आओ मिलकर बचाएं अपनी धरोहर, वन, जल और धर्मभूमि…

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खनन के नाम पर कही उजाड़ न दी जाए हमारी ‘देवभूमि’

विकास पवार बड़वाह – क्या सच में खनन का मतलब अब विनाश हो गया.? शासन और प्रशासन आखिर इसे किस कीमत पर दिखाना चाहता हैं — क्या हमारी आस्था, हमारी वन संपदा और हमारी प्राचीन धर्मभूमि की बलि देकर.? बड़वाह से सटे पवित्र महोदरी और कोठावा वन क्षेत्र को सरकार अब फास्फोराइट खनन के लिए उजाड़ने पर आमादा है। यह वही भूमि है जिसे च्यवन ऋषि, कश्यप और देवी महोदरी की तपो-देव भूमि कहा गया है। जहां च्यवन ऋषि ने तप किया, जहां हजारों बेलपत्र वृक्ष हैं, और जो मां नर्मदा की परिक्रमा पथ की आत्मा है। लेकिन शासन की नीतियों ने इस “देवभूमि” को भी खदानों की धूल में मिलाने के लिए कमर कस ली है।ऐसा इसलिए क्योंकि 14 सितंबर 2023 को केंद्र सरकार ने “महोदरी फास्फोराइट ब्लॉक” के लिए 699 हेक्टेयर भूमि का टेंडर जारी किया, जो गुरुग्राम की एक कंपनी को दिया गया। इसका खुलासा हाईकोर्ट अधिवक्ता अभिष्ट मिश्र ने गुरुवार को शहर में पत्रकार वार्ता आयोजित कर किया। उन्होंने बताया कि महोदरी फास्फोराइट ब्लॉक योजना के विरुद्ध पुजारी विवेक दुबे राजगुरु बड़वाह, महंत सुखदेवानंद ब्रह्मचारी, पं. शरद कुमार मिश्र और स्वामी राधाकांताचार्य आदि द्वारा माननीय उच्च न्यायालय, इंदौर में याचिका दायर की गई है। अधिवक्ता मिश्र ने बताया याचिका के सम्बंध में कंपनी सहित केंद्र- राज्य सरकार, खनिज-वन मंत्रालय व खरगोन कलेक्टर के साथ वन मंडल बड़वाह को भी पक्ष रखने हेतु नोटिस जारी किया गया है। न्यायालय प्रक्रिया के तहत हालांकि जवाब आना शेष है। योजना के अनुसार, इस पवित्र वन क्षेत्र के पेड़ काटे जाएंगे । ताकि फास्फोराइट खनिज निकाला जा सके। सोचिए,,,, इतने बड़े वन क्षेत्र में जब मशीनें और विस्फोट चलेंगे, तो क्या शेष बचेगा…?

एक खदान में तब्दील हो जाएगा — 

याचिकाकर्ता पंडित विवेक दुबे ने कहा नर्मदा नदी का जल दूषित होगा, वन्य जीव खत्म होंगे, और जंगल, जो कभी ऋषियों की तपोभूमि था, एक खदान में तब्दील हो जाएगा। बताया यह केवल जंगल नहीं, “देवभूमि और तपोभूमि” है। यहां च्यवन ऋषि की स्थली, ऋषि कश्यप का आश्रम, मां जयंती मंदिर, प्राचीन कोटेश्वर महादेव मंदिर और जैन तीर्थ सिद्धवरकूट जैसे अनेकों धार्मिक केंद्र हैं। क्या इन स्थलों की पवित्रता को मिटाकर खनिज निकाला उचित होगा…?

 आओ, मिलकर बचाएं अपनी भूमि —-

याचिकाकर्ता विवेक दुबे ने कहा यह सिर्फ जंगल नहीं, हमारी आस्था और अस्तित्व का प्रतीक है। यदि इसे उजाड़ा गया, तो भविष्य में इसकी भरपाई असंभव होगी। उन्होंने नगरवासियों से हस्ताक्षर अभियान और जनजागरण चलाने की अपील की ताकि प्रशासन को यह संदेश स्पष्ट मिल सके कि बड़वाह की जनता अपनी धरती और देवी-धाम की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर्य है।

 यह क्षेत्र के जंगल के विनाश की तैयारी है — 

सच्चिदानंद चैतन्य महादेव महाराज ने शासन की इस योजना पर तीखा विरोध दर्ज करते हुए कहा कि यह विनाश का प्रतीक है। यदि यह खनन शुरू हुआ, तो नर्मदा प्रदूषित होगी, वन्य प्राणी नष्ट होंगे और देवभूमि और तपोभूमि” खत्म हो जाएगी। उन्होंने कहा कि अब समय है जब जनता को चुप नहीं रहना चाहिए। जो भूमि ऋषियों ने साधना से पवित्र की, उसे मशीनों से खोदना पाप है। चेतावनी दी कि यह भूमि किसी की निजी संपत्ति नहीं, जनभावना और धार्मिक आस्था का केंद्र है।क्या बड़वाह के जनप्रतिनिधि सिर्फ नाम के लिए चुने गए हैं…? क्या उन्हें यह नहीं दिखता कि उनके क्षेत्र की आत्मा को बेचा जा रहा है..? क्या जिला प्रशासन को नर्मदा और वन्य जीवों की चिंता नहीं..? क्या “खनन” के नाम पर धर्म, पर्यावरण और इतिहास सब कुछ कुर्बान कर दिया जाएगा…?आज जरूरत है कि हर नागरिक उठे, बोले और खड़ा हो। क्योंकि जब जंगल कटेंगे, नर्मदा दूषित होगी, और देवी-धाम उजड़ेंगे —तब सिर्फ एक चीज़ बचेगी — खामोशी और पछतावा। इसलिए,

“आओ मिलकर बचाएं अपनी वन संपदा, अपनी तपोभूमि और अपनी नर्मदा”

यह लड़ाई सिर्फ पेड़ों की नहीं — हमारी पहचान की भी है।

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