जिले की ग्रामीण संस्कृति में धरती के प्रति कृतज्ञता केवल भावना नहीं, बल्कि जीवंत परंपरा है। यहाँ खेतों की बुआई पूर्ण होने के बाद किसान परिवार के सभी सदस्य खेत में एकत्रित होकर धरती माता के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। यह आभार केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म, सेवा और पूजन के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। इसी परंपरा के अंतर्गत मछुंद्री माई का पूजन किया जाता है। जिन्हें क्षेत्र में धरती, जल और जीवन की संरक्षिका के रूप में माना जाता है। दरअसल, रबी सीजन दौरान खेतों में बुआई के बाद विधिपूर्वक मछुंदरी माई का स्थान निर्मित किया जाता है। वहाँ हरे पत्तों के अलावा धान-ज्वार, फूल और मिट्टी से एक प्रतीकात्मक मंडप सजाया जाता है। यह मंडप उस विश्वास का प्रतीक होता है कि धरती केवल भूमि नहीं बल्कि जीवित चेतना है, जो अन्न, जल और जीवन प्रदान करती है। इस अवसर पर खेतों में कार्य करने वाले सभी श्रमिकों को गुड़, घूंगरी और मालपुए वितरित किए जाते हैं। यह केवल भोजन वितरण नहीं, बल्कि श्रम का सम्मान और सामाजिक समरसता का प्रतीक है।
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