श्रीरामकथा में चरित्र निर्माण, कर्तव्य बोध, पर्यावरण व राष्ट्र निर्माण का भी संदेश

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संत भ्रम दूर कर ब्रह्म के पास ले जाते है :श्रद्धेय मदनमोहन महाराज
सब हेडिंग : बच्चों में भौतिक के साथ भावनात्मक विकास जरुरी
अनोखा तीर, हरदा। हरि और हर की कृपा से नर्मदा तट के पुनीत नगर हरदा में हरिकथा की गंगा प्रवाहित हो रही है। जब मैं यहां देखता हूं तो सब वंदनीय है यहां कोई निंदनीय नहीं है, सब शिवावतार है। कभी-कभी जब हम कहते हैं कि माला फेरत जुग गया तो आपको लगता होगा कि यह कहना क्या चाहते हैं। हम तो भजन करने ही आएं हैं, लेकिन जो भी महापुरुष जब कुछ बोलता है तो वह खुद नहीं बल्कि परमात्मा की मर्जी से बोलता है। इस सृष्टि में प्रत्येक जीव शंकर का साधक है। अगर कोई आनंदमय है तो उसका शंकर आनंद में है और अगर कोई परेशान हैं तो उसके अंदर अंतर्कलह चल रहा है। श्रीरामकथा में केवल गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित ग्रंथ का ही पाठ नहीं होता बल्कि रामचरित्र से राष्ट्र चरित्र तक की यात्रा हम यहां करते है। रामकथा ही सही चरित्र निर्माण, कर्त्तव्यबोध, पर्यावरण के साथ ही धर्म नीति से राष्ट्र नीति और समाज निर्माण का बोध कराती है। उक्त विचार वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक श्रद्धेय मदनमोहन जी महाराज ने आज पांचवें दिन की कथा प्रारंभ करते हुए व्यक्त किए। कच्छकड़वा पाटीदार भवन हरदा में श्री मस्तरामदास जी त्यागी महाराज की तपोभूमि आश्रम सेवा समिति के माध्यम से आयोजित इस पांचवें दिन की कथा का शुभारंभ घोल गणेश सील फाटा मुंबई से पधारे महामंडलेश्वर बाल योगी बालकदास जी महाराज, चिड़ावा राजस्थान के संत श्री सेवक दास जी महाराज के सानिध्य में कथा यजमान प्रहलाद शर्मा श्रीमती कौशल्या शर्मा, पुष्करराव श्रीमती सीमाराव, हरिशंकर राठौर श्रीमती शोभा राठौर द्वारा श्रीरामचरितमानस ग्रंथ की पूजा करते हुए किया गया।
कथावाचक श्री मदनमोहन व्यास जी महाराज ने कहा कि ज्ञानी समदर्शी होता है समवर्ती नहीं। विवेक अनुसार निर्णय लेना ही सच्चा ज्ञान है। उन्होंने इस दौरान संतों की महिमा का भी भरपूर उल्लेख किया। संत शांतिकारी होते है, भ्रांतिहारी होते है और कभी कभी जब धर्म और संस्कृति का हनन होता है तो वह क्रांतिकारी भी हो जाते है। वैसे तो संतों का ह्रदय करुणामय और मायामुक्त होता है। वह अजात शत्रु होते है। जब उनका सानिध्य प्राप्त होता है तो जिस तरह एक बच्चा मां के साथ खेलते खेलते मातृभाषा सीख जाता है उसी तरह संतों के सानिध्य से ब्रम्ह ज्ञान प्राप्त हो जाता है। संत हमारा भ्रम दूर करते है और ब्रम्ह के करीब लाते है। साधु संत हमें ऐसा कुछ देते नहीं है, लेकिन वह हमारी आत्मा का आवरण भंग करते हुए हमें यथार्थ के धरातल से परिचय कराने का मार्गदर्शन प्रदान करते है। उन्होंने कहा कि आज इन्हीं महापुरुषों के साथ सत्संग में निकलकर आया कि शुभ से लाभ है। लाभ हमेशा शुभ नहीं होता, लेकिन शुभ से मिला लाभ लाभदायक होता है। हमारे ऋषियों ने कहा है कि पाप का बाप लोभ है। काम से कर्म का, अहंकार से ज्ञान का, लोभ से भावना का नाश होता है। इसलिए तो तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में कहा है कि काम क्रोध मद लोभ यह सब नर्क के द्वार है। अंर्तकरण में ज्ञान होना चाहिए लेकिन क्रिया में भक्ति होना चाहिए। जिसे व्यवहार करना नहीं आता वह भक्त नहीं हो सकता। आयुर्वेद के आचार्यों ने भी कहा है कि बीमारी पहले मन में आती है, शरीर में नहीं। श्रीराम कथा उपदेश नहीं उपचार है। समाज में सद्विचारों की बहुत आवश्यकता है। व्यक्ति जितना सरल, सजल और सजग होता है उतना ही सफल होता है। श्रीराम कथा हमें चरित्र निर्माण, कर्त्तव्यबोध, राष्ट्र और समाज निर्माण की दिशा भी प्रदान करती है। इसी दौरान श्री व्यास जी ने मुनि वशिष्ठ और श्रीराम जी के बीच हुए वार्तालाप का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब प्रश्न करने वाला श्रीराम हो तो वशिष्ठ जैसे मुनि भी हतप्रभ रह जाते है। वशिष्ठ जी ने श्रीराम द्वारा किए गए प्रश्न के उत्तर में मात्र यही कहा था कि आपके सवाल का जवाब मौन है। श्री व्यास जी ने कहा कि कथा सुनने से क्या फायदा होता है यह शायद कुछ श्रोताओं में भ्रांति बनी हो सकती है। कथा कानों से सुनी जाती है, लेकिन उसका प्रभाव हमारे पूरे मन मस्तिष्क पर पड़ता है। और जब कथा सुनकर ईश्वर के प्रति समर्पण का भाव आता है तो समझ लीजिए कानों के माध्यम से ईश्वर हमारे अंदर प्रविष्ट हो चुका है। लेकिन हम तो जन्म जन्मांतर से पाप कर्मों से लिप्त रहे है ऐसी स्थिति में वह परमात्मा भी हमारे अंदर प्रवेश करने के पश्चात देखता है कि इसके मन में तो गंदगी का अंबार लगा है। तुलसीदास जी ने भी कहा है कि निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा। लेकिन जब भक्त ने भगवान को बुला ही लिया है तो फिर उसे स्वच्छ करना भी उसका ही कर्त्तव्य हो जाता है। आप सोचिए जब बिहारी खुद बुहारी लगाएगा तो हमारा मन कितना पवित्र हो जाएगा। श्री व्यास जी श्रीराम के बाल स्वरुप का जो वर्णन गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया है उसके साथ कथा यात्रा को आगे बढ़ाते हुए श्रोताओं को आनंद रस की अनुभूति से लबरेज कर दिया। यहां तुलसीदास जी प्रभु से पूछते है कि प्रभु बाललीला करते हुए मां के कहने पर आखिर कब तक रोते रहोंगे। चूंकि माता कौशल्या ने प्रभु से कहा था कि मुझे ऐसा बालक चाहिए जो मेरी गोद में समा भी जाए और रोकर मुझे उसे दुलार करने का भी सौभाग्य प्रदान करें, तब प्रभु रोने लगे थे। सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा। तुलसीदास जी के पूछने पर प्रभु ने कहा था कि तब तक रोऊंगा जब तक मेरे सभी भक्तों के दुख दूर न हो। श्री व्यास जी ने यहां वर्तमान मां और बच्चों की स्थिति पर समाज को दिशा देने का भी प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि आजकल की माताएं बच्चों को अपना दूध पिलाने की बजाए बोतल थमाने लगी है और जब वही बच्चा बड़ा होकर बोतल पकड़ता है और उसका द्रव्य बदल जाता है तो फिर चिंता का पाठ उठने लगता है। सच तो यह है कि आजकल बच्चे नहीं मां-बाप बिगड़ गए है। दुनिया में मां से अच्छी जन्मपत्री कोई ज्योतिषी नहीं बना सकता। बचपन में जो बोतल थामी थी वह बुढ़ापे तक चलती है और कई बार तो बोतल के चलते-चलते ही व्यक्ति चला जाता है। समाज में कुरीतियां