एक हाथ नहीं, दूसरे में केवल अंगूठा और दो उंगलियां, पर एक पीढ़ी को शिक्षित कर चुके

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महू। अगर कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो यह स्वयं के साथ ही अपने आसपास के लोगों के लिए भी प्रेरणा बन जाता है। साथ ही कई अन्य लोगों के जीवन को भी नई उम्मीद और लक्ष्य देता है। ऐसा जज्बा ग्राम मतलबपुरा के शासकीय माध्यमिक विद्यालय के प्रभारी व शिक्षक हेमंत रावत का है, जो दिव्यांग हैं। बचपन से ही उनका एक हाथ नहीं है, दूसरे हाथ में भी अंगूठा और केवल दो उंगलियां हैं। बावजूद बोर्ड पर लिखकर पढ़ाते हैं। दिव्यांग होने के कारण गाड़ी चलाने में असमर्थ हैं। इसलिए पिछले 20 साल से प्रतिदिन 17 किलोमीटर दूर कभी लिफ्ट लेकर तो कभी बस से स्कूल पहुंचते हैं।

देश के भविष्‍य को निखारने का सपना

इनका मानना है कि मुझे सबसे अच्छी नौकरी मिली है जिससे मैं देश के भविष्य को निखार सकता हूं। इसलिए मैं पूरी ईमानदारी से पढ़ाता हूं। 20 साल में करीब एक पीढ़ी को शिक्षित किया है। इनमें कई बच्चे तो ऐसे हैं जिनके माता-पिता भी मुझसे ही पढ़कर निकले हैं। हाथों से दिव्यांग होने के कारण बोर्ड पर पढ़ाने में भी परेशानी होती थी, पर इसका अभ्यास किया।

अपनी राइटिंग सुधारने के लिए चित्रकारी की
तहसील के 1200 की आबादी वाले गांव के शासकीय माध्यमिक स्कूल में पांच शिक्षक हैं। यहां महू के धारनाका निवासी शिक्षक रावत स्कूल के प्रभारी प्राचार्य हैं। स्कूल पहुंचने के लिए उन्हें प्रतिदिन संघर्ष करना पड़ता है। फिर भी जाते अवश्य हैं ताकि बच्चों की पढ़ाई समय पर हो और उनका भविष्य निखरे। लौटते समय भी वही संघर्ष। रावत आठवीं तक के विद्यार्थियों को सभी विषय पढ़ाते हैं, पर उनकी विशेषज्ञता सामाजिक विज्ञान, संस्कृत व हिंदी में है। रावत ने बताया दोनों हाथों से दिव्यांग होने के कारण उन्हें बचपन में लिखने में दिक्क्त आती थी। दसवीं व बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में तीन घंटे लिखने के दौरान कई बार ब्रेक लेना पड़ता था। यही आगे की पढ़ाई में भी हुआ। इसलिए अपनी राइटिंग सुधारने के लिए चित्रकारी करने लगा, जिससे यह मेरा एक शौक बन गया और मेरा लेखन भी सुधरा।
परिणामों में नजर आई मेहनत
शिक्षक होते हुए उनकी मेहनत इस वर्ष 2021-22 और 2022-23 के परिणामों में नजर आई, जब स्कूल का परिणाम 100 प्रतिशत रहा। शिक्षक रावत ने बताया कि मुझे मेरे परिवार के साथ एक समय साथ में भोजन करने का मौका मिलता है। इस जीवन में मुझे ऐेसी नौकरी मिली है। इससे ज्यादा ईश्वर से क्या मांग सकते हैं। इसलिए मैं इसे जिम्मेदारी व ईमानदारी से पूरा करता हूं।

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