-जनसुनवाई में अपनी समस्या लेकर पहुंचा था किसान,
अनोखा तीर, हरदा। जमीन विवाद की शिकायत को लेकर अजनास-रैयत का ५५ वर्षीय किसान भगतसिंह पिता रामकृष्ण विश्वकर्मा मंगलवार को जिला पंचायत में आयोजित होने वाली जनसुनवाई में पहुंचा था। पहले भी बार-बार अपनी जमीनी विवाद की फरियाद मौखिक और लिखित उसने जिले के प्रशासनिक अधिकारियों को की थी, लेकिन उसका कोई निराकरण नहीं हुआ था। भगतसिंह आज कलेक्टर के पास इस उम्मींद से पहुंचा था कि यहां तो उसकी इस फरियाद को कलेक्टर और आला अधिकारी गंभीरता से सुनेंगे और उसके निराकरण का तत्काल आश्वासन देंगे, लेकिन जब जनसुनवाई में उसकी फरियाद को अनसुना करने की कोशिश की तो अजनास के इस किसान ने अपनी इस गंभीर शिकायत के निराकरण न होने पर बिना किसी को बताए जहर गटक लिया और जिला पंचायत की गैलरी में ही गिर गया। मीडियाकर्मी और अधिकारियों ने जब किसान को ऐसी हालत में देखा तो उसे तत्काल जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया गया, जहां किसान ने प्रशासनिक लापरवाही के कारण दम तोड़ दिया।
परिजनों ने लगाया न्याय नहीं मिलने का आरोप
मृतक के बड़े बेटे राकेश विश्वकर्मा का आरोप है कि उनके पिता लंबे समय से जमीन विवाद के समाधान के लिए अधिकारियों के चक्कर काट रहे थे, लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला। उन्होंने बताया कि परिवार का करीब छह एकड़ जमीन को लेकर बड़े पिता जगदीश विश्वकर्मा और उनके बेटे से विवाद चल रहा है। इसी मामले को लेकर उनके पिता लगातार जनसुनवाई और तहसील कार्यालय में आवेदन दे रहे थे। हंडिया तहसीलदार पूजा सांखला ने बताया कि संबंधित जमीन विवाद का प्रकरण वर्तमान में कमिश्नर कोर्ट में विचाराधीन है। ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय न्यायालयीन प्रक्रिया के अनुसार ही लिया जाएगा। अस्पताल चौकी पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है। मंगलवार शाम पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया। पुलिस का कहना है कि मौत के कारणों का स्पष्ट खुलासा पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जांच के बाद ही हो सकेगा।
कौन है किसान की मौत का जिम्मेदार
प्रशासनिक चौखट पर सुनवाई न होने की निराशा में जब किसान अपनी जान दे देता है तो इस किसान की मौत का जिम्मेदार किसे ठहराया जाना चाहिए? मृतक किसान के अंतिम बयान की बात करें तो मीडिया को उसने सिर्फ यह कहा कि मेरा भाई मेरे साथ मारपीट करता है। इस छोटी सी शिकायत का अधिकारियों द्वारा संतुष्टिपूर्ण समाधान और उसे आगे इस शिकायत का हल होते दिखता तो वह किसान ऐसा आत्मघाती कदम उठाने की सोच भी नहीं सकता था। अब तो उस किसान ने अपनी सारी समस्याएं अपने जीवन की आहुति देकर हल कर दी, लेकिन ऐसे अधिकारी और कर्मचारी जिन्होंने उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया, वह कहीं न कहीं उस किसान की मौत के जिम्मेदार हैं। हालाकि उन्हीं के द्वारा की जाने वाली जांच में वह बिलकुल पाक-साफ साबित हो जाएंगे, लेकिन यदि वह खुद आत्ममंथन करें तो उनके ऊपर एक हत्या का दोष तो लग ही गया है।





