-वन भूमि पर पट्टे और अतिक्रमण के मामले ने लिया राजनीतिक रंग
गजेन्द्र खंडेलवाल, भैरुंदा। भैरुंदा में वन भूमि पर काबिज आदिवासियों को अतिक्रमण के नोटिस थमाए जाने का मामला अब सीधे-सीधे राज्य सरकार के आदेश और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की आदिवासी पंचायत में की गई खुली घोषणा के बीच का टकराव बनता दिखाई दे रहा हैं। एक तरफ वन विभाग ने जमीन खाली कराने के लिए नोटिस जारी कर काविज जमीनों के सत्यापन के लिए कागज (दस्तावेज) की मांग की हैं, तो दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान इसके खिलाफ आदिवासियों के पालनहार बनकर उभरे हैं। भैरुंदा में हुई अनुसूचित जनजातीय पंचायत में उनकी की मौजूदगी ने आदिवासी पंचायत (आंदोलन) को संजीवनी भी दी है। पंचायत में हुए निर्णय का हवाला देते हुए केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह स्पष्ट कहा है कि पुराने कब्जे नहीं छोड़ेंगे और बोवनी करेंगे के वक्तव्य के बाद सरकार और वन विभाग इस मामले में अब उलझन में आ गए हैं। अब इस मामले में नया मोड़ इसलिए आ गया है कि वन विभाग के द्वारा जारी किए गए नोटिस प्रशासनिक कार्रवाई शासन के स्पष्ट निर्देशों पर आधारित है। जबकि केंद्रीय मंत्री के द्वारा दिया गया आश्वासन ( राजनीतिक भाषण) के रूप में माना जा रहा है। हालांकि अपने भाषण में उन्होंने इस बात का भी लगातार उल्लेख किया कि इस मामले में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से चर्चा की जा चुकी है और आगे भी इस मामले में विस्तृत रूप से चर्चा की जाएगी।
वन विभाग व प्रशासन का तर्क, सरकार के आदेश पर कार्यवाही का नोटिस
इस मामले में वन विभाग और प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों की माने तो वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) 2006 के प्रावधानों और 13 दिसंबर 2005 की कट-ऑफ डेट के बाद हुए अतिक्रमण को हटाने के आदेश आए हैं। वन विभाग के मुताबिक केवल लाड़कुई वन परिक्षेत्र में 1955.175 हैक्टेयर वन भूमि पर कब्जा है। वन परिक्षेत्र लाड़कुई का कुल क्षेत्रफल 32466.160 हैक्टेयर था। जिसमें से 13834.330 हैक्टेयर भूमि वर्ष 2012 में वन विकास निगम को हस्तांतरित की जा चुकी है। 115 वर्षीय पट्टे के रूप में 193.375 हैक्टेयर व वन अधिकार पत्रों के रूप में 4511.112 हैक्टेयर भूमि के पट्टे दिए जा चुके हैं। वर्तमान में विभाग के पास 13927.343 हैक्टेयर भूमि का क्षेत्रफल शेष बचा हैं। विभाग के अधिकारियों का मानना है कि इसमें से भी 1955.175 हैक्टेयर वन भूमि पर कब्जा बरकरार हैं। वन विभाग ने इस नोटिस का आधार भारतीय वन भूमि अधिनियम 1927 का हवाला देते हुए साक्ष्य नहीं होने पर अतिक्रमण माना हैं। वही इस मामले कें निराकरण के लिए वन मित्र पोर्टल पर दस्तावेजों के आधार पर दावों का सत्यापन किए जाने की बात कही है।
कब्जाधारियों व शिवराज का तर्क, पुराने कब्जे नहीं छोड़ेंगे
बुधवार को इस मामले में भैरुंदा के दशहरा मैदान में हुई पंचायत को संबोधित करते हुए निर्णय लिया गया और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंच से स्पष्ट कहा कि पुराने कब्जे नहीं छोड़ेंगे, बोवनी करेंगे। उन्होंने मुख्यमंत्री से मिलकर इस मामले में बात करने का आश्वासन भी दिया। नोटिस पर कार्रवाई किए जाने की बात को लेकर आदिवासियों को सविनय अवज्ञा आंदोलन की तैयारी करने को कहा। इस मामले का निराकरण करने के लिए बुजुर्गों के कथनों को आधार मानकर दावे निपटाने की बात कही गई। हालांकि शिवराज सिंह चौहान ने हजारों की संख्या में मौजूद आदिवासी समुदाय को इस बात का भी भरोसा दिलाया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार गरीबों के साथ अन्याय नहीं होने देगी।
शिवराज के हुंकार के बाद उठते सवाल
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की हुंकार ने मध्य प्रदेश सरकार व वन विभाग को दुविधा में डाल दिया हैं। अब वन विभाग को यह समझ नहीं आ रहा की वह किसकी सुने। शासन का आदेश माने या आदिवासियों की पंचायत के दौरान केंद्रीय मंत्री के द्वारा की गई घोषणा पर अमल करें। कार्यक्रम में शिवराज सिंह चौहान के शामिल होने के बाद इस मामले में अब कई सवाल जन्म ले रहे हैं। जिन लोगों को वन विभाग के द्वारा नोटिस जारी किए गए हैं उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह शिवराज की बात मानकर बोवनी करेंगें उन्हें कानूनी कार्रवाई से तो नहीं गुजरना पड़ेगा? पंचायत में लिए गए निर्णय को सरकार मान्य करेगी क्या? पंचायत के अनुसार पुराने कब्जे नहीं छोड़ेेंगे का वक्तव्य सामने आने के बाद विभाग इस बात को कैसे वेरीफाई कर सकेगा की कौन सा अतिक्रमण नया और पुराना है ? पूर्व डीएफओ के दावे के बाद सही दावेदारों के हक पर भी सवाल उठ रहा है। दूसरी और यदि कानून की माने तो एफ आर ए कानून के तहत केवल 13 दिसंबर 2005 से पहले काबिज आदिवासियों को ही पट्टा मिल सकता है।
वन भूमि पर अतिक्रमण के मामले में सरकार के निर्देश
मध्य प्रदेश सरकार के मुखिया डॉ. मोहन यादव पहले ही अधिकारियों को वन भूमि पर अतिक्रमण के खिलाफ स्पष्ट निर्देश दे चुके हैं। जिसके तहत वन भूमि पर अधिकार के व्यक्तिगत और सामूहिक दावे का निराकरण 31 दिसंबर तक या उसके पहले करने होंगे। वन विभाग की सीमा के अंदर एक भी नया अतिक्रमण न हो, इसका कड़ाई से पालन भी कराना होगा। तय डेडलाइन में दावों का निपटारा नहीं करने और नए अतिक्रमण रोकने में विफल रहने पर संबंधित वन अफसरों को कार्रवाई के दायरे में लिया जाएगा। अब सवाल यह होता है कि शिवराज की घोषणा ने आदिवासियों को उम्मीद दी है। लेकिन अब गेंद मोहन सरकार के पाले में है। वह अपने केंद्रीय मंत्री की घोषणा को मानकर प्रशासनिक आदेश पलटती है या 13 दिसंबर की डेडलाइन के साथ आगे बढ़ती है।
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