेकिन न्याय भी चाहिए, यही संदेश ग्रामीण बार-बार दोहरा रहे हैं। फिलहाल धरना जारी है। प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई है। सवाल यह नहीं कि धरना कब खत्म होगा, सवाल यह है कि प्रशासन कब जागेगा। क्योंकि अगर यही चुप्पी बनी रही, तो हालात हाथ से निकलने में देर नहीं लगेगी।
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