बढ़ रही है। पैसा और प्रतिष्ठा ही जीवन नहीं है, कर्त्तव्य का पालन करना ज्यादा जरुरी है। आज हमारे बच्चों को क्या पढ़ाया जा रहा है। श्री व्यास जी ने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बच्चों के भौतिक विकास के साथ भावनात्मक विकास जरुरी है। श्रीराम के गुुरुकुल के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा। जैसी शिक्षा मिलती थी। आज हमारे बच्चे क्या पढ़ रहे है। उन्होंने श्रीराम के शिक्षा ग्रहण दौरान ही ऊंच नीच और छोटे बड़े के भेदभाव मिटाने की शिक्षा का भी वर्णन किया। वहीं विश्वामित्र एवं मुनि वशिष्ठ का दृष्टांत सुनाया। श्री व्यास जी इसी के साथ फिर साधु महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि साधु अपनी नहीं बल्कि सामाजिक चिंता को अपनी चिंता समझते है। वह धर्म रक्षा और सामाजिक स्वार्थ को लेकर चिंता करते है। उन्होंने इस श्रीराम कथा आयोजन को लेकर कहा कि ऐसे आयोजन साधु संतों द्वारा परमार्थ के हितार्थ किया जाना भी अपने आपमें उल्लेखनीय और वंदनीय है। मैं देख रहा हूं कि यहां सुबह बालभोग से लेकर देर रात तक भोजन प्रसादी निरंतर चलती रहती है। कुछ तो आते है खाते है और चले जाते है। भोजन और भजन दोनों की इतनी व्यापक व्यवस्था के बावजूद मैंने यहां कभी कोई पर्ची कटते नहीं देखा। इसीलिए तो हमारे ऋषि मुनियों ने कहा है कि मांगत मांगत मान घटे ओर प्रीति घटे नित के घर जाये से, ओछे की संगत से बुद्धि घटे, ओर क्रोध घटे मन के समझाये। संतों का संग, भक्ति का रंग और संत समागम में कथा श्रवण का आनंद ही कुछ और है। महामंडलेश्वर बाल योगी बालकदास जी महाराज ने तो बताया है कि कल से यहां साधुओं की जमात आने वाली है। १०० से अधिक साधुओं का आगमन होने वाला है। ऐसा संत सानिध्य और उनके दर्शन व सत्संग का सौभाग्य किसको मिलता है। एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध। तुलसी संगत साधु की, हरे कोटि अपराध। श्री व्यास जी ने कहा कि व्यक्ति जब गरीबी का जीवन यापन करता है, गाय चराता है तो वह प्रभु से सुख का कामना करते हुए न जाने क्या क्या मन्नतें कर बैठता है। लेकिन जब झोपड़ी से पक्के मकान में आ जाता है तो गाय को रोटी तक देने से परहेज करता है। धन आते ही धर्म और दाता दोनों को भूल जाता है। पहले हमारे घरों के सामने लिखा होता था अतिथि देवो भव:, फिर सुस्वागतम् लिखाने लगा फिर हम और ज्यादा ज्ञानी हो गए तो वेलकम लिखने लगे, अब उससे और आगे बढ़ गए तो लिखा होता है कुत्तों से सावधान। यह संत हमारी बुद्धि की शुद्धि करते है। श्रद्धेय मदनमोहन महाराज ने महर्षि विश्वामित्र द्वारा राजा दशरथ से राक्षसों का वध करने के लिए श्रीराम लक्ष्मण को अपने साथ ले जाने की कथा प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि श्रीराम ने सबसे पहले ताड़का का वध किया। इसी तरह कृष्ण अवतार में भी श्रीकृष्ण ने पहले पुतना को मारा। इसके पीछे सीधा सीधा संदेश है कि बुराई से पहले बुराई के कारणों को समाप्त करना चाहिए। उन्होंने अहिल्या उत्थान तक की कथा सुनाकर आज की कथा को विश्राम दिया। कल धनुष यज्ञ की कथा से छटवें दिन की श्रीरामकथा शुरु होगी।

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